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16 Jun 2019

प्यार एक ऐसा एहसास है , जो कभी मरता नहीं।वो हमेशा ज़िंदा रहता है,हमारे और आपके जेहन में।

प्यार एक ऐसा एहसास है , जो कभी मरता नहीं।वो हमेशा ज़िंदा रहता है,हमारे और आपके जेहन में।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।




मैं सन्नी एक मिडिल क्लास फैमिली का बिगड़ैल औलाद।अभी मैंने आई.सी.एस.ई. बोर्ड से दसवीं का एग्जाम पास किया है।वो भी पैंसठ प्रतिसत से।अब तो आप समझ ही गए होंगे,मैं कितना होनहार छात्र हूँ।

अब कुछ पाँच साल पहले की मेरी जिंदगी में लौट चलते हैं।सन्त फ्रांसिस स्कूल का नाम हमारे शहर के हर गली गली में लिया जा रहा था।वहाँ जो चला गया,किस्मत उसकी बदल गई।या तो वो इंजीनियर,या तो वो आई.ए. एस. वहाँ से बनकर ही निकलता है।
हर माँ बाप का सपना हुआ करता था,कि उनके बच्चे की दाखिला वहाँ मिल जाए।ठीक वैसे ही मेरे माँ बाबू जी का भी सपना था कि मेरी भी दाखिला वहाँ हो जाए,ताकि मेरा भविष्य सुधर जाए।
मैंने उस वक़्त पांचवी कक्षा पास की थी।और पूरी कक्षा में टॉप किया था।मेरे पापा मम्मी मुझे और मेरे मार्कशीट लेकर सन्त फ्रांसिस स्कूल पहुँच गए।
मैं बहुत ही ज्यादा नर्वस था।घर से निकलते वक्त मैंने ईश्वर से बस यही प्रार्थना की थी कि हे ईश्वर मेरे माँ बाबू जी को कभी दुख का सामना ना करना पड़े,वो सदा खुश रहें।जहाँ उनकी खुशी,वहीं मेरी खुशी।पर अभी पुराने दोस्तों के छूटने का भी गम दिल में घेरे जा रहा था।
एंट्रेंस एग्जाम दिया,फैल हो गया।माँ बाबूजी ने प्रिंसिपल मैडम से निवेदन किया कि आप इसके पुराने रिकॉर्ड देखिए,ये हमेशा अपने क्लास में अव्वल ही आया है।इसे एक मौका देकर देखिए।
पता नहीं कैसे? प्रिंसिपल को भी मेरे माँ बाप के विश्वास पर विश्वास हो गया,और मेरा दाखिला वहाँ हो गया।

मेरा पहला दिन स्कूल का।
मैं डरा सहमा सा स्कूल जा पहुँचा।नए चेहरे,नए लोग।कुछ तो ऐसे घूरे जा रहे थे,मानो हमारी पहचान बहुत ही पुरानी हो।कुछ देख कर भी ना देखने का बर्ताव कर रहे थे।उन लोगो में मैं ही एक अजनबी सा महसूस कर रहा था।पता नहीं,रह रह कर वही पुराने दोस्त मुझे याद आ रहे थे।
क्लास पहुँचा और आगे के एक डेस्क पर जाकर बैठ गया।तभी एक लंबा सा घुँघरेले बाल वाला लड़का आया,और बोला
पीछे बैठ भाई, ये सीट मेरी है।
मैं उठकर पीछे चला गया।
अब मैं जिस सीट पर बैठता,वहाँ बैठा छात्र मुझे ये कहकर उठा देता कि वहाँ कोई और बैठा है।आखिरकार सबसे पीछे वाली सीट,जहाँ कोई नहीं बैठा था,वहाँ जाकर बैठ गया।
पहले सब्जेक्ट की क्लास की घण्टी बजी।एक शिक्षक मोटा सा,काला चेहरे लिए अंदर घुसा।उसकी शक्ल देखकर ही दिख रहा था,कि वह कितना खतरनाक और क्रूर होगा।जो कोई होमवर्क बनाकर नहीं आता होगा,उसका तो गाल और चूतड़ दोनो लाल कर देता होगा।
तभी किसी लड़की की आवाज़ दरवाज़े से आई:-मे आई कम इन सर।
शिक्षक :   कम इन।
लड़की  :   सॉरी सर, एक्चुअली देयर वेअर टू मच ट्रैफिक इन माई रूट।
शिक्षक :  व्हाट डू यू मीन टू से,डीज़ पीपल कम बाई फ्लाइट ओर व्हाट?टेक केअर ऑफ योर टाइमिंग नेक्स्ट टाइम , अदरवाइज यु विल नॉट बी अलाउड टू सीट इन डी क्लास।
लड़की : यस सर।

वह सीधे चलते चलते मेरे बगल में आकर बैठ गई।

मैं:  हेय!तुम लेट कैसे हो गई।
लड़की: अरे यार रास्ते में मेरे कार से एक कुत्ता टकरा गया।
मैं:  तो(मुस्कुराते हुए)
लड़की: वो कुत्ता किसी का पालतू कुत्ता था।
मैं:  ओ(सीरियस मूड)
लड़की: उसका मालिक दस हज़ार से नीचे लेने को तैयार ही नही हो रहा था।और अंत में मेरे डैड को दस हज़ार उसे देना ही पड़ा।
मैं: ओके
लड़की: वैसे मेरा नाम सुहाना है।तुम्हारा नाम क्या है?
मैं: मेरा नाम सन्नी।
सुहाना: मेरा आज पहला दिन है,और देखो आज ही मैं लेट भी हो गई।
मैं: मेरा भी आज पहला ही दिन है।
सुहाना: ओ!वाओ:लेटस बी ए फ्रेंड।
मैं: यस,यस।
तभी शिक्षक
रोल न● 39
सुहाना
सुहाना:-यस सर।
शिक्षक
रोल न● 40
सन्नी
मैं: यस सर।

फिर क्या?
हमारी दोस्ती कुछ अलग ही आयाम पर पहुँच चुकी थी।
हम जितना एक दूसरे संग खुले हुए थे,उतना ही दूसरों से बन्द बन्द थे।हमारे दोस्त भी बहुत ही गिने चुने थे।हमें एक दूसरे की कंपनी पसन्द थी।

अक्सर मैं और  सुहाना शाम में एक दूसरे के घर जाया करते थे।उसके घर पर मम्मी डैडी और एक आया रहती थी।मम्मी एक हाउस वाइफ थी,जबकि उसके डैडी एक कंपनी में अच्छे पोस्ट पर पदस्थ थे।हम दोनों को एक दूसरे की माँ के हाथ का खाना पसंद था।

हम दोनों ही अपनी दोस्ती की सीमा लाँघ कर एक नए रिश्ते में बंधना चाहते थे।क्योंकि हम दोनों ही एक दूसरे को बहुत ज्यादा पसंद करने लगे थे।
ये बात कुछ नवमी कक्षा के मिड टर्म शुरू होने से एक महीना पहले की बात है।एक सुबह सुहाना बहुत खुश दिख रही थी।और कुछ गुनगुना रही थी।प्यार किया तो डरना क्या
 मैं:  क्या बात है?बहुत खुश दिख रही हो सुहाना।
सुहाना:  हाँ!आज शाम में घर आना,पता चल जाएगा।
मैं: क्या है बताओ ना।प्लीज बताओ ना।
सुहाना: नहीं नहीं!जब शाम में आओगे ,उसी वक़्त बताऊँगी।
मैं: ठीक है,मत बताओ।मैं भी नही आऊँगा।
सुहाना: अरे माँ आज कुछ स्पेशल बना रही है।
मैं: क्या?
सुहाना: पता नहीं।पर कुछ स्पेशल है।

शाम हुआ,मैं सुहाना के यहाँ पहुँचा।

सुहाना: हाई
मैं: हाई
सुहाना: बहुत लेट करदी आने में।
मैं: हूँ
सुहाना: आओ! अंदर आओ।
मैं: आज बहुत ही सुंदर लग रही हो।क्या मस्त ड्रेस पहन रखी हो।
सुहाना: सही में।
मैं: हाँ।
सुहाना अपने कमरे में मुझे ले गई।
मैं: अंटी नहीं दिख रही है।
सुहाना: माँ मामा की शादी अटेंड करने को लखनऊ गई हुई हैं।
मैं: फिर तुमने ऐसा क्यों बोला कि
सुहाना बिच में रोकते हुए
सुहाना: कि माँ ने आज कुछ स्पेशल बनाया है।
सुहाना (शरारती हँसी हँसते हुए): बस ऐसे ही।
अगले ही क्षण उसने मुझे अपनी ओर खींच लिया।और मुझसे गले से लिपट गई।
मैं: अरे तुम्हारी आया आ जाएगी।
सुहाना: वो इस वक़्त घर पर नहीं है,घर का सौदा लेने बाजार गई हुई है।
मैं: (गहरी साँस लेते हुए)मैं भी सुहाना को अपनी बाँहो में और भी कसकर जकड़ लिया।
सुहाना: बस!अब आगे कुछ करोगे या यूँही.....
मैं: क्या?
सुहाना: अरे इतनी सुंदर लड़की तुम्हारे साथ में है,उसे किस लो,उसे प्यार करो।सब कुछ तुम्हे समझाना होगा।
मैं: (जरा सा मज़ा लेते हए)मुझे कुछ भी नही आता है।तुम शुरू करो ना।
सुहाना ने मेरा सर पकड़ अपने लिप्स को मेरे लिप्स पर रख दी,और धीरे धीरे से किस लेने लगी।मैं भी गुलाब की पंखुड़ियों सा नरम ओंठ को महसूस कर पूरे जोश में आ गया,और अपने जिह्वा को उसके जिह्वा संग मिला कर चरम सुख का आनंद लेने लगा।मैं उसके कपड़ो को हटाने की कोशिश करने लगा,पर उसने रोक दिया।
सुहाना: उँ...हूं....।प्रोटेक्शन है।
मैं: नहीं।
सुहाना:  पहले मेडिकल शॉप से कंडोम लेकर आओ।
और मैं निकल पड़ा उसके घर से अपना मोटर साईकल लेकर।मैं काफी दूर आने के बाद,एक अनजान मेडिकल शॉप के आगे अपनी मोटर साईकल रोकी।और वहाँ जाकर कंडोम माँगा।
मैं: कंडोम है।
दुकानदार: कौन सा फ्लेवर चाहिए।चॉकलेट,स्ट्रॉबेरी,डॉटेड,या विदआउट डॉट।
मैं: चॉकलेट फ्लेवर दे दीजिए।
और फिर क्या,मोटरसायकिल लिया और पाँच मिनट में सुहाना के सामने।
उस दिन हमने दो बार सेक्स किया।और उसके बाद तो पता नहीं,शायद ढाई हजार बार तो किया ही होगा,दसवीं के मिड टर्म तक।
अब आप पूछेंगे दसवीं के मिड टर्म तक ही क्यों?
वो इसलिए क्योंकि सुहाना के पिता को लगता था कि मेरे संगति में आकर,उसके अच्छे नम्बर नही आ रहे हैं।और इसलिए उन्होंने सुहाना को धमकी दी थी कि अब सन्नी के साथ दोस्ती खत्म करो और पढ़ाई करो।अगर अच्छे नम्बर नहीं आएँगे तो बोर्ड के बाद घर पर बैठना होगा।
सुहाना घर पर बैठने की बात से ज्यादा मुझसे बोर्ड के बाद ना मिल पाने की स्थिति से डर गई थी।
स्कूल में जब सुहाना की बाते सुनी तो मैं भी सन्न रह गया।और उसको पूरा सहयोग देने का वादा किया।
और सुहाना स्कूल में टॉप कर गई,और मैं केवल पास होकर ही रह गया।

और आज सुबह सुहाना की दोस्त,मेरी क्लासमेट सूची एक इंवेलोप ले कर मेरे पास आई।
सूची:  सुहाना ने बोला है,अकेले में पढ़ना।

मैं इंवेलोप लेकर फटाफट अपने कमरे में चला गया और अंदर से सिटकिनी लगा दी।
इंवेलोप खोलते खोलते मेरा दिल बहुत जोरों से धड़कने लगा।मन अनेक बुरे ख्यालातों से भर गया था।

प्रिय सन्नी
जब तक तुम्हें यह खत मिलेगा,तब तक मैं लंदन के लिए फ्लाइट पर बैठ चुकी होंगी।मुझे हार्ट कैंसर निकला है।शायद तुम्हे याद होगा,पिछली बार जब हम मिले थे,तब तुमने पूछा था कि मैं बहुत कमजोर दिख रही हूँ।वो उसी का प्रभाव था।डॉक्टर के पास जब जाँच हुआ तो पता चला।शायद मैं कुछ ही दिनों की मेहमान हूँ।मैं तुम्हें टूटते हुए नहीं देख सकती हूँ,और चाहती हूँ कि तुम अपने जीवन में आगे बढ़ो।तुम्हारे साथ बिताए गए प्यारे व अनमोल समय की लड़ियों को साथ लिए जा रही हूँ, जिसके सहारे अपने बचे खुचे समय को बिता लूँगी।अपने आखिरी समय में मैं अपने दादा दादी के साथ रहना चाहती हूँ इसलिए उनके पास लन्दन जा रही हूँ।

तुम सदा खुश रहना और जीवन में सदा आगे की ओर बढ़ते रहना।

तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी सुहाना।
एक एक शब्द मुझपर भारी पड़ रहे थे।मेरे तो पैरों तले जमीन खिसक रही थी।दिल मे भी थोड़ा थोड़ा दर्द सा होने लग रहा था।और अपने आंसुओ की धार को ना रोक सका था।
और फिर क्या,अकेले अकेले रहना।खुद से बाते करना।कभी रोना,कभी हँसना, कभी घण्टो घण्टो तक कमरे में बंद रहना।
फिर एक बार मेरे मामा जो साइकोलोजिस्ट हैं,घर पर आए हुए थे।कदाचित ये कहना सही होगा कि माँ ने उन्हें बुलाया थे,ताकि मेरा इलाज कर सके।(माँ ने वह पत्र पढ़ लिया था।पर वो केवल मामा को ही उस पत्र के बारे मे बताई थी।)
मामा: देख भांजे दुनिया में आना जाना तो लगा रहता है,पर जो गया, उसकी ख्वाहिश को पूरा करने की जिम्मेवारी,यहाँ रह गए उसके प्रेमी जनों की है।ताकि वो जहाँ भी रहे,खुश रहे।हमें और तुम्हे देखकर।

सन्नी को कुछ दिमाग में ठनका।
सन्नी: (मन ही मन सोचते हुए)अरे सुहाना की ख्वाहिश थी कि वो सारे गरीब बच्चों को पढ़ाए और दुनिया को सभी के लिए रहने के लिए उत्तम जगह बनाए।

सन्नी ने एक एन.जी.ओ जॉइन किया और वहाँ बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।खुद भी अपनी पढ़ाई जारी रखी।
धीरे धीरे समय बिता,और उसने हिंदी में पी.एच. डी. पूरी कर ली। वो सुहाना के सपने को पूरा करने को जी जान से लग गया।उसने एन जी ओ में काम करने के तरीके में कुछ कमियां पाईं।उसने खुद एक एन जी ओ खोलने का निर्णय लिया।और अपने एन जी ओ का नाम सुहाना जिद्द के नाम से रजिस्टर्ड करवाया।वो बहुत ही खुश था।
वो खुद ही झोपड़पट्टी में अपने टीम के साथ जाता था,और बच्चों को बाहर की दुनिया से अवगत करवाता था,साथ ही साथ उन्हें पढ़ाता भी था।झोपड़पट्टी के बच्चे भी इंग्लिश में जवाब देने लगे थे।और उनके सपनों को साकार करने के लिए सुहाना जिद्द की संस्था ने भरपूर मदद और कोशिश की थी।जिसके फल स्वरूप उनके इस प्रयास को सम्मानित करने के लिए लंदन में इनका नाम नॉमिनेट हुआ था।
सन्नी अपनी टीम के साथ लंदन रवाना हुआ।
वो दिन आ चुका था जब उनके इस प्रयास के लिए उन्हें सम्मानित होना था।आज सारा विश्व की नज़र उनपे थी।मंच सज चुके थे।दर्शकगण बैठ चुके थे।हर क्षेत्र में किए गए प्रयास को सम्मानित किया जा रहा था।हमारे क्षेत्र से दो संस्था और भी थी।एक लंदन की ही संसु नाम की एन जी ओ थी,और एक जापान की समसू नाम की एन जी ओ थी।दोनो ऐसे लग रहे थे मानो उनके संस्थापक जापान या चीन से हैं।
मैं बहुत ज्यादा ही उत्साहित था,कि सुहाना के सपने को पहला उड़ान मिल चुका था।
हमारी संस्था का नाम लिया गया।मैं अपनी टीम की ओर से स्टेज पर पहुँचा।हमारी संस्था के किए गए प्रयास की एक छोटी सी झलक की वीडियो सारे विश्व के सामने रखी गई।पन्द्रह मिनट के वीडियो के बाद सारा ऑडिटोरियम दस मिनट तक लगातार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।हर चेहरे पर खुशी झलक रही थी,कहीं आंसुओ की धारा के द्वारा तो कहीं वाह वाही के द्वारा।हमारी टीम की छाती गर्व से फूल गई।और मुझे मंच पर एक दो शब्द अपनी उपलब्धता पर कहने को कहा गया।
सन्नी:  मैं इस सम्मान का श्रेय केवल और केवल अपनी टीम को देना चाहता हूँ।अगर इनका साथ नहीं मिलता,तो शायद ही कभी इस मंच पर पाँव रख पाता।
पर एक शख्स और भी है,जिसके चलते मैं इस राह पर चल सका।अगर वो ना होता,तो शायद ही इस राह पर मैं कभी आता ही नहीं।वो शायद इस दुनिया में अब नहीं है।वो और कोई नहीं,वो मेरी दोस्त,मेरी सबकुछ,मेरी सुहाना है।ये सुहाना जिद्द उसी के नाम पर रखी गई है।उसका सपना था कि सारे गरीब बच्चों को पढ़ाए और उनका भविष्य सँवारे,साथ ही साथ दुनिया को रहने के लिए उत्तम स्थान बनाए।आज उसका सपना ,मेरा जिद्द बन गई है,और उसे मैं पूरा करके ही दम लूँगा।

तभी एक लड़की आगे की कतार से उठकर मेरी तरफ आने लगती है।उसका चेहरा जैसे जैसे निकट आ रहा था,कोई अपने की तस्वीर दिमाग में उभर कर आ रही थी।
ये ये सुहाना है क्या?
हाँ हाँ(दिल कहे जा रहा था)
नहीं नहीं(दिमाग कह रहा था)
लड़की सन्नी के बाँहो में जाकर लिपट गई।
लड़की: सन्नी!
सन्नी: सुहाना!तुम !तुम! जिंदा हो।
सुहाना: हाँ।आखिरकार तुमने मुझे ढूंढ ही निकाला।
सन्नी और भी कसकर सुहाना को अपनी बाँहो में जकड़ लेता है।
ऑडिटोरियम पूरा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है।
सन्नी: तुम यहाँ कैसे?
सुहाना: संसु की संस्थापक मैं ही हूँ।
सन्नी: वहाँ भी तुमने मुझे अपने संग जोड़ रखा है।
सुहाना: मुझे लगा तुम जीवन में काफी आगे बढ़ गए होगे, इसलिए मैं तुम्हें ढूंढने की प्रयास नहीं की।
सन्नी: चलो ठीक है।तुम कैसी हो अभी?
सुहाना: फर्स्ट क्लास।कैंसर के प्रभाव से मैं कोमा में चली गई थी।माता रानी की कृपा से सात साल के बाद मैं होश में आई।
सन्नी: थैंक गॉड!तुम मुझे मिल गई।
सुहाना: क्या मतलब!तुमने शादी नही की है।
सन्नी: हाँ शादी तो मैंने कर ही ली थी।
सुहाना: किसके साथ?
सन्नी: अपने प्रोफेशन के साथ।
सुहाना जोर जोर से हँस पड़ी और सन्नी से लिपट गई,सदा सदा के लिए।

Written by sushil kumar

तेरे हक का है तो छीन लो।

Shayari तेरे हक का है तो छीन लो। kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। अपने हक के लिए तुम्हें आवाज खुद उठाना होगा। आए...