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स्वयं को यूँ ना हल्का समझ।

स्वयं को यूँ ना हल्का समझ।

kavitdilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



स्वयं को यूँ ना हल्का समझ।
अपने अंदर तू आत्मविश्वास रख।
तेरे पास अदम्य शक्ति का है भंडार।
योग कर अपने कुंडली को जगा।
अपने कर्मों से सबका दिल जीत।
कुछ ऐसा कर्म कर कि
सब हो तेरे मीत।

लोग आते हैं
चले जाते हैं।
पर उनमें से
कोई कोई ही याद आते हैं।
सब का हो जिसमे भला।
जिससे किसी का दिल ना हो दुखा।
और जब कोई याद करे
तेरे मरने के बाद।
चेहरे पर दे जाए उसे
छोटी सी मुस्कान।
क्यों ना ऐसा कर्म करें हम इस जहां।
लोगों के दिलों से ना मिटे कभी
इस संसार से हटने के बाद।


Written by sushil kabira



मैं अभी थका नहीं।

मैं अभी थका नहीं।

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Manzil

मैं अभी थका नहीं।
रूह भी हार माना नहीं।।
माना मंज़िल अभी कहीं बहुत दूर है।
पर हमारा हौसला भी भरपूर है।।
कदम भले लड़खड़ा रहे हो।
साथ वाले कहीं पीछे छूट रहे हों।।
पर मैं अपने लक्ष्य पर डटा रहा।
सदा अडिग रहा वहीं।।
Manzil

धूप क्या!
बारिश क्या!
तूफान ने भी कड़ी चुनौती दी।।
पर कहाँ हटा मैं अभिमन्यु।
मेरी मंज़िल जो मेरे करीब थी।।
लहू लुहान हो चुका था।
शरीर भी छलनी छलनी हो गएँ थे।।
हिम्मत भी साथ छोड़ रही थी।
पर जज़्बा वही सलामत थी।।
Manzil

आँखों में चमक उठी।
जो मंजिल समीप मुझे दिखी।
क्या दर्द?
क्या जख्म?
सारे दुख तकलीफ फिर कहीं खो गएँ।।
मंजिल को पाने के प्रयास में।
मैं अपने ईश्वर को कभी भूला नहीं।।
जिसकी मदद के बिना
कर पाते फतह ये किला नहीं।
Manzil

Written by sushil kumar


वतना मेरे वतना वे।

वतना मेरे वतना वे kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। वतना मेरे वतना वे तेरा इश्क़ मेरे सर चढ़ चढ़कर बोल रहा है। एक जन्...