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14 Jul 2019

कुछ कटु सत्य।

कुछ कटु सत्य।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।

कोई भी माँ बाप अगर अपने बच्चे के सामने ये बोले कि अब वो कभी भी आगे कोई भी सम्बन्ध किसी परिवार के साथ नहीं रखना चाहेंगे।तो क्या उनका बच्चा कभी भी उस परिवार के साथ घुल मिल सकेगा??क्या बच्चे का कभी भी उस परिवार के साथ सरल सम्बन्ध बन पाएगा।
शायद कभी नहीं।रिश्तों में दरार वहीं से दिल मे पैदा होती जाएगी, और एक दिन गहरी खाई में तब्दील हो जाएगी,जिसे चाह कर भी कोई जोड़ ना पाएगा।और उसके बाद और भी कुछ रिश्ते टूटने को बेबश हो जाएँगे।

कुछ लोगों का मानना होता है,कि आफिस का तनाव आफिस में ही छोड़कर आना चाहिए।घर पर अपनी पत्नी से बाँटना नहीं चाहिए।अब मुझे ये समझ नहीं आता है कि अगर एक पति की आफिस में किसी के साथ बकझक हुई।उसके बॉस ने उसे अच्छे से लताड़ दिया हो।सारा दिन वह तनाव में रहा हो।और जब वह घर आए तो अपने तनाव को किसी के साथ शेयर ना करे,और दिल ही दिल घुटता रहे।और एक दिन तनाव से मुक्ति पाने को फंदे पर झूल जाए,वह अच्छा रहेगा।कोई कैसे बोल सकता है कि अपने तनाव को आफिस में छोड़ कर आओ।ऐसा कभी पॉसिबल है।किसी ने आपके अस्तित्व को झकझोर दिया हो,और आप उसे बांटने के बजाय,अपने अंदर उसे दबा कर रखे रहिए।शायद नहीं।

लोगो को बस अपने बच्चे की खुशी प्यारी है।मेरे बच्चे के साथ मेरे सम्बन्ध बना रहे,बाकी दुनिया जाए भाड़ में।बच्चे की शादी हुई।और फिर क्या कूटनीति शुरू हो जाती है।दोनो पक्ष अच्छे बनने की दौड़ में अच्छी खासी शादी शुदा जोड़ो की जिंदगी को नरक से भी बदतर बना देने को आतुर रहते हैं।

Written by sushil kumar




सपने अटूट हैं,तो प्रयास भी अटूट ही रहेगा।

सपने अटूट हैं,तो प्रयास भी अटूट ही रहेगा।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



नई नई जॉब,नया नया जगह।घर से पहली बार मैं बाहर निकला था।मुम्बई के नाम से ही दिल धड़कने लगता है।पता नहीं कितने लोगों की इस शहर ने जिन्दगानी बदल कर रख दी है।हर कोई एक नया सपना संजोकर इस शहर में कदम रखता है।किसी को हीरो बनना है,तो कोई फैशन डिजाइनिंग में अपना कदम जमाना चाहता है,तो कोई मॉडल बनने का सपना लेकर यहाँ कदम रखा है।पर मैं,मैं तो आई बी पी एस का एग्जाम पास करके बैंक की नौकरी करने को यहाँ कदम रखा था।
सैलरी ठीक ठाक थी।हाउस रेंट अलौवंस मिलता था,पर उसमें सही सही रूम मिल पाना सम्भव नही था।इसलिए मैने निर्णय ले लिया था कि मुझे अपने सैलरी से भी कुछ ना कुछ तो जोड़ना ही होगा।वरना अच्छा रूम मिल पाना सम्भव नहीं।न्यूज़पेपर में अपने आशियाने को तलाशना शुरू किया।ढूंढते ढूंढते मुझे एक पता मिला,जो फोर्ट से जरा दूर था,पर पढ़कर मुझे बहुत खुशी मिली।2बी एच के केवल २२००० में घाटकोपर के इलाके में।मुझे अपने सैलरी से केवल दो हजार ही देने होंगे।चलो देख कर आते हैं।मैने रूम ओनर को फोन किया,और अपनी इच्छा जताई।जब उसने सुना कि मैं कोई बैंक में हूँ,तो वह बहुत खुश हुआ।
मैं बताए हुए टाइम पर घाटकोपर पहुँचा ।लिखे हुए पते पर जब पहुँचा, मुझे बहुत खुशी हुई,वहाँ आलीशान आलीशान बंगले खड़े थे।लिफ्ट से होकर मैं 1203 के सामने पहुँचा।बेल बजाया तो एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बाहर निकला।उसने मुझे कमरे दिखाए,बहुत ही शानदार कमरे थे।मैने उसे एडवांस देकर बुक कर लिया।
अगली सुबह समान लेकर मैं रूम पर पहुँच गया।बैंक से जब  मैं शाम को वापस आया।बहुत ज्यादा काम के वजह से काफि थक गया था।आते ही जो बेड पर लेटा,झपकी लग गई।फिर इग्यारह बजे मेरी भूख से नींद खुली।उठकर फटाफट मैने मैग्गी बना ली और खाकर सो गया।
बिच रात में मेरी नींद किसी आवाज की कारण खुल गई।और दिल मेरा जोर जोर से धड़कने लगा।किसी लड़की की रोने की आवाज अंदर कमरे से आ रही थी।मैने लाइट्स अंदर वाले कमरे की ऑन की,पर वहाँ कोई नही था।मैंने लाइट्स ऑफ कर अपने कमरे में सोने आ गया।मुझे लगा जैसे कोई मिथ्याभास था।सुबह जरा लेट से नींद खुली।फटाफट सैंडविच बनाया,खाया और निकल लिया।
रात में बैंक से आते आते लेट हो गया।बहुत थके होने के कारण रास्ते में ही मैने स्विगगी से खाने का आर्डर कर दिया।स्विगगी वालो का फोन नही आने पर मैं परेशान हो गया।कहीं स्विगगी वालो ने मेरा आर्डर कैंसिल तो नही कर दिया।मैने स्विगगी एप्प खोला,तो पाया कि मेरा खाना डिलीवर भी हो गया है।मुझे लगा मेरा खाना कोई और तो नहीं खा गया।नहीं नहीं!मैं ये कैसी कैसी बातें कर रहा हूँ।जरूर गार्ड ने अपने पास रख लिया होगा।
जब मैं अपने सोसाइटी के गेट पर पहुँचा,तो पूछने पर उसने बताया कि मेरा खाना मेरे रूम पर पहुँच चुका है।मैं सोचा,ऐसे कैसे हो सकता है?ऐसा तो नही कि मेरे पीछे रूम ओनर ने आकर मेरे रूम की चेकिंग की हो।या गार्ड को कुछ कंफ्यूजन हो गया होगा।ऐसी बहुत सारी बातें दिमाग में घूम रही थी।अपने कमरे को खोला तो पाया कि मेरा आर्डर किया हुआ खाना डाइनिंग टेबल पर रखा हुआ है।मैं चौंक गया।मैं गार्ड को फोन किया और पूछा कि मेरे रूम ओनर आए थे क्या?उसने मना कर दिया।फिर मैं और भी डर गया,मतलब मेरे रूम की चाबी यहाँ बिल्डिंग में या सोसाइटी में किसी और के पास भी है।मैने रूम ओनर को फोन कर उसकी पुष्टि की,पर उन्होंने साफ साफ मना कर दिया,कि उस फ्लैट की तीन चाबी है,दो उनके पास है,एक मेरे पास है।
अब ये क्या चक्कर है।सोचते सोचते खाना खाया,और निर्णय लिया कि सोसाइटी के चेयरमैन से बात करके सुबह सुबह आज का पूरा सी सी टीवी फूटेज देखूँगा।खाकर सोने चला गया।तभी रात में एकाएक मेरी नींद खुली।किसी लड़की की फिर से अंदर के कमरे से रोने की आवाज़ आ रही थी।मैं हिम्मत करके लाइट्स ऑन की और अंदर कमरे की ओर चला गया।जब अंदर के कमरे की गेट खोला,तो आवाज़ गायब हो गई।मैने लाइट्स ऑन किया तो कुछ नही पाया।
फिर बेड पर जो आकर लेटा हूँ, सुबह सुबह नींद खुली।मैं सोसाइटी के चेयरमैन से बात करके सारी रात की बातें सामने रखी।उन्होंने सी सी टीवी देखने के लिए परमिशन दे दिया।मैने क्या पाया कि मेरे सुबह सुबह बैंक जाने के बाद और बैंक से घर आने के पहले केवल वह डिलीवरी बॉय आया था।उसने बेल बजाई, और अंदर से डोर खुला,और वह खाना देकर वहाँ से निकल लिया।
मैने मन ही मन सोचा, कि मेरे साथ कोई और भी रहता है क्या???मैं भागा भागा रूम में आया,और नहीं भी तो पच्चीस बार अपने कमरे की बेल बजाई, पर किसी ने डोर नहीं खोला।आखिर क्या राज है???मैने कमरे की कोने कोने से तलाशी ली,पर कोई नहीं मिला।मैने बैंक में फोन करके एक दिन की छुट्टी माँगी, और मेरी छुट्टी सैंक्शन हो गई।मैने आज तय कर लिया था कि उस चोर को पकड़ कर ही दम लूँगा।फिर मुझे लगा कि जो मेरे साथ होता है,वो पुराने वाले रेन्टर लोग के साथ भी होता होगा।मैं गार्ड के पास गया,और मेरे कमरे के पुराने रेन्टर का नम्बर पूछा।पर वो बता ना पाया।फिर पूछा कि वो लोग यहाँ से कब गए।ये भी वह बता नही पा रहा था।और बात को गोल गोल घुमाने लगा।कहा इतने लोग आते जाते हैं,किसकी किसकी खबर रखें?मानो किसी ने उसे साफ साफ हिदायत दी हो,कि उस कमरे के बारे में किसी को भी कुछ नही बताना।फिर मैं उसे साइड में ले जाकर चुपके से ५०० रुपए की एक नोट पकड़ा दी।फिर क्या उसने सारे पत्ते ही खोल दिये।
मेरे से पहले एक स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस यहाँ रहती थी।जो काम कम मिलने के चलते ड्रग्स एडिक्टेड हो गई थी,और जिस्म पड़ोसी के धंधे में भी कूदने को मजबूर हो गई थी।और एक सुबह जब वो अपने कमरे से निकली नही, तो जब उसका कमरा खोला गया,तो उसे फैन पर झूलते हुए पाया गया था।वो मर चुकी थी।
मेरा दिमाग ठनका,शायद इसी कारण से रात में मुझे किसी लड़की की रोने की आवाज़ आती है।मैने फोन कर रूम ओनर से बात की,और सारी घटना को विस्तार से बताया।पर गार्ड का नाम नही बताया।फिर सारा सामान लेकर केवल तीन दिनों में उस भूतिया घर को अलविदा कहकर किसी और के फ्लैट में शिफ्ट हो गया।
आँखों मे सपने लिए लोग यहाँ आते हैं।
कुछ के ही सपने पूरे होते हैं
बाकी के मिट जाते हैं।
पर मिटने का ये मतलब तो नहीं
कि प्रयास ही बंद कर दो।
सपने अगर अटूट हैं
तो प्रयास भी निरन्तर जारी रहती है।
भले मंजिल से चूक गए हैं आज
पर कल का सवेरा,कल का दिन और
कल की रात तो मेरी ही होगी।
है ना😉




Written by sushil kumar

7 Jul 2019

बुरी आदतों से बचें।मानव जीवन ईश्वर के द्वारा प्रदान किया हुआ सबसे अनमोल तोफा है।उसे व्यर्थ में मत गंवाओ।

बुरी आदतों से बचें।मानव जीवन ईश्वर के द्वारा प्रदान किया हुआ सबसे अनमोल तोफा है।उसे व्यर्थ में मत गंवाओ।

Adhmari Khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।

मेरे पांव लड़खड़ा रहे थे,मैं रस्ते पर सीधा चलने की कोशिश कर रहा था।पर चाह कर भी अपने कदमो पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था। कभी रोड के इस तरफ तो कभी रोड के उस तरफ पहुंच जा रहा था।तभी बहुत जोर से हॉर्न की आवाज सुनाई दी,और ठीक उसी वक़्त किसी गाड़ी ने पीछे से जो धक्का मारा है,मैं हवा में उड़ने लग गया था।और जाकर रोड के साइड में गिरा।मुझे चोट जो लगी सो तो लगी ही थी,पर मेरे शरीर के हिस्सों में से खून भी बह निकले थे।मैं दर्द से कराह रहा था।बार बार माँ को याद किया जा रहा था।माँ हमेशा बोलती थी कि पीना छोड़ दो,एक दिन ये शराब तुम्हारी जान ले कर ही छोड़ेगी।माँ तुमने सही बोला था,मैने तुम्हारी बात क्यों नही मानी माँ!क्यों नहीं मानी माँ!
मैं शराबी पहले नहीं था।मैं ना ही तंबाखू खाता था,ना सिगरेट पीता था,ना शराब।मेरे अंदर कोई भी खोट नहीं थी।लेकिन फिर कैसे पीना शुरू कर दी थी मैने?
दरअसल एक लड़की थी मेरे कॉलेज में,जिसका नाम सोनम था,मैं उससे बहुत प्यार करता था।और शायद वो भी मुझसे प्यार करती थी।शायद हाँ।
जब भी मुझे वो देखती,तो मुस्काती थी,और उसकी उस मुस्कान पर मैं फिदा हो जाता था।जिस दिन उसकी मुस्कान नहीं देख पाता था,मेरा दिल बिल्कुल नहीं लगता था और उदास उदास रहा करता था।
और मैं कोई ना कोई बहाना लेकर,उसके करीब पहुँच ही जाया करता था।पर उसकी प्रतिक्रिया कुछ अच्छी नहीं रहती थी।उसे देखे बिना मेरा कोई दिन नही जाता था।आखिरकार वो दिन आ ही गया,जब उसने मुझसे कुछ बात करने की बात कही।मुझे उसकी बेसब्री देख,उसके दिल में मेरे लिए प्यार की जो गहराई थी,उसका अनुमान लगाने की कोशिश करने लगा।
सोनम:-तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो।
मैं:-हाँ।
सोनम:-तुम उसकी सीमाओं को लांघो मत भी ना।प्लीज।
मैं:-समझ गया।शायद उसे मेरा व्यवहार सही नही लग रहा है।मैं उससे हिम्मत कर पूछा कि क्या तुम्हारा कोई बॉय फ़्रेंड है क्या?
(मन ही मन में:-नहीं हो,नहीं हो)
सोनम:- हाँ।
मुझे उस हाँ शब्द ने अंदर से झकझोर दिया था।और मेरे अंदर के जीने की इच्छा को भी खत्म करने लगा था।मुझे ऐसी हालत में देख,मेरे यार संजय ने सब कुछ भूल आगे बढ़ने की राय दी।राय देना आसान था।पर जो इतने दिनों का प्यार था,भले ही एकतरफा था,पर था तो।उसे कैसे एक पल में कोई दिलोदिमाग से मिटा दे।
तभी मेरा दोस्त सन्नी ने मुझे उस शाम में अपने बर्थडे पार्टी पर अपने घर में बुलाया।मैं अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वहाँ पहुँच गया।सन्नी ने भी किसी लड़की को छोड़ा था।सो मैने उससे पूछ लिया,कि आखिर कैसे तुमने उस लड़की को दिल से सदा सदा के लिए मिटा दिया।उसने कहा कि शराब ही है एक ऐसी वस्तु है,जिसके आगोश में अगर तुम जाते हो,तो फिर वो लड़की क्या सारे दुनिया के गम को तुम अपने हृदय से मिटा सकते हो।मुझे उसकी बात दिल को लग गई।
मैंने शराब पीना शुरू कर दी।और मेरी आदत जो बिगड़ने की आगाज़ हुई,मैं गांजा,चरस,सिगरेट,तम्बाकू सब कुछ का सेवन करने लगा।
सुबह हो चुकी थी।मुझे होश आया तो खुद को रोड पर लेटा हुआ पाया।मैने उठने की कोशिश की,पर जख्म और दर्द की वजह से कराह उठा।फिर भी कैसे भी उठकर अपने घर की ओर चल पड़ा।मुझे अपनी माँ से बोलना था कि माँ मैं सारी बुरी आदतें छोड़ना चाहता हूँ।मैं जब अपने घर के बाहर पहुँचा, तो वहाँ काफी भीड़ पाया।बहुत सारे लोग किसी को घेर कर खड़े हुए थे।भीड़ के अंदर से मानो मेरी माँ पापा और मेरी बहन के रोने की आवाज़ आ रही थी।मैं किसी तरह अंदर घुसा तो पाया कि कोई मेरा हमशक्ल वहाँ मृत लेटा हुआ है।मैं हँस पड़ा, और चिल्ला कर सबसे कहने लगा,माँ बाबूजी मैं यहाँ हूँ।बहना मैं यहाँ हूँ।लाख चिल्लाने और उन्हें बताने की कोशिश में जब विफल हो गया,तो मैं रो पड़ा।आखिरकार मेरी बुरी आदतों ने मुझे मौत के मुंह में धकेल ही दिया।

Written by sushil kumar

6 Jul 2019

मानवता का धर्म सबसे श्रेष्ठ धर्म है।

मानवता का धर्म सबसे श्रेष्ठ धर्म है।

Adhikari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।

ये कहानी काल्पनिक है।इसका सम्बन्ध किसी भी जीवित या मृत आदमी से नहीं है।


बहुत तेज़ बारिश हो रही थी।दिन का समय था,पर घनघोर बादल छाने के कारण,शाम का माहौल लग रहा था।फायरिंग  लगातार जारी थी।मेरे पास भी गोलियां खत्म हो रही थी।साथ वाले या तो मारे जा चुके थे,या घायल अवस्था में बेहोश हो गिरे हुए थे।मै पीछे हटने के प्रयास में एक कदम पीछे क्या हटाया था कि एक बुल्लेट मेरे सर को छूते हुए निकल गई।मेरे मुँह से "ओ माँ" शब्द अनायास ही  निकल पड़े।मेरे चेहरे पर से होते हुए खून नीचे टपक रहा था।सारी घटनाएं मेरी बचपन से अभी तक की एक पल में मुझे दिख गए थे।मानो ईश्वर सजा मुकर्रर करने से पहले मेरे द्वारा किए गए अच्छे और बुरे कृत का दृश्य मुझे दिखाना चाहता हो।आइए उन दृश्यों के झलक को आपको भी दिखाएँ।
ये बात कुछ बत्तीस साल पहले की है,जब मैं छह साल का था।मेरा जन्म पी.ओ.के. यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हुआ था।मैं जन्म से हिन्दू था।मेरी माँ मुस्लिम थी और मेरे पिता हिन्दू।पर बाद में मेरे पिता को जबरन इस्लाम कबुलाया गया था।मेरे पिता और मेरी माँ भले मुसलमान थे,पर दिल से सभी धर्मों का सम्मान करते थे और यही संस्कार बचपन से मुझे देने की कोशिश करते थे।
मैं पढ़ाई करने मदरसा जाया करता था।वहाँ हमें ये सीख दी जाती थी कि हम बड़े ही भाग्यशाली हैं,जो इस पाक धरती पर हमने जन्म लिया है।हमारे भाई बन्धु जो पहाड़ी के उस पार रहते हैं,उनपर रोज़ जुल्म ढाए जा रहे हैं,वहाँ की हुक्मरानों के द्वारा।हमें उन्हें आज़ाद कराना है,हर हालत में,हर कीमत पर।पढ़ाई होती थी,पर नाम भर की।हमें हमारे शहिद भाईयों की कहानियां सुनाई जाती थी,कि कैसे उन्होंने हिंदुस्तानियों के घर में घुस कर उनके नाक में दम कर रखे थे,और हुक्मरानों की नींद हराम कर रखी थी।
गैर मुस्लिमों से नफरत करना, उन्हें हमेशा अपने जूते के नोक पर रखना।क्योंकि वही लोग हमारे मुसलमान भाइयों के दुश्मन हैं,उन्होंने उन पर बहुत जुल्म ढाए हैं।अगर हम उन्हें जहन्नुम पहुँचा देंगे,तो अल्लाह हमे जन्नत बख्शेगा।और हम पूरे जोश में अपने कदम को अंधकार की ओर बढ़ाते चले गए।कश्मीर को हर हालात में हिंदुस्तानियों से आज़ाद कराना ही हमारा मकसद बताया जाता था।और इसीलिए हमें अल्लाह ने इस धरती पर भेजा है,हमें ये जिंदगी बख्शी है।
मतलब इतने जहर,इतने जहर कि अगर कोई गैर मजहबी सामने से शांति पूर्वक कहीं जा रहा हो,तो उसे भी मौत के घाट उतारने को अपना धर्म समझ बैठे थे,हम सभी ने।
फिर हमारी ट्रेनिंग जमकर हुई।हमें सारे राइफल्स,बन्धुके, गोली बारूद की शिक्षा दी गई।और ये सब कितने साल में,केवल दस साल में।हमें हमारे दिमाग की इंटेलिजेंस के हिसाब से काम सौंपे जाते थे।जिसका दिमाग ज्यादा चलता है,उन्हें हाईयर स्टडीज के लिए भेजा  गया,ताकि हम जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके।और जो हमारे जैसे थे,जिनका दिमाग नॉर्मल चलता था,उन्हें और भी कड़ी ट्रेनिंग के लिए एक गुप्त जगह भेजा गया।पर जिनका दिमाग बिल्कुल ही नहीं चलता था और जिनकी झूठ आसानी से पकड़ी जाती थी,उन्हें ह्यूमन बम बनाकर हिंदुस्तान के सरजमीं पर भेज दिया जाता था।जहाँ उनका ब्रेन वाश कर बम ब्लास्ट करवाए जाते थे।
मेरी ट्रेनिंग के दौरान मेरे पिता और माता के इंतकाल की खबर आई।मैं बिल्कुल टूट सा गया।पर फिर से मौलवियों ने इतनी जहर घोली कि मैं ट्रेनिंग में पूरी शिद्दत से लग गया।और सोलह साल की उम्र में हिंदुस्तानी बॉर्डर क्रॉस कर कश्मीर में पनाह ले ली थी।कश्मीर में अपने भाइयों पर जुल्म होते देख मेरा खून खोल उठता था।किसी दिन जब भी खबर आती थी कि आज एक और कश्मीरी भाई हमारा शहीद हुआ है,मेरा मन करता था कि बारूदों से सारे हिंदुस्तानी सैनिकों को उड़ा डालूँ।पर मेरे हाथ बंधे हुए थे।हाइ कमान से जब तक कोई इशारा नहीं मिले,तब तक मुझे यहीं छिप कर रहना है।
तभी मेरी दोस्ती वहीं पड़ोस में रहने वाली रिहाना से हुई।रिहाना का भाई सेना में अच्छे पोस्ट पर था।रिहाना अक्सर अपने भाई की बहादुरी के खीस्से सुनाया करती थी।मुझे उसके भाई के बहादुरी की बातों से ज्यादा मजा,किसी बहाने उससे बात करने में लगती थी।मुझे वह अच्छी लगने लगी थी।

हाई कमान का आदेश आ चुका था,मुझे कश्मीर में बम ब्लास्ट करना था।सारी व्यवस्था हो चुकी थी।हमारी बम ब्लास्ट कामयाब हुई थी।और उसमें बहुत सारे हिन्दू सैनिक और कुछ अपने मुस्लिम भाई मारे गए थे।मेरी नाम की चर्चा पाकिस्तान में फैल चुकी थी।मुझे शाबाशी दी जा रही थी।मैं बहुत ही खुश था,और खुद पर बहुत ही फक्र कर रहा था।मैने अपना मिशन खत्म कर जब अपने ठिकाने पर वापस आया,तो पाया कि रिहाना का भाई कोई आतंकवादी हमले में शहीद हो गया है।और रिहाना और उसका परिवार बिलख बिलख कर रो रहै थे।उसका भाई मेरे द्वारा ही किए गए बम ब्लास्ट में मारा गया था,ये सोच सोच कर मैं पागल सा हुआ जा रहा था।ये मैने क्या कर डाला?मुझे उनकी हालात देखी नहीं जा रही थी।उसके कुछ दिनों बाद ही रिहाना और उसके परिवार ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर लिया।मैं उनकी लाशें देख बिल्कुल ही टूट चुका था।मुझे मरे हुए लोगो के परिवार के रोने की आवाज़ सुनाई देने लगी थी।हारकर जब मुझे रहा नही गया,मैं खुद वहाँ के पुलिस थाने में पहुँच अपना जुर्म कबूल कर सरेंडर कर दिया।मुझ पर वहाँ मुकदमा चला और मेरे सरेंडर करने के चलते,मुझपर रहमत बरती गई,और मुझे फाँसी नहीं पन्द्रह साल की बामुशक्कत कैद की सजा सुनाई गई।पर मैं मुकदमा के दौरान जज से गुजारिश करता रह गया था कि मुझे मौत की सज़ा ही दी जाए।पर वो सुने नहीं।
मैने जेल में हिंदी पढ़ना सीखा।फिर ढेर सारी लिटरेचर हिंदी के पढ़ता चला गया,और मेरा झुकाव हिंदी साहित्य की ओर होता चला गया।फिर मैंने अपने कुछ कैदी भाइयो से रमायन की कुछ घटनाओं के वर्णन सुने,जिससे मेरी उसे पढ़ने की चेष्टा दिल मे और भी जाग गई।मैने रमायन पढ़ा, जिससे मुझे हिन्दू धर्म को और भी नज़दीक से जानने की इच्छा हुई।
मेरे अच्छे व्यवहार को देख प्रशासन ने मुझे पन्द्रह दिन पहले ही छोड़ने का निर्णय ले लिया।
मैं जेल से जब बाहर निकला,तो कश्मीर की स्थिति जस की तस बनी हुई थी।मैने तय कर लिया कि अब और लोगों को धर्म के नाम पर,जहर उगलने नही दूँगा।घाटी में शांति लाकर ही रहूँगा।अपने लोगो को मैं समझाऊँगा, उन्हें सही राह पर लेकर आऊँगा।और फिर क्या ?मैं बिना डरे,निर्भीक हो अपने भटके मुसलमान भाइयो के पास जाकर उन्हें सही राह बताने की कोशिश करने लगा।उन्हें सच्चाई से वाकिफ करवाने लगा,कि आजादी का असली अर्थ क्या है?आज़ादी का अर्थ है,बुरे कृत्यों से आज़ादी,सारी बुराइयों से आज़ादी, अपने अंदर बैठे शैतान से आज़ादी।हर धर्म ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रेम का पथ ही उत्तम बताया है,सो सभी मनुष्यों से बिना उसके धर्म जाने,बिना उसकी जाति जाने प्रेम करना ही उच्चतम धर्म है।मानवता का धर्म ही श्रेष्ठ है।
मेरे बात से प्रभावित हो बहुत से भटके राही मेरे तरफ सही राह पर चलने को आ गएँ।पर कुछ अभी भी वही नफरत की राह पर आगे बढ़ने को उत्सुक दिख रहे थे।
मैं उन सभी नौजवानों को (जो सही राह पर वापस आ चुके थे)लेकर सरेंडर करने के लिए नजदीकी पुलिस स्टेशन जा रहा था,कि तभी कुछ भटके नौजवानों ने पीछे से फायरिंग करना शुरू कर दिया।हम सभी ने भी जो हमारे पास हथियार थे उससे उनपर जवाबी हमला किया।लगातार दोनो ओर से फायरिंग चालू थी।मैने भी पन्द्रह साल के बाद,अपने हाथ में हथियार उठाया था।पर इस बार की बात ही कुछ और थी।इस बार मानवता के खातिर हथियार उठाए थे।अगर वो भटके राही इस दुनिया में रहेंगे तो वो केवल आतंक ही समाज में फैलाएंगे, और इससे मानव जाति पर खतरा मंडराता ही रहेगा।तो अच्छा रहेगा कि वे रहे ही नहीं।
मेरे साथ वालों ने लगभग मेरा साथ छोड़ चुके थे।मेरे सर को छूती हुई जो बुलेट गई,उसने मुझे झकझोर कर रख दिया था।इधर से गोली बारी बन्द होने के कारण सामने वालो को ऐसा प्रतीत हुआ कि हम सभी मारे जा चुके हैं।तो उन्होंने हमारे तरफ किसी एक को देखने के लिए भेजा।मेरे बगल में पड़े साथी के पास मशीन गन पड़ी हुई थी।मैं भी खुद को उन्हें मरे हुए की हालत में दिखाने को,वहीं चुप चाप लेटा हुआ था।
उनके बन्दे ने निरीक्षण करके बोला कि सभी मर चुके हैं।फिर सभी लोग हमारे तरफ आने लगे।मैने सृष्टि चलाने वाले सभी ईश्वर,अल्लाह,राम,यीशु,वाहे गुरु का नाम लिया और पड़ी हुई मशीन गन उठाकर उन सारे आतंकियों पर फायरिंग शुरू कर दी,और उन्हें वहीं मार गिराया।और ईश्वर से उन सभी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
ये कैसे हुआ मुझे पता नहीं,इतना विश्वास मुझमे कैसे था,कि उस पड़े मशीन गन में गोलियां उतनी हैं,जिससे इन दस बारह आतंकियों को मार गिराया जा सके।ये मुझे पता नहीं।ये ईश्वर की मौज ही थी,कि इन आतंकियों द्वारा कोई रिहाना या पिंकी के घर में मातम का माहौल अब नहीं रहेगा,ये सोचते सोचते मैं बेहोशी की हालत में चला गया।
मेरे खून इतने बह चुके थे कि मेरा बचना नामुमकिन सा था और मैं कोमा में चला गया।दस साल के बाद जब मुझे होश आया,मैं बिल्कुल अकेला सा एक हॉस्पिटल के रूम में सारे मशीनों के बीच में पाया।तभी नर्स ने डॉक्टर को आवाज़ दिया।डॉक्टर ने आकर मेरा चेक अप किया,और फिर मुझे मेरी हालत पूछा।फिर किसी ने पुलिस को मेरे होश में आने की खबर दे दी ।पुलिस ने आकर मुझसे उस हमले की जानकारी ली।और फिर बताया कि मेरे चलते घाटी के बहुत से भटके बच्चे सही राह पर आ गए हैं।उनमें से एक वो डॉक्टर भी है,जो आपका आज चेक अप किया था।
मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था,इतनी खुशी तो शायद स्वर्ग या जन्नत पा लेने पर भी नसीब नहीं होती,जितनी उस वक़्त थी।

आमीन।।


Written by sushil kumar

4 Jul 2019

मेरा टाइम आ गया।

मेरा टाइम आ गया।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।

मेरी कहानी काल्पनिक है,इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नही है।

अध्याय:-1

मेरी हालात नाजुक थे,मैं मर रहा था।मैने चूहा मारने वाला दवा जो खा लिया था।ऐसी मजबूरी आई क्यों?आइए हम पाँच वर्ष पूर्व चलते हैं।


अध्याय:-2

मैं यानी सुशील कुमार,बहुत ही सभ्य,सुशील और शांत स्वभाव का लड़का था।दो वर्ष पूर्व मुझे बैंक में नौकरी लग गई थी।मेरी उम्र आज पच्चीस की हो गई थी।शादी के लिए रिश्ते घर पर आने लगे थे।कोई लड़की के माता पिता मेरे माता पिता से मिल मेरी सारी जानकारी लेकर मुझसे मिलने,मेरे पोस्टिंग की जगह यानी सतना आने वाले थे।सतना मध्यप्रदेश का एक छोटा सा शहर है,जो कि मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बॉर्डर पर स्थित है।मैं वहाँ पर एक छोटे से कमरे में गुजारा करता था।
अब सम्भावित पत्नी के पिता और माता,यानी सम्भावित ससुर और सम्भावित सासु माँ आ रहे हैं,तो उनका विशेष ध्यान तो रखना ही पड़ेगा।चलो उनका नहीं तो अपने माँ बाप के इज्जत का ख्याल तो रखना ही पड़ेगा।कहीं ऐसा ना हो कि ये वापस जाकर माँ बाबू जी से शिकायत कर दें,कि बच्चे में आपके बिल्कुल संस्कार नाम की चीज़ ही नहीं है।हमे भगवान भरोसे छोड़ वह चला गया था,या नहीं आया था।
चलिए उनका आने का दिन आया।मेरे पास एक अननोन नंबर से फोन आया।उस समय दोपहर के तीन बजे रहे थे।

मैं: हेलो
सामने से:- हाँ बेटा,हम सतना दो घण्टे में पहुँचने वाले हैं।
मैं:-जी,कौन सी ट्रैन से आ रहे हैं,आपलोग?
सामने से:-मुम्बई एक्सप्रेस है।गाड़ी नम्बर रुकिए देखकर बताता हूँ।
लगभग एक मिनट होने वाला था,तभी फोन से एक आवाज़ और भी सुनाई देती है, किसी स्त्री का,अरे जल्दी कीजिए,दामाद जी को कितना वैट करवाईएगा।
सामने:-बेटा जी गाड़ी का नम्बर है,12142।
मैं:- जी ये तो सुबह ही पहुँच जाती है,सतना।
सामने:-दरअसल पटना से ही काफी लेट खुली थी।
मैं :-(मन ही मन,अच्छा हुआ,वरना आज आफिस से छुट्टी लेनी पड़ जाती)जी अच्छा।
सामने से:-बेटा जी एक कष्ट कीजिएगा,अपना अपॉइंटमेंट लेटर और सैलरी स्लिप अपने साथ ले आइएगा।
मैं:- जी,बिल्कुल।
सामने से:-चलिए आकर मिलते हैं।
मैं:-जी,आइए ना।फोन रखते हैं,प्रणाम।
सामने से:-जी प्रणाम,प्रणाम।
मानो सासु माँ के भी तरफ से इन्होंने प्रणाम किया हो।कहीं दामाद जो को बुरा ना लग जाए।

मैंने फ़ोन पर ट्रैन की स्टेटस चेक किया,पता चला कि ट्रैन दो घण्टे में पहुँचने वाली है।मेरी पोस्टिंग उस वक़्त सतना से लगभग 20की.मि. की दूरी पर स्थित छोटे से शहर नागोद में थी।हर रोज सतना से अप डाउन करता था,बस से।नागोद से सतना आने में मुश्किल से 20 मिनट समय लगते थे।मैने अपने दिमाग में उस तरीके से कैलकुलेशन कर,सतना पहुँचने का प्लानिंग कर लिया,कि एक तो उनसे आधे घण्टे पहले पहुँच कर वही स्टेशन के पास में स्थित किसी होटल में उनके ठहरने का व्यवस्था कर देंगे।
उसी हिसाब से मैं चार से सवा चार बजे तक निकलने का फैसला लिया।सतना स्टेशन पहुँचने के बाद होटल साई पैलेस में एक ए.सी. कमरे की बुकिंग मैने एक दिन के लिए अपने नाम से करवा ली।क्योंकि उस होटल का हमारे यहाँ एकाउंट था,उन्होंने मुझे 50% डिस्काउंट पर,एक हज़ार रुपये में एक कमरा दे दिया।साथ में कंप्लीमेंट्री ब्रेकफास्ट भी था।मैंने चाभी लेकर अपने कमरे की मुआयना भी करली।कमरे और बाथरूम बिल्कुल साफ थे।कमरे की ए.सी. भी चल रही थी,बाथरूम का फ्लश वगैरह सभी सही सलामत चल रहे थे।उनके ट्रैन की स्टेटस मैने फोन पर चेक किया,तो पता चला पाँच मिनट में ट्रेन पहुँचने वाली है।मैं फटाफट स्टेशन पहुँच गया,उन्हें रिसीव करने के लिए।उसी ट्रैन की अनाउंसमेंट लगातार जारी थी।
तभी मेरी फोन की घण्टी बजी।उसमें प्रोबेबळ ससुर जी के नाम से कॉल आ रहा था,मैने ऐसा नाम किस लिए रखा था,ये बताने की आपको जरूरत नहीं है।इतने तो समझदार आपलोग होंगे।
मैंने फोन उठाया।

मैं:- जी प्रणाम।
सामने से:-प्रणाम प्रणाम।
मैं:- जी हम स्टेशन आ चुके हैं।
सामने से:-जी ठीक है।आप टिकट काउंटर के पास ही मिलिए।एक नंबर से ही बाहर निकलना है ना।
मैं:-जी जी बिल्कुल।
सामने से:-ठीक है,अब ट्रैन स्टेशन पहुँच गई है,हम आ रहे हैं।प्रणाम।
मैं:-जी प्रणाम।

मैं टिकट काउंटर पर जाकर खड़ा हो गया,और उनका इंतज़ार करने लगा।मेरा जी बहुत घबरा रहा था।आखिर घबराएगा भी क्यों नहीं?बिल्कुल सीधा साधा जो था।
तभी फिरसे प्रोबेबळ ससुर जी के नाम से कॉल आया।मैंने फोन उठाया,और इधर उधर नज़र दौड़ाया।एक पचास से पचपन साल के वृद्ध को फोन को कान पर लगाकर बात करते देख,उनके पास पहुँच गया।
मैं:- हेलो(फोन पर)
सामने वाले वृद्ध के पैर छूने लगा।
मैं:-जी प्रणाम।
वृद्ध:-खुश रहो!खुश रहो!
फोन से:-बेटा हम इधर हैं।तुम्हारे पीछे।
मैं पीछे मुड़ा।
मैं:-अरे आप इधर हैं।
प्रोबेबळ ससुर जी:-लगता है आपको कंफ्यूजन हो गया।
मैंने दोनो के पैर छुए।दोनो ने खुश रहिए ही कहा।
मैं:-चलिए पास में ही होटल है।
प्रोबेबळ ससुर जी:-चलिए।
रास्ते में उन्हें साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहा था,लेकिन वो बार बार मुझे आगे चलने को कह रहे थे।मानो मेरी हाइट को वो अपनी आँखों से नापने की कोशिश में थे,या देखना चाहते थे कि पैर से दामाद जी ठीक हैं की नहीं,कहीं लंगड़ाते तो नहीं हैं?
हम होटल पहुँचे।
प्रोबेबळ ससुर जी:- अरे दामाद जी होटल की बुकिंग करके रखी थी आपने?
मैं:- जी जी।
प्रोबेबळ ससुर जी:-बहुत बहुत आपका धन्यवाद।
मैं:-जी धन्यवाद बोलकर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए।आप लोग फ्रेश हो जाइए।आपके लिए कुछ खाने को मँगवा देता हूँ।
प्रोबेबळ ससुर जी:-ठीक है।
मैं होटल के रिसेप्शन पर गया,और शाम का मेनू पूछा।फिर बड़ा सोच कर 1 प्लेट वेज पकोड़ा,तीन समोसा,तीन गुलाब जामुन और तीन टोमेटो सूप का आर्डर किया।फिर रोका और आर्डर में चेंज किया,क्योंकि मुझे लगा ये तो खाना ही हो जाएगा।वेज पकोड़ा उसमे से कटवा दिया।और बोला रूम नम्बर 203 में पहुँचा दीजिए।ये आर्डर का पेमेंट अपने पर्स से निकाल कर मैने कर दी।
कुछ देर बाद।
प्रोबेबळ ससुर जी का फोन आया।
मैं:-जी बोलिए।
प्रोबेबळ ससुर जी:-कहाँ हैं,हम फ्रेश हो लिए हैं।आइए नाश्ता आया है।साथ में नाश्ता करते हैं।
मैं:-जी आया।(मुझे ऐसा आभास हुआ कि इन्होंने भी कुछ आर्डर कर दिया है)
कमरे में जब पहुँचा तो पाया कि मेरा ही आर्डर किया हुआ नाश्ता, वहाँ स्टूल पर रखा हुआ है।
मैं:-आप काफी थक गए होंगे।
प्रोबेबळ ससुर जी:-नहीं बेटा जी,आराम से सोते सोते आए हैं।मैं:-जी
प्रोबेबळ ससुर जी:-लीजिए नाश्ता कीजिए,ठंडा हो जाएगा।
(फिर हम सभी ने नाश्ता किया,प्रोबेबळ ससुर जी ने बिच बिच में लम्बा लम्बा धकार भी लिया।
मैं:-जी आप मिनरल वाटर पिएँगे या नार्मल वाटर।
प्रोबेबळ ससुर जी:-मिनरल वाटर हो तो ज्यादा अच्छा होगा बेटा जी।
मैंने रिसेप्शन को फोन कर तीन बिसलेरी बोतल का आर्डर कर दिया।
प्रोबेबळ ससुर जी:-आइए बैठिए बेटा जी।
मैं वहीं रखे पास कुर्सी पर बैठ गया।
प्रोबेबळ ससुर जी:-अच्छा बेटा जी सैलरी स्लिप और अपॉइंटमेंट लेटर लेकर आए हैं।
मैं:-जी
(अपना जेब टटोलते हुए)
मैं:-ये लीजिए।
पहले तो उन्होंने खुद चेक किया,फिर अपनी बीबी को भी दिया।
प्रोबेबळ ससुर जी:-अच्छा बेटा जी अभी आप मैनेजर हैं।
मैं:-जी नहीं।अभी मैं अफसर हूँ।एक साल के बाद मैं मैनेजर के पोस्ट के लिए एलीजिबल हो जाऊँगा।
प्रोबेबळ ससुर जी:-हुम्म।कितना सैलरी आपका हो जाएगा इसके बाद।
मैं:-पचपन हज़ार के आस पास तो हो ही जाएगा।
प्रोबेबळ ससुर जी:-गुड।
मैं:- जी।
प्रोबेबळ ससुर जी:-आपका क्या हॉबी है?
मैं:-मुझे क्रिकेट खेलना बहुत पसंद है।
प्रोबेबळ ससुर जी:-जी बहुत अच्छा।मेरा भी बेटा बेटी क्रिकेट खेलना बहुत पसंद करता है।
मैं:- जी।
प्रोबेबळ ससुर जी:-चलिए अच्छी जोड़ी बनेगी आपलोगों की।
ये लीजिए फोटो,मेरी बिटिया सविता की।
मैं फोटो लेते हुए।
प्रोबेबळ ससुर जी:-कैसी लगी।
मैं:-जी अच्छी है।
प्रोबेबळ ससुर जी:-अभी सविता पी.एन.बी. में प्राइवेट जॉब कर रही है।अभी उसकी पोस्टिंग बंगलोर में है।मैं उसे बोलता हूँ कि एक सप्ताह के लिए यहाँ आ जाएगी।आप लोग एक दूसरे को अच्छे से समझ बुझ लीजिएगा।है कि नहीं।
मैं:-जी।(जरा हिचकते हुए)
प्रोबेबळ ससुर जी:-तो ठीक है,कल हमारी ट्रेन है,सुबह सुबह 6 बजे की।हम आपके मम्मी पापा से मिलने परसों पहुँचेंगे।उन्हें बता दीजिएगा कि आपको सविता पसन्द है।ठीक है।
मैं:-जी जी।बिल्कुल।
(मन में सोचते हुए,मुझे तो लड़की कुछ खास लगी नहीं,पर उसके मम्मी पापा भी कुछ ज्यादा ही फॉरवर्ड लग रहे हैं।पता नही आज के समय कौन सा माँ बाप अपनी बच्ची को किसी गैर के पास एक दूसरे को समझने बुझने के लिए भेजता है?शायद इन्हें मेरी संस्कार देख ,मुझपर अत्यधिक भरोसा हो गया होगा?वगैरह वगैरह मेरे मन में ख्याल आया रहे थे।
मैं:- चलिए डिनर का समय हो गया।क्या खाइएगा?
प्रोबेबळ ससुर जी:-पनीर मखनी,दाल और तावा रोटी सही रहेगा।
मैं:-जी जी।
मैने रिसेप्शन पर फ़ोन कर के खाना मँगवा लिया।
और टीवी ओन कर दी।पाँच मिनट में डोर बेल बजा।
प्रोबेबळ ससुर जी:- देखिए बेटा जी लगता है,खाना आया।
मैं:-जी जी।देखता हूँ।
प्रोबेबळ ससुर जी:-चलिए आइए खाना खा लेते हैं।
हमने साथ मे खाना खाया।फिर मैं उन्हें गुड नाईट बोलकर रूम से बाहर निकल गया।
मैं अपने रूम में जब पहुँचा, माँ को फोन लगाया और सारी घटनाओं को विस्तार से बताया।माँ बोली कि देख बेटा, लोग तो तुम्हें देखने आते रहेंगे,अगर तुम सब का खर्चा उठाओगे,फिर तुम अपना महीना कैसे चलाओगे?तुम्हे रूम बुक करना चाहिए था केवल, पैसे नहीं देने चाहिए थे।खाने का खर्चा भी तुमने ही उठाया।और वो लोग कैसे लोग थे,कहीं का भी खर्चा नहीं उठाया।बिल्कुल ही कंजूस लोग थे क्या?।फिर मैने जब उन्हें ये बताया कि वे सविता को मेरे पास सात दिनों के लिए भेजना चाह रहे थे,ताकि हम दोनों एक दूसरे को अच्छे से समझ सके।फिर तो माँ बहुत ज्यादा ही क्रोधित हो गई।फिर उन्होंने पूछा कि मुझे लड़की कैसी लगी?मैंने बताया,कुछ खास नहीं ।और उससे शादी करने को मैने मना कर दिया।
इस घटना से मुझे एक सबक तो मिला था कि कोई भी आए मुझे देखने के लिए,अब मैं एक पैसा भी खर्च नहीं करूँगा।इस बार मेरे पॉकेट से एक दिन में छह हजार का फ़टका लग चुका था।मैं बहुत ही अपसेट था।

अध्याय:-3

उसके बाद जब भी कोई देखने को आता,मैं उन्हें रिसीव करने नहीं जाता।साथ में ये भी बता देता कि काम का बोझ बहुत ही ज्यादा है,स्टाफ की बहुत ही शॉर्टेज है,तो मैं आपको रिसीव करने नहीं आ पाऊँगा।कोई भी जिद्द नहीं कर पाता था।अगर कोई पूछता कि स्टेशन के आसपास के कोई अच्छे होटल का एड्रेस दे दीजिए,तो उन्हें साई पैलेस होटल का नाम बता देता था।फिर क्या?शाम को आराम से किसी रेस्टोरेंट में हम मिलते थे,बात चीत होती थी।मैं अपने अपॉइंटमेंट लेटर और सैलरी स्लिप हमेशा साथ लेकर जाता था।और अगले दिन कोई कोई हमारे बैंक में आते थे,कुछ देर ब्राँच मैनेजर और स्टाफ से बात चीत कर वहाँ से भी निकल जाते थे।मुझे कोई लड़की पसन्द नहीं आ रही थी।

अध्याय:-4

मेरे माँ पिता मैं और मेरी बहन सत्संग से जुड़े हुए हैं।सत्संग यानी राधास्वामी व दाता दयाल के मत के सत्संग से।मुझे भी अपने मालिक पर बहुत ही ज्यादा श्रद्धा और भरोसा है।अब मेरे कहानी पर आते हैं।मेरे मालिक की बहू,जिन्हें हम दीदी कहते थे,उन्होंने अपनी बहन की बिटिया कविता से मेरी शादी की बात मेरे पापा मम्मी से की।हमारे माँ पापा के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात नहीं हो सकती थी कि उनके साथ हमारा सम्बंध बने।दोनो परिवारों में बात चली।बात आगे बढ़ने पर कविता के माँ पापा और उसके चाचा मुझे देखने सतना आने का प्लान बनाने लगे।मुझे जब पता चला कि मेरा रिश्ता दीदी(मालिक जी की बहू) के बहन के घर में हो रहा है,तो मैं दिल ही दिल बहुत खुश हुआ था।
इस बार मैं पूरा सोच कर रखा था कि सारा खर्चा मैं ही उठाऊँगा।उनका आने का दिन फिक्स हुआ।पर मुझे एक बार भी किसी का फोन नही आया।ये पहली बार हुआ कि मैं कस्टमर से घिरा हुआ था,और पीछे कुछ अनजान लोग खड़े हो मेरे कार्य को देख रहे थे।पर मैं भीड़ में इतना वयस्त था कि उन्हें नोटिस कर ही नहीं पाया।फिर जब मैं भीड़ से खाली हुआ तो उनमें से एक व्यक्ति आकर अपना परिचय हमें देते हैं,कहते हैं कि वे कविता के चाचा हैं,वो जो दोनो उधर खड़े हैं,वे उसके माता पिता हैं।मैं अपने चेयर से उठ खड़ा हुआ और सभी के पैर छुए।फिर कविता के पापा ने मुझे होटल कमल में शाम को आने को कहा।और फिर वो हमसे विदा लेकर अपने होटल की ओर प्रस्थान किए।
मैं शाम में बैंक से सीधे होटल कमल में पहुँचा।और उन्हें फोन कर उनसे उनका कमरे का नम्बर पूछा।जब कमरे में गया तो उन्होंने हमें बैठने को कहा।फिर सवालों की बारिश शुरू हो गई।मैने भी उनके सारे सवालों का जवाब दिया।
पापा:-आपकी हॉबी क्या है?
मैं:-क्रिकेट खेलना,कविता लिखना।
चाचा :-क्रिकेट में कौन सा खिलाड़ी आपको पसंद है।
मैं:-महेंद्र सिंह धोनी
पापा:-आपने होटल मैनेजमेंट भी किया हुआ है।
मैं:- जी।
पापा:-फिर तो आपको खाना बनाना आता ही होगा।
मैं:-जी।
चाचा :-क्या क्या बना लेते हैं?
मैं:-जी लगभग सब कुछ।
(मन ही मन,अच्छा है ये केवल इंटरव्यू है,अगर प्रैक्टिकल होता,तो फँस ही गया था।)
पापा:-आपको कैसी लड़की पसन्द है?
मैं:-सुंदर हो,सुशील हो,समझदार हो।
पापा:-अगर सांवली हो तो चलेगा।
मैं:-जी ।सनकुचाते हुए।
पापा:-बिल्कुल मेरे जैसी है।
(मन ही मन,पर आप तो घने सांवले हैं,बाप रे)
मैं:-जी,चलेगी।(हिम्मत बाँध कर बोला)
फिर हम रेस्टॉरेंट में गएँ डिनर करने के लिए।
पापा:-बताइए सुशील जी क्या खाएँगे(मेनू कार्ड मेरे तरफ बढ़ाते हुए)।
मैं:-जी आपलोग जी आर्डर कीजए ना।
पापा:-अरे आप होटल मैनेजमेंट किए हैं,हमसे ज्यादा ज्ञान खाने का आपको ही होगा।चलिए फटाफट टेस्टी टेस्टी खाने का आर्डर कीजिए।
मैंने भी मेनू कार्ड पढ़कर,सभी लोगो के लिए आर्डर कर दिया।

उन्हें मैं शायद पसन्द आया था,मुझे भी वे पसन्द आएँ थे।पर एक बात दिल में खटकती रह गई,ऐसा क्यों बोला उन्होंने की कविता बिल्कुल उनकी ही जैसी है।बाप रे।

अध्याय:-5

बहुत बार कोशिशें हुईं,पर नाकाम रहीं हमें(मुझे और कविता को) मिलाने के लिए।मेरे माँ पिता और बहन कविता को देखने और मिलने पटना के एक रेस्टॉरेंट में गएँ।मुझे उन्होंने कविता के बारे में जो बताया वो कल्पनीय था ,बहुत ही सुंदर और सुशील लड़की है,तुम दोनों की जोड़ी बहुत ही अच्छी लगेगी।मैं उसके कल्पनाओं में डूब गया।
जब मैं घर गया,तो मुझे उसकी फोटो मुझे दिखाई गई।जिसे देख मेरे आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।कैसा चेहरा दिख रहा है, फोटो में इनका,न कोई चमक है,ना कोई सुंदरता है,बिल्कुल उदास उदास दिखती है।पर माँ ने बताया कि फोटो पर मत जाओ,असल में बहुत ही सुंदर है कविता।मेरी बहन और पापा जी ने भी माँ के बातों में हामी भर दी।मुझे भी अपने परिवार के बातों पर विश्वास हो गया था।


अध्याय:-6

मेरी इंगजमेंट कविता के साथ हुई।बहुत ही भव्य आयोजन किया गया था।मैं स्टेज पर बैठ पूजा कर रहा था।पंडित जी मन्त्र का उच्चारण किए जा रहे थे।मेरा दिल यहाँ धड़का जा रहा था,कि लड़की मुझे पसंद आएगी या नहीं।मेरी पूजा समाप्त हुई,मैं अपने आसन पर जाकर बैठ गया।कविता को उसकी चाची स्टेज पर लेकर आई।कविता को एक झलक जो देखा,मेरी तो आँख ही चोन्धरा गई।गजब की सुंदरता की मूर्ति वो दिख रही थी।बड़े बड़े आँखें, सुंदर नाक नक्स क्या बात है।मैं अपने मालिक जी को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था।और साथ मे माँ, पिता और बहन को भी।फिर रस्म शुरू हुई,हमने एक दूजे को अंगूठी पहनाई।जो उसने मेरा हाथ को छुआ तो मुझे ऐसा आभास हुआ कि कितना पुराना रिश्ता है हमारा।बहुत ही अदम्य अहसास था वो।उस पल को मैं जब भी याद करता हूँ तो सिहर जाता हूँ।
फिर साथ में हमने खाना खाया।और अपना विजिटिंग कार्ड उसे दे दिया।पर जब उससे उसका नम्बर माँगा, तो उसने देने से मना कर दिया।

अध्याय:-7

वो दिन याद है,जब मुझे विदा करने को कविता अपने भाई बहनों के संग पटना स्टेशन पर आई थी।दरअसल मैं देवघर,अपने घर से सतना जा रहा था।मेरी सतना वाली ट्रैन पटना से खुलती थी।मैं जब पटना स्टेशन पर अपनी सतना वाली ट्रेन के लिए वैट कर रहा था,जिसके आने का समय अभी भी दो घण्टे पश्चात का था,मेरे फोन की घण्टी बजी।कविता का फोन था।
कविता:-स्टेशन के बाहर आइए,हमलोग आपसे मिलने के लिए आए हुए हैं।
मैं:-क्या?सही में।
मैं जब बाहर निकला तो पूरी फौज को पाया ।सारे भाई बहन के साथ मे आई थी वो।उस दिन भी कविता बहुत ही सुंदर दिख रही थी।मैं उससे बहुत ही ज्यादा प्यार करने लगा था।
वो मेरे लिए रास्ते का भोजन बनाकर लाई थी।फिर हमें गाड़ी में अकेले छोड़ सभी बाहर निकल गएँ।हम दोनों ने बहुत सारी बातें की।समय कब निकलता चला गया,पता ही नही चला।फिर मैं सभी से विदा ले आगे की सफर पर निकल पड़ा।

अध्याय:-8

इंगेजमेंट और शादी के बिच में तीन महीने का गैप था।हम घण्टों फोन पर बिता दिया करते थे,फिर भी मन था कि भरता ही नहीं था।एक दूसरे को समझने का ,एक दूसरे के परिवार को बुझने का ये सुनहरा मौका था।वो एक आध्यात्मिक लड़की थी।बाबा(भोले बाबा) और माँ(पार्वती माँ) पर असीम श्रद्धा रखने वाली।मैं भी आध्यात्मिक था,पर मेरा झुकाव राधास्वामी और दाता दयाल के मत के सत्संग  की ओर था।अक्सर हम दोनों के बिच में आधात्मिक चर्चाएं होती ही रहती थी।

अध्याय:-9

हमारी शादी काफी धूम धाम से हुई।विदाई का समय आया।सभी लोगों के आँखों से अश्रु की धारा बहने को व्याकुल सी दिख रही थी।उनकी हालत देख,मेरा दिल भी बेचैन सा हो रहा था।रह रह कर मेरे आँखों में अश्रु छलके जा रहे थे।और वीडियो रिकॉर्डिंग वालों को इससे अच्छा सीन कहाँ मिल सकता था।दुल्हन की विदाई में दूल्हे की आँखों में आंसू।वाह-वाह।कविता एक पल के लिए भी नहीं रोई।
फिर जब विदाई हमारी हो गई।हम लगभग एक कि.मि. भी नही पहुँचे होंगे,तो वो रोना शुरू कर दी।बहुत चुप करवाते करवाते शांत हुई,और फिर सो गई।मैं और कविता पन्द्रह दिनों की छुट्टी बैंक से लेकर आए थे।मैने उसे पूरा देवघर घुमाया।उसे बहुत अच्छा लगा।मुझे उसकी खुशी देख बहुत आनन्द आ रहा था ।दस दिनों में ही वो काफी घुल मिल गई थी सभी से।

अध्याय:-10

हम दोनों शादी के बाद लगभग एक साल अकेले रहें।पर उस दूरी में भी हमारा प्यार उफान मारता रहा।हम और भी करीब एक दूसरे के आ गए थे।फिर मेरा प्रमोशनल ट्रांसफर हुआ,और मैं मुम्बई आ गया।तीन साल तक हम साथ रहे,एक दूसरे के साथ में खुश थे।उन दिनों हम दोनों में खटपट भी हो जाया करती थी,पर हम ज्यादा देर एक दूसरे से अलग भी नहीं रह सकते थे,और शाम होते होते हम दोनों में सुलह भी हो जाया करती थी।कविता हमारे बच्चे को गर्भधारण कर चुकी थी।मेरे माँ पिता और कविता के माँ पिता ने आकर उसकी सम्हाल किए।और छह महीने के बाद डॉक्टर से चेक आप करवाया और पटना लेकर कविता को चले गए।क्योंकि पटना में पापा(ससुर जी) की बहुत सारे डॉक्टरों से अच्छी पहचान थी और सारी सुख सुविधाएं उपलब्ध थी,इसलिए कविता के लिए उससे उचित जगह मुझे कहीं और दिखी नहीं।

अध्याय:-11

मैं यहाँ, तुम वहाँ।मैं हमेशा फोन पर उससे बहुत सारी प्यार भरी बातें किया करता था,और उसे मेंटली सपोर्ट किया करता था।
मैं बैंक में था,मेरे पास फोन आया पापा का(ससुर जी)।आ जाइए बच्चा वेंटिलेटर पर है।मैं बहुत डर गया था।और आँखों से अश्रु निकल पड़े थे।मैने माँ को फोन किया,वो रो रही थी कि बच्चे को साँस लेने में दिक्कत हो रही है,पता नही अभी कैसा होगा।उसे अंदर ले गए हैं।
मुझे रोते देख सारा बैंक का स्टाफ मुझे घेर लिया था।और मुझसे रोने का कारण पूछने लगे थे।मेरी खबर सुन उन्होंने मुझे तुरन्त पटना जाने को कहा।मैने भी फटाफट फ्लाइट की टिकट बुक की,और टैक्सी ले कर निकल पड़ा।वो पल मेरे जीवन का सबसे भारी पल था।
फ्लाइट में भी दिल कहाँ रुक रहा था।लागतार आँसू मेरे आंखों से निकले जा रहे थे।मन भी विचारों की उफान में मचल रहा था।किसी तरह पटना पहुँचा।जब हॉस्पिटल पहुँचा, तो पता चला मेरा बेटा निकल लिया है,बिना बाप से मिले ही निकल लिया।क्या मैं इतना पापी था,कि मैं अपने बच्चे से भी ना मिल सका!उसे अपने गोद में भी ना उठा सका, वगैरह वगैरह सवाल मेरे दिमाग मे घूमने लगे।मैं रोया,खूब रोया,जी भर कर रोया।
मेरी पत्नी को प्रेगनेंसी के दौरान एक कन्धे के बोन का डिसलोकेशन हो गया था।डॉक्टर ने फिजियोथेरेपी एक्सरसाइजेस करने की सलाह दी थी।
उसी दौरान मेरी प्रोमोशन क्लियर हुआ,और मुझे मुंबई से हटा पुणे ज़ोन भेज दिया गया।

अध्याय:-12

पुणे जोनल आफिस में रिपोर्टिंग के समय मैने अपनी पत्नी की प्रॉब्लम शेयर की थी,पर उन्होंने मेरी एक ना सुनी,और मुझे उठाकर गोआ भेज दिया।मैनेजमेंट इतना निर्दय कैसे हो सकता है?मैं सोच सोच कर परेशान हो गया था।एक साल  कट चुके थे।मेरी पत्नी की जो प्रॉब्लम थी,वो भी भयावह रूप ले ली थी।उसे स्पॉन्डिलाइटिस ने जकड़ लिया था।मैं मन ही मन बहुत दुखी रहने लगा था।माँ बाप साथ आकर रह नहीं सकते थे,क्योंकि वो खुद वृद्ध हो चुके थे और बहन की शादी की जिम्मेदारी अभी भी उनके कंधे पर थी।मैं बहुत परेशान और टेंस रहने लगा था।डॉक्टर ने कविता को साफ साफ भारी समान उठाने से मना किया था।मैनेजमेंट ने अलग परेशान करके मुझे रखा हुआ था,कि लोन क्यों नहीं बाँट रहे हो,ब्रांच में बैठे रहते हो।मेरा सर फटता सा जा रहा था।उन्ही टेंशनो से निजाद पाने को मैने चूहे मारने की दबा खा ली थी।

अध्याय:-13

जब होश आया तो मैं खुद को सभी से घेरे हुए पाया।पत्नी,माँ, पापा सभी मुझे घेरे हुए थे।सभी के आंखे डबडबाई हुई थी।मेरी गलती की एहसास मुझे हो चुकी थी।उस दिन लगा मुझे कि मैंने पुनर्जन्म पा लिया हो।मेरी जिम्मेवारी अभी बाकी थी,मैने कैसे इतना गलत कदम उठा लिया था।और कसम खाई कि अब कभी भी ऐसे घिनौने काम को अंजाम नहीं दूँगा,भले नौकरी छोड़ दूँगा, पर सुसाइड एटेम्पट कभी नहीं करूँगा।

Written by sushil kumar

2 Jul 2019

अंकिता ड्रीम्स।

अंकिता ड्रीम्स।

kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठको को समर्पित है।



कभी सोचा ही नहीं था,कि कभी ऐसे दिन भी देखने पड़ेंगे।ऐय्यासी की जिंदगी से सीधे एक एनजीओ में वालंटियर बन काम करने में मशगूल था।मैं देवेश राज,एक नामी गिरामी बिजनेसमैन कल्पेश राज का इकलौता बेटा।
मेरे पापा बहुत ही अनुशासन प्रिय इंसान थे और मैं उनका बिल्कुल ही उल्टा।आराम से सुबह उठना, रात को देर रात तक जागना,दोस्तों के संग घूमना,फिरना,ऐय्यासी करना बस मज़े में जिंदगी कट रही थी।मेरे आगे पीछे लड़कियों की लाइन लगी रहती थी।सभी मेरे साथ दोस्ती करने को किसी भी हद्द तक जाने को तैयार रहती थी।पर मुझे उनमें किसी भी प्रकार की दिलचस्पी नहीं थी,इसलिए उनको मैंने कभी भाव दिया नहीं।
मेरे दोस्त भी गिने चुने ही थे,जो मेरे लेवल के थे।
फिर कॉलेज में हमने दाखिला लिया।वहाँ एक लड़की ने एडमिशन लिया,जो सावली सी,बाल सीधे सीधे,पर नाक नक्स जबरदस्त थे।मैंने उसे भी भाव नही दिया।पर कुछ तो बात थी जो मेरी नज़र दुबारा उसे ढूंढने को चारों तरफ दौड़ गई।
उसका नाम अंकिता था।वो भी मैथ्स साइंस में हमारे साथ मे थी।हमेशा वो आगे के रो में ही बैठती थी।
उसे देख ऐसा लगता था,कि कितना अच्छा होता मैं मैथ्स साइंस में एक्सपर्ट होता,और उसके साथ में बैठता।वो मुझपे विभिन्न प्रकार के सवाल दागती रहती,और मैं हँस हँस कर सारे सवालों के जवाब देता रहता,देता रहता और देता है रहता।
अब मैने तय कर लिया था कि मैं आगे वाले रो में ही बैठूंगा,वो भी अंकिता के साथ।भले मैं उसके सवालों का जवाब ना दे पाऊँ, पर उससे अपने सवालों के जवाब तो मांग ही सकता हूँ।और धीरे धीरे ही सही हमारी दोस्ती परवान तो चढ़ेगी।
यही सोच मैं आगे वाले रो में बैठ गया।मेरे बगल में अंकिता आकर बैठ गई।
देवेश:- हाई, मैं देवेश।
अंकिता:-हेलो,मैं अंकिता हूँ।वैसे देवेश तुम कौन से स्कूल से पास आउट हो।
देवेश:- मैं सन्त जोसफ से।और तुम?
अंकिता:-मैं सन्त क्राइस्ट से पास हूँ।कितने परसेंटेज आए थे,तुम्हारे बोर्ड में?
देवेश:-ज्यादा नहीं(मन में सोचते हुए,अगर 65% बताऊँगा तो पता नहीं,पीछे बैठने को ना बोल दे) बस 90%
अंकिता:-गुड देवेश।
देवेश:- और तुम?
अंकिता:-मेरे तुमसे कम ही आए थे,82%.
देवेश:-देखो अंकिता तुम्हारे भी अच्छे ही मार्क्स हैं।
अंकिता:-हुम्।थैंक्यू।
देवेश:-मुझसे फ्रेंडशिप करोगी अंकिता।
अंकिता:-यस
फिर हमारी दोस्ती चल पड़ी।
मुझे उससे दोस्ती बनाकर रखने के लिए,पता नहीं कितने पापड़ बेलने पड़े।मैने सारे विषयों के ट्यूशन क्लासेज जॉइन किए।और सारे विषयों का अध्ययन बड़ा जोर शोर लगा कर किया।अब वो मुझसे मुझसे पूछती सवाल,मैं उसे झटाझट देता था जवाब।आखिर मुझे अपनी 90%वाली छवि जो बनाकर रखनी थी।
एक दिन अंकिता कुछ उदास उदास आकर अपने जगह पर बैठ गई।
देवेश:- क्या हुआ अंकिता, इतनी चुप चुप क्यों हो?
अंकिता:- तुम्हारे पिता का नाम क्या है?
देवेश:- कल्पेश राज।
अंकिता:- इस कॉलेज के ट्रस्टी हैं ना तुम्हारे पापा।
देवेश:-हाँ, पर हुआ क्या?
अंकिता:- तुम्हारा एडमिशन यहाँ मैनेजमेंट कोटा के तहत हुआ है।है कि नहीं।
देवेश:- (मन में सोचते हुए,इसे ये जानकारी किसने दी।साले मेरे हरामी दोस्तो ने दी होगी।)हाँ हुआ है।
अंकिता:- तुम्हारे बोर्ड में कितने परसेंटेज आए थे?देवेश!
देवेश:-65%
अंकिता:-फिर तुम सारे सवालों का जवाब कैसे दे देते थे?
देवेश:-मैने कोचिंग जॉइन कर की थी।

अंकिता उठी,और बगल वाले सीट पर जाकर बैठ गई।
मैं गुस्से में पीछे गया और अपने दोस्तों को माँ बहन की गाली दे कहने लगा।

देवेश:- मा.चो.  ब.के.लो. साले तुम लोगो के दिल को मिल गई सन्तुष्टि।
अंकिता:- देवेश इसमें इनकी कोई गलती नहीं है,मैं फेसबुक प्रोफाइल तुम्हारा चेक कर रही थी,वहाँ से सब कुछ पता चला।
मैने अंकिता से लाख माफी माँगी, पर वो मानी नहीं।पर जब वो मेरी रोज की माफी माँगने की किट किट से परेशान हो गई,तब वो कॉलेज आना ही बंद कर दी थी।
दस बारह दिन बाद जब वो नही आई,तब मैं परेशान हो गया।उसकी एक सहेली हुआ करती थी,मोनी,जिसके साथ उसका आना जाना लगा रहता था।
देवेश:-मोनी ये अंकिता कहाँ गई।आती नही है।उसका पता बताओ ना।
मोनी:-देवेश तुम्हें पता नहीं, उसे ब्रेन ट्यूमर निकला था,लास्ट स्टेज का।उसके पापा उसे बंगलोर लेकर गए थे।
देवेश:-अभी कुछ खबर आई क्या उसकी?(देवेश हकलाता हुआ)
मोनी:-हाँ, अंकिता कुछ ही दिन की मेहमान है,जैसा कि अंकल जी ने बताया था।
मुझे जिंदगी में पहली बार अपने अमीर होने पर इतनी दुख और घृणा हो रही थी।मैंने ठान लिया था कि  जिस पैसे की वजह से मेरी अंकिता दूर गई है,उसे बरबाद कर दूँगा।फिर मुझे लगा कि बरबाद करने से अच्छा होगा कि सारे गरीबो में उसे बाँट दूँगा।
अंकिता का भी सपना था कि वो आगे जाकर सोशल वर्क करेगी,और देश से गरीबी को दूर हटाने में योगदान देगी।
मेरे पापा मम्मी के दुनिया छोड़ जाने तक मैंने बिज़नेस सम्भाला।मेरी माँ पहले गुजरी,फिर पापा के गुजरने के बाद, मैने अपना सारा बिज़नेस का सिमटाव करना शुरू कर दिया।और अपने वर्कर्स को उनके मन मुताबिक मुआवजा देने के बाद,जो पैसा बचा उसे लेकर मैने एक एनजीओ का रजिस्ट्रेशन किया और उसका उदघाटन किया।और सारे पैसे  मैंने उसके खाते में जमा कर दिया।उस एनजीओ का नाम अंकिता ड्रीम्स रखा।
जब बिज़नेस में था,तब एक एनजीओ से एक वालंटियर आया था।उसे मैंने दस हज़ार रुपये का चेक दिया था।उसने अपना नाम संजय बताया।उसने अपने काम करने का तरीका बताया,मुझे बहुत अच्छा लगा।मैने उसका मोबाइल नम्बर मांग लिया।
अंकिता ड्रीम्स  के उदघाटन पर मैंने संजय को बुलाया और उसे ट्रस्टी बनने का ऑफर दिया।संजय मान गया।आज मैं वालंटियर बन गया हूँ,और झोपड़पट्टियों में बच्चोबको पढ़ाया करता हूँ।मुझे अंदर से बहुत खुशी मिलती है।मेरी अंतरआत्मा अति प्रसन्न हो जाती है।
आज अंकिता की बहुत याद आ रही है।अगर वो यहाँ होती ,तो बहुत खुश होती कि कैसे उसके सपने को पूर्ण करने में मैं लगा हूँ।

Written by sushil kumar

29 Jun 2019

मेरा दिन भी आ ही गया।

मेरा दिन भी आ ही गया।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



मैं बचपन से ही ऐसा ही हूँ,बिल्कुल शांत,खुद में ही सिमटा हुआ।भले पड़ोसी में रहने वाला संदीप पूरे इलाके में टॉप किया हो,पर मुझे उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता था।अब आप बोलोगे,ऐसा कैसे और क्यों?अब मेरी सुनो,आज उसका दिन था,उसने टॉप किया,कल आने वाला दिन मेरा होगा, उस दिन मैं टॉप करूँगा।बी पॉजिटिव:-मेरी सोच में भी थी और मेरे खून में भी ।हुम्!
पर वो कल के इंतज़ार में काफी समय निकल गया,पर वो कल नहीं आया।पर आज भी मैं हिम्मत नहीं हारा हूँ।और आज मैं एक स्ट्रगलिंग एक्टर हूँ।जो छोटे मोटे एड करने को दूसरे स्त्रगलर्स से भिड़ता रहता है।आज ही सुबह सुबह मैं बेड पर सोया हुआ था,कि मेरी फोन की घण्टी बजी।
हेलो
हाँ अकरम बोल रहा हूँ,किंग से।
मै :-हाँ बोलो सर।
अकरम:-एक एड करना है,करेगा।
मैं:-हाँ ना सर करूँगा।
अकरम:- नहीं करेगा!
मैं:- करूँगा सर।
अकरम:- एक घण्टे में घाटकोपर के राजू स्टूडियो में पहुँच।
मैं:- आता हूँ ना सर।

में फटाफट तैयार हो पहुँच गया स्टूडियो,वो भी दस मिनट पहले।
यहाँ अकरम भाई कौन हैं।
रिसेप्शनिस्ट: क्या काम है।
मैं: में कार्तिक।आज उनका फोन आया था।कुछ एड करने को बुलाया था।
रिसेप्शनिस्ट: ओके!प्लीज सीट।
मैं:- वहाँ लगे सोफे सेट पर बैठ गया।
रिसेप्शनिस्ट:- कार्तिक सर,अंदर जाइए।
मैं अंदर पहुँचा।
अकरम:-कार्तिक प्लीज कम।
फिर अकरम ने मुझे सारा सीन समझाया।
सीन कुछ ऐसा था।मेरे मोबाइल का रिंगटोन बजता है।में फोन उठाता हूँ।

मेरा दिन आ ही गया।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।


।अनजान आदमी:- सर मेरा गधा गढ्ढे में गिर गया गया है।उसे बचा लीजिए।आप सारी दुनिया की मदद करते हैं।मेरे गधे की भी मदद कर दीजिए।
मैं पहुँच जाता हूँ,शक्तिमान की भाँति, चक्कर मारते मारते।और अपने शर्ट को खोल उसके एक बाँह से गधे को बाँधता हूँ और दूसरा बाँह पकड़कर गढ्ढे से बाहर आ जाता हूँ।फिर ज़ोर लगा गधे को बाहर खींच लेता हूँ।
वो अनजान आदमी मेरे पैर पर गिर जाता है,और मुझे बहुत बहुत शुक्रिया बोलने लगता है।पर मैं उसे उठता हूँ और अपने बैग से एक नया बनियान देता हूँ।और कहता हूँ,तुम भी किंग बनियान ही पहना करो और अपने अंदर की शक्ति और ऊर्जा को बढ़ाओ।
उस एड में मेरी एक्टिंग काफी पसंद की गई थी।और मुझे एक बच्चों के शो का ऑफर आया।में बहुत की खुश था,कि आखिरकार मेरा भी दिन आ ही गया।

Written by sushil kumar

28 Jun 2019

परछाई।

परछाई।

adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



बचपन से ही मुझे किसी की परछाई कभी कभी नज़र आती थी।मैंने यह बात अपने मम्मी पापा को भी बताई थी,पर उन्होंने इस बात पर मेरी हँसी उड़ाई थी।कहा मैं हूँ ही इतना प्यारा कि कोई भी मेरे पीछे लग जाए।
पर धीरे धीरे ये बातें बड़ी आम सी होने लगी थी।फिर मैंने एक बार जब उन पिछली घटनाओं को दोहराया,तब मुझे एहसास हुआ कि ये सारी घटनाओं में एक बात की समानता थी।जब भी मैंने उस परछाई की बात मानी थी,मेरे साथ अच्छा ही हुआ था,पर जब उसके विरुद्ध कुछ किया था तो मेरे साथ बुरा हुआ था।
फिर मुझे एहसास हुआ कि ये परछाई मेरा भला ही चाहती है,ये मेरी दोस्त है।
आज मेरी उम्र उन्नीस साल की हो गई है।मै और मेरी गर्लफ्रैंड आज मूवी देखने जाने वाले हैं,और वहीं मॉल में मेरी बर्थडे की पार्टी उसे देने वाला हूँ।पर परछाई आज मूवी जाने से मानो मना कर रही हो।मैं पर परछाई की बात माना नहीं और गर्लफ्रैंड के साथ चला गया मूवी देखने।खूब पार्टी शॉर्टी करने के बाद जब वापस आ रहे थे,तब हमारी ऑटो को एक शराबी कार चालक ने जोर से पीछे से धक्का मारा।और मैं ऑटो के सामने वाले शीशे पर फेंका गया।और मेरे सर फट गए।पर मेरी गर्लफ्रैंड बाल बाल बची,उसका सर ऑटो चालक के पीठ से टकरा वापस पीछे आ गया।
मैं भी अपनी छोड़ गर्लफ्रैंड से उसकी खैरियत के बारे में पूछने लगा।मेरा खुद चेहरे पर से खून टपक रहा था।जब उसने कहा कि वो ठीक है,फिर मैंने चैन की राहत ली और धीरे धीरे आँखों के सामने मेरे अंधेरा छाने लगा।
पर जब आँख खुली तो खुद को एक अस्पताल के बेड पर पाया।वहाँ सभी लोग मौजूद थे,पापा मम्मी और मेरी गर्लफ्रैंड।मुझे होश में आते देख सभी लोग बहुत ही हर्षित हुए।
आखिर धीरे धीरे मेरी हालत सुधरी और मैं नॉर्मल रूटीन वर्क में वापस आ पाया।
फिर मुझे उस बर्थडे वाले दिन की घटना याद आई,जब उस परछाई ने मुझे पार्टी करने जाने से रोका था।पर मैने उसकी एक भी ना सुनी थी।और क्या हुआ था मेरे साथ ये तो सब को पता था।
मेरा अपना एक गांव भी था।पर वहाँ किसी के नही रहने के चलते खण्डर सा हो गया था।हमारा परिवार गर्मियों की छुट्टी में वहाँ घूमने जाने की योजना बना रहा था।पर मैं वहाँ नहीं जाने के लिए बहाना बना रहा था।लेकिन माँ और पापा के जिद्द के आगे मेरी एक भी ना चली और मुझे भी गाँव जाना पड़ ही गया।हर वर्ष पापा अकेले ही गाँव जाते थे,पर पता नहीं इस बार क्या हुआ!सभी लोग गाँव जाने को उत्सुक दिख रहे हैं।
गाँव पहुँचने के बाद हम अपने चाचा जी के पास एक दिन के लिए रुके,जो हमारे घर की देख भाल करते थे।हमारे आने से पहले चाचा जी ने पूरे घर की साफ सफाई करवा दी थी।एक दिन उनके पास रुककर हम अपने घर में हम प्रवेश किए।मुझे याद है ,मेरे दादा जी के रहते एक बार मैं वहाँ आया था।तब मैं चार या पाँच साल का था।दादा जी मुझे देख बहुत प्रसन्न हुए थे।वो मुझे अपने कंधे पर बैठा सारा गाँव घुमाए थे।ताजा ताजा मटर और चने वहाँ हमने खूब खाए थे और दादा जी से ढेर सारी कहानियां भी सुने थे।क्या सुनहरी यादें हैं वो बचपन की।आज मानो मैं अपने दादा जी को बहुत याद कर रहा हूँ।
तभी माँ ने आवाज़ लगाया कि आकर खाना खा लो,खाना तैयार है।मैंने भी बिना कुछ देरी किए माँ के पास पहुँच गया।और खाते खाते माँ से पूछा कि दादा जी की डेथ कैसे हुई थी।
माँ ने बताया कि उनकी मृत्य के बारे में ज्यादा तो पता नहीं पर दादी जी के चले जाने के बाद तुम्हारे दादा जी बहुत अकेले पड़ गए थे।तुम्हें याद होगा पापा एक बार दो महीने तक गाँव मे थे।वो इसलिए गाँव में थे क्योंकि दादा जी अकेले हो गए थे।
तो दादा जी को साथ लेकर शहर क्यों नही आ गए?
तुम्हारे पापा ने दादा जी से कहा था साथ चलने को,पर उन्हें शहर एक रद्दी भी ना सुहाता था।वो कहते थे जो दस दिन में मरना लिखा है,अगर शहर जाऊँगा, तो दो दिन में ही निकल लूँगा।
वहाँ उनका ख्याल रखने के लिए दो दो नौकर थे।एक तो घर सम्भालता था,और एक गाय की देखभाल करता था।
फिर दो महीने के बाद,एक सुबह उनके नौकर को वे मृत अवस्था में अपने कमरे में मिलें।
मेरे आँखों से अश्रु बह निकले।
एक रात मैं सोया हुआ था,तभी ऐसा आभास हुआ कि मैं बचपन की अवस्था में पहुँच गया हूँ।मुझे ऐसा लगा कि मेरे दादा जी मुझे बुला रहे हैं।मैं उठकर खड़ा हो गया,और उनके पीछे पीछे चला गया।दादा जी अपने घर के आंगन में लगे आम के पेड़ के नीचे खड़े हो गए और कुछ इशारा कर कह रहे थे,कि यहीं गड़ा है तुम्हारा समान,उसे निकालकर ले लो।
चिड़ियों की चहचाहट से जब सुबह नींद खुली,तो पाया कि मैं आम के पेड़ के नीचे सोया हुआ हूँ।मैंने अपने सपने के बारे में पापा से बताया।पापा ने उसे मज़ाक में लिया।पर मुझे घनी विश्वास होने के चलते,मैं वहाँ रहने वाले नौकर को वो जगह खोदने को बोला।आधा फीट भी नहीं खोदना हुआ होगा कि कुछ छन छन सा आवाज़ आया।मैने जोर लगाकर माँ को आवाज़ दिया।माँ भी आश्चर्य थी,कि दादा जी ने मेरे लिए क्या छोड़ कर गए हैं।एक सन्दूक था।पर उसमे कोई ताला वाला नहीं लगा हुआ था।हमने नौकर को  सन्दूक ऊपर से साफ करके अंदर पहुँचाने को कहा।और जब सन्दूक को हमने खोला,उसमें एक कागज मिला,जिस पर कुछ लिखा हुआ था।ये एक पत्र था।

प्रिय मनोहर(मेरे पिता जी)
तुम्हारी परिस्थितियों से वाकिफ हो,मैंने ये खज़ाना छिपाने की योजना बनाई है।तुम्हारा धंधा हमेशा मंदा रहता है,पर मैं अपने पोते सोनू की जिंदगी बरबाद होते नहीं देख सकता।मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ।उसकी जिंदगी सँवारने के लिए,इस खजाने को छिपा रहा हूँ।अब मैं शायद कुछ दिनों का ही मेहमान रहा हूँ।तुम सभी अपना ख्याल रखना।सभी को स्नेह व सुभाशीष।

तुम्हारा पिता

संजय चौरसिया

आज मेरी आँखें आँसुओ से सराबोर थी,माँ भी अपने आँसुओ को रोक नहीं पाई थी।मेरे दिल में दादा जी के लिए प्रेम व सम्मान और भी बढ़ गया था।

और उस समय के बाद वो परछाई भी मुझे दिखना सदा सदा के लिए बंद हो गई।मानो उसे इस संसार से मुक्ति मिल गई हो।तब जाकर मुझे एहसास हुआ,कि वो कोई और नहीं अपने दादा जी ही थे,जो सदा मेरा ख्याल रखा करते थे।मेरा दिल और भी भाव भिभोर हो उठा था।


Written by sushil kumar


25 Jun 2019

माँ।

माँ।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



कुछ लोगों के लिए माँ केवल एक शब्द है।और कुछ लोगों को केवल उनकी माँ ही केवल पूज्य है और प्यार करने योग्य है।

पर मेरे लिए माँ शब्द हर भगवान और हर रिश्ते से बढ़कर कर है।माँ एक श्रद्धा है,माँ एक विश्वास है,माँ एक बुरे समय में एक उम्मीद की आस है।संसार की हर माँ पूज्यनीय है और सम्मानीय है।

और जब कहीं भी कूटनीति और छल की जाती है,एक माँ के साथ,तो वह हमारे लिए असहनीय हो जाता है।उनके आँसू,उनके दुख मेरे मन को छलनी छलनी कर जाती है।आखिरकार एक माँ के साथ ऐसा कोई कैसे कर सकता है।जिस माँ ने अपने कोख में नौ महीने रख कर तुम्हें पैदा किया,उसी माँ को बुढ़ापे में तुमने ईश्वर के मौज पर छोड़ दिया।छिह, घिन आती है ऐसे सन्तानों की सोच पर।छिह!

Written by sushil kumar

रिश्तों में मजबूती के लिए।

रिश्तों में मजबूती के लिए।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।




आजकल शादी के रिश्ते बड़े ही नाजुक से हो गए हैं।कभी भी कोई गलतफहमी के जाल में फंस सारे रिश्ते नाते तोड़ने पर आमादा हो जाता है,इसका कोई ठोर ठिकाना नहीं है।वो पहले वाली बात नहीं रही,जो हमारे माँ और पिता के बिच हुआ करता था।पता नहीं कितने नोक झोंक हुआ करती थी।फिर भी बाद में वो साथ साथ हो जाया करते थे।पत्नियां गृहिणी हुआ करती थी।उन्हें यही संस्कार दिया जाता था कि पति देव के समान पूज्य हैं,उन्हें हमेशा उनके चरणों में ही रहना पड़ेगा।
क्योंकि उन्हें वैसे ही संस्कार ही दिए गए थे,इसलिए कभी कभी उन्हें काफी कुछ सहना भी पड़ता था।जो कि बिल्कुल ही गलत था।
पर आज महिला सशक्तिकरण के बाद महिलाओं के अंदर की महिला जाग गई है।आज सभी महिलाएँ अपनी हक़ के लिए लड़ती हुई दिखाई देती है।जो सही भी है।
पर अक्सर दोनो के अहंकार के टकराव में और कभी एक हल्की सी गलतफहमी में भी रिश्ते टूटने के कगार पर आ जाते हैं।जो कि बिल्कुल ही गलत है।
आजकल शादी होती है,पर रिश्तों में वो पहले वाली मिठास कहीं लुप्त होते जा रही है।लोगों में धैर्य खोता जा रहा है।लड़की अगर बड़े परिवार से है और लड़का छोटे परिवार से,फिर लड़की वाले लड़के पर पूरा हक जताते हैं और चाहते हैं कि लड़का उनके मुट्ठी में रहे।
अब बात ये आती है कि उन्होंने ऐसे घर में शादी ही क्यों की?
इसका पहला जवाब ये है कि लड़के वाले की डिमांड नहीं के बराबर होगी और अगर होगी भी तो बहुत कम।अब दूसरा जवाब ये है कि उनकी बेटी का वहाँ दबदबा रहेगा,आखिर बड़े घर की लड़की है जो।खाना बनाना या कोई घर का काम उसे करने को नहीं कहा जाएगा।तीसरा जवाब दमाद जी को थोड़े मोड़े महंगे उपहार देकर अपने तरफ रखना आसान होगा।और धीरे धीरे करके उसके माँ बाप से उसे अलग कर देंगे।चौथा जवाब दमाद जी कलेक्टर हैं या फिर किसी अच्छी मल्टीनेशनल कंपनी में हैं,तो आज नहीं तो कल उनके पास अच्छे खासे पैसे होंगे,जिससे मेरी बेटी को सारे सुख सुविधा का लाभ मिलेगा और उसकी जिंदगी मजे से कट जाएगी।
अब शादी करने के लिए जब कोई लड़की या लड़का देखने जाते हैं तो किसी के चेहरे पर तो लिखा नहीं रहता है,कि उनके दिल में भविष्य के लिए क्या क्या योजनाएं बना कर के रखे हुए हैं।ऐसे घर में अगर किसी संस्कारी लड़के की शादी हो जाए,तो समझो कि लड़के को और उसके परिवार को क्या क्या झेलना पड़ जाएगा भविष्य में।लड़की भी अहंकार में रहेगी और बड़े ताव में सास ससुर से बात करेगी।और लड़के पर भी अपना पहला हक़ जताएगी।और जब लड़के को सहा नहीं जाएगा तो वह उसे सुनाएगा,फिर क्या!लड़की रोते रोते बाप को फोन करेगी।उसका बाप सारे परिवार खरा खोटी सुना कर रख देगा।बाद में लड़के को प्यार से समझाएगा कि देखो तुम्हारी पहली जिम्मेवारी तुम्हारी पत्नी है।तुम दोनों के बिच ना ही हम आ सकते हैं और ना ही तुम्हारे माँ बाप।उसका अच्छे से ख्याल रखो,क्योंकि वो ही तुम्हारे बुढ़ापे में तुम्हारा साथ निभाएगी और जिंदगी भर तुम्हारा साथ देगी।हम और तुम्हारे माँ बाप तब तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे।इसलिए अपनी पत्नी का ख्याल रखो।जरा सी बड़बोली है पर दिल की साफ है।
पर अगर पिता समझदार है,और पैसे का घमंड नहीं है।तो वो अपनी बेटी को ही डाँटेगा,पर पूरा व्याख्या सभी घरवालों से सुनने और समझने के बाद।क्योंकि हर पिता अपनी औलाद की खामियां और अच्छाई दोनो को समझता है और जानता है।
ऐसे ही रिश्तों की खींचा खाँची में सम्बन्ध टूट जाते हैं।रिश्तों में लचीलापन होना आजकल बहुत ही ज़रूरी हो गया है।एकतरफा रिश्ता वहीं चलता है जहाँ मन में खोट और लालच भरा पड़ा है।


Written by sushil kumar

24 Jun 2019

धन ही सब कुछ नही होता।

धन ही सब कुछ नही होता।

Adhmari Khwahish  द्वारा आपसभी पाठको को समर्पित है।

अगर कोई गरीब है पैसे से,तो क्या उसके सपने सपने नहीं होते?क्योंकि वो अपने सपने को खरीद नहीं सकता।
ऐसी बात नहीं है।जो गरीब होते हैं,उनके सपने अमीरों के शौक को हासिल करना होता है।इसके लिए वो पढ़ाई करता है,डिग्री लेता है,कम्पटीशन एग्जाम में बैठता है,ताकि वो अमीरों के शौक को खरीद सके।
पर जो अमीर होते हैं,उनका सपना खुद के लिए नहीं बल्कि देश के लिए और देश मे रहने वालों के लिए कुछ करने का होता है।
आज के समय पैसा ही सब कुछ है।अगर आपके पास पैसा है,तो आपके पास सुकून है।पर जिस दिन पैसा आपको छोड़ किसी और के पास गया।आपका सुकून भी आपको छोड़ उसके पास चला जाता है।
पर पैसा ही सबकुछ नहीं होता है।अगर कोई गरीब है,पर सन्तुष्ट है,तो उससे बड़ा धनी भी इस संसार मे नही हो सकता है।
अब आपको सोचना है,आपको कौन वाला धनी बनना है।।
Written by sushil kumar

19 Jun 2019

जन्म जन्मांतर का साथ

जन्म जन्मांतर का साथ

Adhikari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।




हेय स्वाति,यहाँ कैसे??

अरे यार सन्नी कुछ शॉपिंग करना था,इसलिए चली आई।

वैसे सन्नी तुम अकेले!
बड़ा ताज्जुब हुआ,तुम्हारी पलटन कहाँ गई।

आज अभ्यास मैच खेल कर आने के बाद,सभी थक गए थे,तो सोचा मैं अकेला ही चल लेता हूँ।

और सन्नी आज यहाँ बड़े अच्छे अच्छे ऑफर निकले हैं।कुछ खरीदा क्या?

अरे नहीं यार, अभी पैसे जो भेजे थे मेरे पापा ने,उससे एक साइंस की किताब खरीदी।

सुन कुछ अच्छा लग रहा हो तो खरीद ले,धीरे धीरे कर के लौटा देना।

अरे स्वाति नहीं यार।मुझे यहाँ कुछ खास लगा नहीं।बस यही किताब लेने के लिए ही यहाँ आया था।

चल कोई बात नहीं।(कहते हुए स्वाति ने सन्नी का हाथ पकड़ लिया)
यहाँ का वड़ा पाव बड़ा ही स्वादिष्ट है,चल खाते हैं।

अरे स्वाति मैं चलता हूँ यार,लेट हो रहा हूँ।

बस भी कर ना।इतना शर्माता क्यों है।चल मेरे तरफ से पार्टी दे रही हूँ।

किस बात का पार्टी वैसे दे रही है तू।

मेरे भैया का आई.ए.एस में सिलेक्शन हो गया है,इसलिये दे रही हूँ।

सही में।

हाँ बाबा।

मुझे तेरे भैया से मिलना है,कब मिला रही है?

चल अभी चल घर पर मिलवा देती हूँ।

वड़ा पाव खाने के बाद सन्नी स्वाति के साथ स्कूटी पर बैठ कर उसके घर गया।

रितेश भैया ये सन्नी है।मेरा क्लासमेट।आपसे मिलने को बड़ा ज़िद्द कर रहा था,इसलिए ले आई।

जी प्रणाम भैया और काँग्रेचुलेसन्स आपकी सक्सेस के लिए।

अरे सन्नी थैंक यू।बोलो किस लिए मिलना चाहते थे?

भैया जब स्वाति ने बताया कि आपका सेलेक्शन्स यू पी एस सी में हो गया है,तो सोचा कि आपसे कुछ मार्गदर्शन ले लूँ।

अरे सन्नी कुछ नहीं,तुम्हें जो विषय पसन्द है,उसे और मजबूत करो।बस तुम्हारा सिलेक्शन पक्का है।

पर भैया मुझे तो केवल और केवल साइंस ही पढ़ना अच्छा लगता है।

ठीक है ना सन्नी तो उसे और मजबूत कर लो।और बाकि बचे विषयों को भी थोड़ा थोड़ा देख लेना, तुम्हारा सिलेक्शन आराम से हो जाएगा।

जी भैया।

स्वाति सन्नी से

ओय सन्नी सारा ज्ञान आज ही ले लेगा क्या?चल तुझे तेरे हिस्टेल पर छोड़ आती हूँ।

मैं चला जाऊँगा ना स्वाति,तू रहने दे।

स्वाति ने आँख को बड़ा कर लिया।

सन्नी चुप चाप स्वाति के साथ निकल पड़ा।

स्वाति ने सन्नी को अपनी स्कूटी से होस्टल पर ड्रॉप किया,और गुड नाईट बोलकर वापस घर को आ गई।

सन्नी के दोस्त सन्नी का होस्टल के गेट पर इंतज़ार कर रहे थे।जब स्वाति सन्नी को छोड़ वापस गई,तो सारे दोस्तों ने सन्नी का मिलकर खूब मजा लिया।

सन्नी को भी स्वाति धीरे धीरे पसन्द आने लगी थी।पर कभी उसे उतनी हिम्मत ना जुटा पाई कि उससे वह बोल सके।

पता नही कितने रोज डे और कितने वैलेंटाइन डे निकल गए,पर सन्नी हिम्मत ना जुटा पाया।

फिर से रोज डे आने वाला था।सभी युवकों के दिल में उनके जज़्बात जोर जोर से उफान मार रहे थे।

रोज डे वाले दिन,स्वाति बहुत ही खूबसूरत ड्रेश डालकर आई थी।बिल्कुल डॉल जैसी दिख रही थी।सभी लोगों की नज़र उससे हट ही नहीं रही थी।

स्वाति सन्नी से
अरे सन्नी क्या हुआ?

कुछ नहीं।

लगातार घूरे जा रहे हो।कुछ कहना है क्या?

नहीं!नहीं!
बस तुम आज बहुत ही सुंदर लग रही हो।

आओ सन्नी जरा टहलते हैं।

(सन्नी मन ही मन अपनी हिम्मत बढ़ाते हुए।हे ईश्वर मुझे शक्ति दे,कि मैं अपने प्यार का इज़हार आज कर पाऊँ।)

स्वाति उसे फूलों की बाग की तरफ लेकर जाती है।

स्वाति उधर लेकर क्यों जा रही हो।

दिख नही रहा है तुम्हे,फूल के बगीचे हैं।

हम्म

रुको भी ना यार।चुप चाप चल नही सकते हो साथ में।

हम्म

तभी स्वाति ने एक लाल गुलाब एक टहनी से तोड़ ली।

अरे अरे कोई देख लेगा तो!

हैप्पी रोज डे सन्नी।

थैंक यू एंड विश यू द सेम।

बस!

(सन्नी में हिम्मत जाग उठी थी)

क्या तुम मेरी गर्लफ्रैंड बनना पसन्द करोगी?
(सन्नी एक पाँव पर झुकते हुए स्वाति को प्रोपोज़ करता है)

स्वाति खुश होकर
यस यस यस
और सन्नी के गले से लिपट जाती है।

ये जो घटना हुई थी,उस वक़्त दोनो क्लास 10 में थे।

दोनो ने जमकर मेहनत की,और दोनों अच्छे नम्बर से मैट्रिक  को पास किया।

सन्नी को स्वाति पसन्द थी,पर उसकी पहली प्राथमिकता यू पी एस सी का एग्जाम था।उसका ध्यान हमेशा अच्छी तैयारी करने के पीछे लगा रहता था।

सन्नी चल ना!नई मूवी आई है,देखकर आते हैं।
स्वाति तेरे को मैं पसन्द करता हूँ, और शायद बहुत ही ज्यादा पसन्द करता हूँ।पर मेरी प्राथमिकता अभी यू पी एस सी है।

स्वाति को उसका वचन पहले पहले बहुत ही कठोर सा प्रतीत हुआ।पर बाद में वो उसके निर्णय को समर्थन करने लगी।

सन्नी मुझे भी तैयारी करनी है,चल ना साथ में करते हैं।फिर क्या दोनो मिलकर साथ में तैयारी करने लगे।सन्नी अच्छे अच्छे बुक्स का लिस्ट लाकर देता,और स्वाति उसे खरीद कर ले आती, और दोनों साथ मिलकर तैयारी करते।कभी कभी तो समय का पता भी नही चलता था कि कब अंधियारी रात सुबह के उजाले के गोद में जाकर बैठ गई है।

दोनो ने साथ में ही ग्रेजुएट किया और किस्मत देखिए दोनो का साथ में ही यू पी एस सी भी क्लियर हो गया।ये होता है साथ का फर्क।अगर जन्म जन्मांतर के साथ रहने वाले का साथ मिल जाए,फिर क्या बात है?कोई भी काम मुश्किल नहीं रहता है।

Written by sushil kumar

17 Jun 2019

बच्चे का भविष्य।।

बच्चे का भविष्य।।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



कहा जाता है: माँ की ममता और पिता की सख्ती दोनो ही ज़रूरी होती है,अगर किसी बच्चे का भविष्य बनाना है तो।वो कैसे?ऐसा ही कहानी मैं आपके लिए लेकर आया हूँ।आइए अब कहानी में प्रवेश करते हैं।पर एक बात बता दूँ, ये कहानी १०१% मेरे दिमाग की उपज है,इसका किसी भी भाई बन्धु,माँ बहिन से रिश्ता या नाता नहीं है।इसका मज़ा लीजिए,पर दिल पर कोई भी ना लीजिए।अब चलिए,बहुत बोल लिया।अंदर चलते हैं।
नारायण जी एक खेतिहर किसान हैं,जिनके पास १००बीघा खेत है।बड़े ऐय्याश क़िस्म के जमींदार थे नारायण जी।उनकी बीबी रानी देवी जी बड़ी ही खूबसूरत स्त्री थी।रानी जो मायके जाती तो घर पर कोठे का मज़ा लेते थे।कभी गुलाब बाई तो कभी चमेली बाई को घर पर बुला लेते थे।लेकिन चुपके चुपके।पर ऐसा क्यों?अपनी मेहरारू से जो डरते थे।

वैसे उनके किस्से भी बड़े ही रँगीले हैं।शादी से पहले बहुत सारी भाभियों और लड़कियों के संग सो चुके थे।शायद ही उनके गाँव या उसके आस पास की कोई छौड़ी उनके चंगुल से बची होगी।
पर अब जरा सभ्य हो गए हैं,शादी जो हो गई है।चार चार बच्चे के बाप जो हो गए हैं।वो तो उनकी अम्मा ने कह दिया था बस,वरना पूरा क्रिकेट टीम बना कर ही दम लेते।पर उनकी अम्मा के एक ही होनहार पुत्र थे, वो खुद।अब आप बोलेंगे,ये मुमकिन कैसे हुआ?उनके पिता जी बड़े समझदार थे,उनके होने के एक साल बाद साधु वस्त्र धारण कर हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए,फिर लौट कर कभी नही आएँ।शायद उन्हें एहसास हो गया था कि ये नालायक अकेला ही काफी है,सारी जमा पूँजी अय्यासी  में उड़ाने को।
वो ऐसा था नारायण जी के पिता विष्णु जी को बंटवारे के बाद कुल  ५००बीघा खेत मिले थे।पर नारायण जी ने अपनी ऐय्यासी में सारे खेत बेचवा दिए,आज गिना चुना १०० बीघा खेत बचा है।
रानी के आते ही सारा दिन उसके आगे पीछे घूमते रहते।और मौका मिलते ही उन्हें दबोच लेते।पर रानी ने जो जरा डाँटा,तो पीछे हट जाते,और कहते अगर तुम्हारे पास नहीं आऊँगा,तो किसके पास जाऊँगा।रानी भी कभी कभी गुस्से में बोल दिया करती थी,जाओ गुलाब बाई के कोठे पर चले जाओ।पर नारायण अपने को बड़ा ही पत्नीव्रता दिखाता था,और उसकी बातों पर उसे खूब सुनाता था।
चारो बच्चे जिनका नाम विभूति,आहुति,पारंगत और जरासन्ध था,बड़े हो रहे थे।रानी ने अपने बच्चों को बड़ा लाड़ प्यार से पाला था,ऐसा नही की नारायण उन्हें प्यार नहीं करता था।पर वह जरा सख्त बाप बनने की कोशिश में रहता था।क्योंकि उसे लगता था कि अगर पिता की सख्ती उसे मिलती,तो वह बिगड़ता नहीं।
नारायण अपनी सख्ती के कारण बच्चों से दूर होता चला गया और रानी अपनी ममता के कारण बच्चों के नजदीक होती चली गई।पर बच्चे जो आज अपने पैरों पर खड़े हैं और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं,वो केवल और केवल नारायण के चलते ही।
आज विभूति की शादी है।विभूति अपने साथ ही काम करने वाली स्वाति के साथ विवाह के बंधन में बंधने जा रहा है।नारायण,रानी और बाकी सारे परिवार के लोग बड़े खुश हैं।अभी हल्दी कलश की विधि के लिए सभी लोग बड़े उत्साहित थे।विभूति के साथ मण्डप पर नारायण ,रानी और पंडित जी बैठे हुए थे।तभी नारायण को बहुत जोरों से उसके छाती में दर्द उठा और वह वहीं गिर गया।सभी जन विधि को छोड़कर नारायण को अस्पताल ले गएँ।डॉक्टर उन्हें अंदर आई सी यू में भर्ती कर,उनकी जाँच में लग गए।
बाहर विभूति गुस्से में लाल पीला होने लगा।
विभूति: बाबूजी को मन नहीं था शादी करवाने का,तो पहले बता दिए होते।ये नौटंकी क्यों कर दिया इन्होंने।हम कोर्ट मैरिज कर लेते।
रानी अपनी कुर्सी से उठी और विभूति को एक थप्पड़ जड़ दिया।
रानी: (रोते हुए) तेरा बाप तेरे से कम खुश नही था।उन्होंने तो तेरी हनीमून ट्रिप की पैकेज के लिए भी एडवांस दे रखा था।तुमलोगों को उनकी सख्ती नज़र आती है।पर तुम्हें ये पता नहीं,उनकी सख्ती के वजह से ही आज तुम अपने अपने कदम पर खड़े हो,और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हो।भले वो जितना बाहर से कठोर दिखते हैं,पर उससे डीज़ गुणा ज्यादा तुम पर जान भी छिड़कते हैं।आज तुमलोगों की पढ़ाई पूरी कराने के लिए ९० बीघा जमीन तक बेच डाली,आज क्या बचा है उनके पास?कुछ नहीं।फिर भी उन्होंने तुम्हारी हनीमून ट्रिप के लिए अपने बुढ़ापे के लिए बचा कर रखे फिक्स्ड डिपाजिट को भी तोड़ दिया,ताकि तुम्हें उनसे कोई शिकवा ना रहे।अरे वो बाप नहीं,देवता है,देवता!

सभी के आँखों में आंसू छलक पड़े।
तभी डॉक्टर साहब बाहर निकलते दिखे।सभी लोग उन्हें घेर लिए।कैसे हैं?कैसे हैं बाबूजी?कैसे हैं?
डॉक्टर: माइनर अटैक था।अब खतरे से बाहर हैं।पर पता नहीं जब दर्द से राहत मिला तो एकदम हमें परेशान करके रख दिए कि उनके बेटे का हल्दी कलश है,शुभ मुहूर्त निकला जा रहा है।चलिए जाँच पूरी कर ली गई है,अब कोई खतरे की बात नहीं है,उन्हें आप ले जाइए।बस ध्यान रखिए कि ज्यादा उन्हें टेंस होने ना दे।
नारायण को लेकर सारे बेटे घर पहुँचे।हल्दी कलश हुआ और फिर शादी हुई।नारायण से अब सभी बेटे बड़े ही प्यार और अदब से बर्ताव करने लगे।नारायण की बाकी जिंदगी बड़े ही शांति और शुकुन से बीती।

Written by sushil kumar


16 Jun 2019

सपने को साथ रखो,बहुत जल्दी पाओगे।

सपने को साथ रखो,बहुत जल्दी पाओगे।


Adhikari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



मैं और मेरे सपने सदा साथ रहते थे।मैं यानी बिक्रम,एक अनाथ युवक हूँ।इग्यारह साल के उम्र में मेरे पिता दिनेश सिंह  मुम्बई बम ब्लास्ट में मारे गएँ।मेरी माँ भी सदमा बर्दाश्त ना कर पाई,और मुझे अकेला छोड़ पापा के पास चली गई।
हम बिहार से रहने वाले थे।पापा यहाँ मुम्बई में एक कारखाने में काम किया करते थे।उसी कारखाने के पास के झोपड़पट्टी में हमें रहने को कंपनी ने दिया हुआ था।वहाँ रहने वाले अधिकतर मजदूर बिहार के ही थे।हमारा बिहार में कुछ नहीं था।
पापा और माँ के गुजर जाने के बाद मैं आसरे और खाने को दर दर भटक रहा था।कंपनी ने मुझसे मेरा झोपड़ा छीन लिया था।संजय चाचा जो पापा के घनिष्ठ दोस्त हुआ करते थे,उन्होंने भी सहारा देने से मना कर दिया था।मैं बहुत ही डर गया था।कहाँ जाऊँगा, क्या खाऊँगा,किधर रहूँगा,किधर सोऊँगा।इसी तरह के विभिन्न सवालों ने मेरे मन को घेर रखे थे।
मैं निकल पड़ा रोड पर अपनी माँ बाप के यादों की बारात लेकर।माँ पापा ने हमेशा मुझे सिखाया था, कि जिसका कोई नहीं,उसका भगवान होता है।इसलिए उसपर भरोसा सदा बनाकर रखना।मैं भी भगवान के भरोसे ही मंदिर के द्वार के तरफ निकल पड़ा।और वहीं द्वार पर लेट गया।सुबह से कुछ नहीं खाने पीने के चलते और धूप में लेट जाने के चलते,मुझे बुखार हो गया।मेरा शरीर बहुत जोरों से कांपने लगा और मैं वहीं बेहोश हो गया।
जब आँखे खुली तो खुद को सरकारी अस्पताल में पाया।नर्स ने मुझसे मेरे माँ बाप का नाम व मेरे घर का पता पूछा।ऐसे हमदर्दी से पूछने पर मेरा बच्चा वाला दिल भावुक हो उठा।मेरा कोई नहीं है इस दुनिया में कहते कहते मैं सिसक सिसक कर रो पड़ा।नर्स को मुझ पर दया आ गई।और उसने कैंटीन से खाना मँगवाकर, मुझे भरपेट खाना खिलाया।और फिर मुझे बेड पर रेस्ट लेने को कहकर वह अपना फोन उठा,किसी को फोन लगाने लगी।
मेरी आँखें कब झपक गई मुझे पता ही नहीं चला।पर जब उठा तो कुछ अपने अंदर ताकत महसूस की।मैं खड़ा होकर नर्स को ढूंढने निकल पड़ा।नर्स ने मुझे अपने कमरे से बाहर आते देख,मुझे अपने बेड पर ही रहने को कहा।मैं अपने बेड पर लौट गया।
कुछ देर बाद नर्स मेरे पास आकर मेरा हाल चाल पूछा।और कहा कि मुझे कोई लेने आने वाला है।मैं डर गया,और पूछा कौन?
नर्स ने बताया कि उन्होंने किसी अनाथाश्रम को फोन कर दिया है।वो लोग मुझे लेने के लिए आते ही होंगे।
मैं:  अनाथाश्रम मतलब?
नर्स: जिन बच्चों के माँ बाप नहीं होते हैं,उनके लिए अनाथाश्रम होते है।वहाँ ढेर सारे बच्चे एक साथ रहते हैं।वहाँ खाना पीना,पढ़ाई लिखाई,खेल कूद सबकुछ होता है।तुम्हें वहाँ आनन्द आएगा।
मैं:  पर आप मुझसे मिलने वहाँ आओगे ना।
नर्स:  हाँ हाँ बच्चे,बिल्कुल आऊँगी।
अनाथाश्रम से कुछ लोग आएँ, और उन्होंने एक फॉर्म और पेन निकाला।और फिर मेरा नाम पूछा,मेरे पिता और माता का नाम और मेरे पुराने घर का पता पूछा।फिर मुझसे चलने को कहा।
मैं डरा सहमा सा उनके साथ चला गया।
अनाथाश्रम का नाम पंडित दीन दयाल अनाथाश्रम था।वहाँ बहुत सारे बच्चे पहले से मौजूद थे।सारे बच्चों ने मेरा उत्साह से स्वागत किया। मैं बहुत खुश था।वहाँ पहुँचने के बाद मुझे कुछ नए कपड़े मिले।
वहाँ का रूटीन मुझे बहुत ही अच्छा लगा।सुबह नाश्ते में अंडा और ब्रेड जैम।दोपहर के लंच के लिए पुलाओ टिफ़िन में मिलता था।शाम में सब्जी रोटी,सलाद।सुबह नौ बजे से शाम चार बजे तक स्कूल।स्कूल से लौटकर एक घण्टा खेल कूद,फिर होम वर्क और पढ़ाई लिखाई।
मुझे मानो मेरे भगवान ने सुन ली हो।मुझे ईश्वर पर और भी श्रद्धा गहरा होता चला गया,और माँ बाबू जी के बातों पर भी।
मैं जब माँ बाबू जी के साथ में रहता था,तो उनसे बोलता था कि मैं बड़ा होकर पुलिस बनूँगा।
आज फिर से मेरे सपने ने मेेरे हृदय में दस्तक दिया है,जिसे मैं अब कभी दूर जाने नहीं दूँगा।स्कूलिंग करने के बाद मैंने ट्यूशन लेना शुरू किया।पहले पहले तो काफी मुश्किलात हुए ट्यूशन ढूंढने में,पर आखिर एक ट्यूशन मुझे मिल ही गया।और फिर क्या मेरा ट्यूशन चल पड़ा।साथ ही साथ में पढ़ाई भी जारी रखी,और ग्रेजुएट भी मैने कम्पलीट कर ली।पी.एस.सी. का फॉर्म भरा और एग्जाम दिया।मेरे माँ बाबू जी के दिए गए संस्कार और भगवान की असीम कृपा के चलते,मैंने पहली प्रयास में ही पी.एस.सी. निकाल लिया।आज मैं बहुत खुश था,कि मेरे सपने को पूर्ण होते मैं देख पा रहा था।पर एक दुख भी दिल में लेकर बैठा था कि माँ बाबू जी साथ में नहीं हैं।
मैंने कसम खाई की मैं अपनी सैलरी की बिस्वा भाग पंडित दीन दयाल अनाथाश्रम को दान करूँगा।और सारे बच्चों में उस दिन मिठाई बंटवाई,और उन्हें स्वादिष्ट व्यंजन खिलवाए।मैं नर्स माँ से मिलने गया।पता नहीं क्यों उस नर्स में मुझे मेरी माँ नज़र आती थी।उनके लिए एक सुंदर सी साड़ी और एक सोने का चैन लेकर गया था।वो मेरी पुलिस में भर्ती की खबर सुन बहुत खुश हुई थी।


Written by sushil kumar

प्यार एक ऐसा एहसास है , जो कभी मरता नहीं।वो हमेशा ज़िंदा रहता है,हमारे और आपके जेहन में।

प्यार एक ऐसा एहसास है , जो कभी मरता नहीं।वो हमेशा ज़िंदा रहता है,हमारे और आपके जेहन में।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।




मैं सन्नी एक मिडिल क्लास फैमिली का बिगड़ैल औलाद।अभी मैंने आई.सी.एस.ई. बोर्ड से दसवीं का एग्जाम पास किया है।वो भी पैंसठ प्रतिसत से।अब तो आप समझ ही गए होंगे,मैं कितना होनहार छात्र हूँ।

अब कुछ पाँच साल पहले की मेरी जिंदगी में लौट चलते हैं।सन्त फ्रांसिस स्कूल का नाम हमारे शहर के हर गली गली में लिया जा रहा था।वहाँ जो चला गया,किस्मत उसकी बदल गई।या तो वो इंजीनियर,या तो वो आई.ए. एस. वहाँ से बनकर ही निकलता है।
हर माँ बाप का सपना हुआ करता था,कि उनके बच्चे की दाखिला वहाँ मिल जाए।ठीक वैसे ही मेरे माँ बाबू जी का भी सपना था कि मेरी भी दाखिला वहाँ हो जाए,ताकि मेरा भविष्य सुधर जाए।
मैंने उस वक़्त पांचवी कक्षा पास की थी।और पूरी कक्षा में टॉप किया था।मेरे पापा मम्मी मुझे और मेरे मार्कशीट लेकर सन्त फ्रांसिस स्कूल पहुँच गए।
मैं बहुत ही ज्यादा नर्वस था।घर से निकलते वक्त मैंने ईश्वर से बस यही प्रार्थना की थी कि हे ईश्वर मेरे माँ बाबू जी को कभी दुख का सामना ना करना पड़े,वो सदा खुश रहें।जहाँ उनकी खुशी,वहीं मेरी खुशी।पर अभी पुराने दोस्तों के छूटने का भी गम दिल में घेरे जा रहा था।
एंट्रेंस एग्जाम दिया,फैल हो गया।माँ बाबूजी ने प्रिंसिपल मैडम से निवेदन किया कि आप इसके पुराने रिकॉर्ड देखिए,ये हमेशा अपने क्लास में अव्वल ही आया है।इसे एक मौका देकर देखिए।
पता नहीं कैसे? प्रिंसिपल को भी मेरे माँ बाप के विश्वास पर विश्वास हो गया,और मेरा दाखिला वहाँ हो गया।

मेरा पहला दिन स्कूल का।
मैं डरा सहमा सा स्कूल जा पहुँचा।नए चेहरे,नए लोग।कुछ तो ऐसे घूरे जा रहे थे,मानो हमारी पहचान बहुत ही पुरानी हो।कुछ देख कर भी ना देखने का बर्ताव कर रहे थे।उन लोगो में मैं ही एक अजनबी सा महसूस कर रहा था।पता नहीं,रह रह कर वही पुराने दोस्त मुझे याद आ रहे थे।
क्लास पहुँचा और आगे के एक डेस्क पर जाकर बैठ गया।तभी एक लंबा सा घुँघरेले बाल वाला लड़का आया,और बोला
पीछे बैठ भाई, ये सीट मेरी है।
मैं उठकर पीछे चला गया।
अब मैं जिस सीट पर बैठता,वहाँ बैठा छात्र मुझे ये कहकर उठा देता कि वहाँ कोई और बैठा है।आखिरकार सबसे पीछे वाली सीट,जहाँ कोई नहीं बैठा था,वहाँ जाकर बैठ गया।
पहले सब्जेक्ट की क्लास की घण्टी बजी।एक शिक्षक मोटा सा,काला चेहरे लिए अंदर घुसा।उसकी शक्ल देखकर ही दिख रहा था,कि वह कितना खतरनाक और क्रूर होगा।जो कोई होमवर्क बनाकर नहीं आता होगा,उसका तो गाल और चूतड़ दोनो लाल कर देता होगा।
तभी किसी लड़की की आवाज़ दरवाज़े से आई:-मे आई कम इन सर।
शिक्षक :   कम इन।
लड़की  :   सॉरी सर, एक्चुअली देयर वेअर टू मच ट्रैफिक इन माई रूट।
शिक्षक :  व्हाट डू यू मीन टू से,डीज़ पीपल कम बाई फ्लाइट ओर व्हाट?टेक केअर ऑफ योर टाइमिंग नेक्स्ट टाइम , अदरवाइज यु विल नॉट बी अलाउड टू सीट इन डी क्लास।
लड़की : यस सर।

वह सीधे चलते चलते मेरे बगल में आकर बैठ गई।

मैं:  हेय!तुम लेट कैसे हो गई।
लड़की: अरे यार रास्ते में मेरे कार से एक कुत्ता टकरा गया।
मैं:  तो(मुस्कुराते हुए)
लड़की: वो कुत्ता किसी का पालतू कुत्ता था।
मैं:  ओ(सीरियस मूड)
लड़की: उसका मालिक दस हज़ार से नीचे लेने को तैयार ही नही हो रहा था।और अंत में मेरे डैड को दस हज़ार उसे देना ही पड़ा।
मैं: ओके
लड़की: वैसे मेरा नाम सुहाना है।तुम्हारा नाम क्या है?
मैं: मेरा नाम सन्नी।
सुहाना: मेरा आज पहला दिन है,और देखो आज ही मैं लेट भी हो गई।
मैं: मेरा भी आज पहला ही दिन है।
सुहाना: ओ!वाओ:लेटस बी ए फ्रेंड।
मैं: यस,यस।
तभी शिक्षक
रोल न● 39
सुहाना
सुहाना:-यस सर।
शिक्षक
रोल न● 40
सन्नी
मैं: यस सर।

फिर क्या?
हमारी दोस्ती कुछ अलग ही आयाम पर पहुँच चुकी थी।
हम जितना एक दूसरे संग खुले हुए थे,उतना ही दूसरों से बन्द बन्द थे।हमारे दोस्त भी बहुत ही गिने चुने थे।हमें एक दूसरे की कंपनी पसन्द थी।

अक्सर मैं और  सुहाना शाम में एक दूसरे के घर जाया करते थे।उसके घर पर मम्मी डैडी और एक आया रहती थी।मम्मी एक हाउस वाइफ थी,जबकि उसके डैडी एक कंपनी में अच्छे पोस्ट पर पदस्थ थे।हम दोनों को एक दूसरे की माँ के हाथ का खाना पसंद था।

हम दोनों ही अपनी दोस्ती की सीमा लाँघ कर एक नए रिश्ते में बंधना चाहते थे।क्योंकि हम दोनों ही एक दूसरे को बहुत ज्यादा पसंद करने लगे थे।
ये बात कुछ नवमी कक्षा के मिड टर्म शुरू होने से एक महीना पहले की बात है।एक सुबह सुहाना बहुत खुश दिख रही थी।और कुछ गुनगुना रही थी।प्यार किया तो डरना क्या
 मैं:  क्या बात है?बहुत खुश दिख रही हो सुहाना।
सुहाना:  हाँ!आज शाम में घर आना,पता चल जाएगा।
मैं: क्या है बताओ ना।प्लीज बताओ ना।
सुहाना: नहीं नहीं!जब शाम में आओगे ,उसी वक़्त बताऊँगी।
मैं: ठीक है,मत बताओ।मैं भी नही आऊँगा।
सुहाना: अरे माँ आज कुछ स्पेशल बना रही है।
मैं: क्या?
सुहाना: पता नहीं।पर कुछ स्पेशल है।

शाम हुआ,मैं सुहाना के यहाँ पहुँचा।

सुहाना: हाई
मैं: हाई
सुहाना: बहुत लेट करदी आने में।
मैं: हूँ
सुहाना: आओ! अंदर आओ।
मैं: आज बहुत ही सुंदर लग रही हो।क्या मस्त ड्रेस पहन रखी हो।
सुहाना: सही में।
मैं: हाँ।
सुहाना अपने कमरे में मुझे ले गई।
मैं: अंटी नहीं दिख रही है।
सुहाना: माँ मामा की शादी अटेंड करने को लखनऊ गई हुई हैं।
मैं: फिर तुमने ऐसा क्यों बोला कि
सुहाना बिच में रोकते हुए
सुहाना: कि माँ ने आज कुछ स्पेशल बनाया है।
सुहाना (शरारती हँसी हँसते हुए): बस ऐसे ही।
अगले ही क्षण उसने मुझे अपनी ओर खींच लिया।और मुझसे गले से लिपट गई।
मैं: अरे तुम्हारी आया आ जाएगी।
सुहाना: वो इस वक़्त घर पर नहीं है,घर का सौदा लेने बाजार गई हुई है।
मैं: (गहरी साँस लेते हुए)मैं भी सुहाना को अपनी बाँहो में और भी कसकर जकड़ लिया।
सुहाना: बस!अब आगे कुछ करोगे या यूँही.....
मैं: क्या?
सुहाना: अरे इतनी सुंदर लड़की तुम्हारे साथ में है,उसे किस लो,उसे प्यार करो।सब कुछ तुम्हे समझाना होगा।
मैं: (जरा सा मज़ा लेते हए)मुझे कुछ भी नही आता है।तुम शुरू करो ना।
सुहाना ने मेरा सर पकड़ अपने लिप्स को मेरे लिप्स पर रख दी,और धीरे धीरे से किस लेने लगी।मैं भी गुलाब की पंखुड़ियों सा नरम ओंठ को महसूस कर पूरे जोश में आ गया,और अपने जिह्वा को उसके जिह्वा संग मिला कर चरम सुख का आनंद लेने लगा।मैं उसके कपड़ो को हटाने की कोशिश करने लगा,पर उसने रोक दिया।
सुहाना: उँ...हूं....।प्रोटेक्शन है।
मैं: नहीं।
सुहाना:  पहले मेडिकल शॉप से कंडोम लेकर आओ।
और मैं निकल पड़ा उसके घर से अपना मोटर साईकल लेकर।मैं काफी दूर आने के बाद,एक अनजान मेडिकल शॉप के आगे अपनी मोटर साईकल रोकी।और वहाँ जाकर कंडोम माँगा।
मैं: कंडोम है।
दुकानदार: कौन सा फ्लेवर चाहिए।चॉकलेट,स्ट्रॉबेरी,डॉटेड,या विदआउट डॉट।
मैं: चॉकलेट फ्लेवर दे दीजिए।
और फिर क्या,मोटरसायकिल लिया और पाँच मिनट में सुहाना के सामने।
उस दिन हमने दो बार सेक्स किया।और उसके बाद तो पता नहीं,शायद ढाई हजार बार तो किया ही होगा,दसवीं के मिड टर्म तक।
अब आप पूछेंगे दसवीं के मिड टर्म तक ही क्यों?
वो इसलिए क्योंकि सुहाना के पिता को लगता था कि मेरे संगति में आकर,उसके अच्छे नम्बर नही आ रहे हैं।और इसलिए उन्होंने सुहाना को धमकी दी थी कि अब सन्नी के साथ दोस्ती खत्म करो और पढ़ाई करो।अगर अच्छे नम्बर नहीं आएँगे तो बोर्ड के बाद घर पर बैठना होगा।
सुहाना घर पर बैठने की बात से ज्यादा मुझसे बोर्ड के बाद ना मिल पाने की स्थिति से डर गई थी।
स्कूल में जब सुहाना की बाते सुनी तो मैं भी सन्न रह गया।और उसको पूरा सहयोग देने का वादा किया।
और सुहाना स्कूल में टॉप कर गई,और मैं केवल पास होकर ही रह गया।

और आज सुबह सुहाना की दोस्त,मेरी क्लासमेट सूची एक इंवेलोप ले कर मेरे पास आई।
सूची:  सुहाना ने बोला है,अकेले में पढ़ना।

मैं इंवेलोप लेकर फटाफट अपने कमरे में चला गया और अंदर से सिटकिनी लगा दी।
इंवेलोप खोलते खोलते मेरा दिल बहुत जोरों से धड़कने लगा।मन अनेक बुरे ख्यालातों से भर गया था।

प्रिय सन्नी
जब तक तुम्हें यह खत मिलेगा,तब तक मैं लंदन के लिए फ्लाइट पर बैठ चुकी होंगी।मुझे हार्ट कैंसर निकला है।शायद तुम्हे याद होगा,पिछली बार जब हम मिले थे,तब तुमने पूछा था कि मैं बहुत कमजोर दिख रही हूँ।वो उसी का प्रभाव था।डॉक्टर के पास जब जाँच हुआ तो पता चला।शायद मैं कुछ ही दिनों की मेहमान हूँ।मैं तुम्हें टूटते हुए नहीं देख सकती हूँ,और चाहती हूँ कि तुम अपने जीवन में आगे बढ़ो।तुम्हारे साथ बिताए गए प्यारे व अनमोल समय की लड़ियों को साथ लिए जा रही हूँ, जिसके सहारे अपने बचे खुचे समय को बिता लूँगी।अपने आखिरी समय में मैं अपने दादा दादी के साथ रहना चाहती हूँ इसलिए उनके पास लन्दन जा रही हूँ।

तुम सदा खुश रहना और जीवन में सदा आगे की ओर बढ़ते रहना।

तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी सुहाना।
एक एक शब्द मुझपर भारी पड़ रहे थे।मेरे तो पैरों तले जमीन खिसक रही थी।दिल मे भी थोड़ा थोड़ा दर्द सा होने लग रहा था।और अपने आंसुओ की धार को ना रोक सका था।
और फिर क्या,अकेले अकेले रहना।खुद से बाते करना।कभी रोना,कभी हँसना, कभी घण्टो घण्टो तक कमरे में बंद रहना।
फिर एक बार मेरे मामा जो साइकोलोजिस्ट हैं,घर पर आए हुए थे।कदाचित ये कहना सही होगा कि माँ ने उन्हें बुलाया थे,ताकि मेरा इलाज कर सके।(माँ ने वह पत्र पढ़ लिया था।पर वो केवल मामा को ही उस पत्र के बारे मे बताई थी।)
मामा: देख भांजे दुनिया में आना जाना तो लगा रहता है,पर जो गया, उसकी ख्वाहिश को पूरा करने की जिम्मेवारी,यहाँ रह गए उसके प्रेमी जनों की है।ताकि वो जहाँ भी रहे,खुश रहे।हमें और तुम्हे देखकर।

सन्नी को कुछ दिमाग में ठनका।
सन्नी: (मन ही मन सोचते हुए)अरे सुहाना की ख्वाहिश थी कि वो सारे गरीब बच्चों को पढ़ाए और दुनिया को सभी के लिए रहने के लिए उत्तम जगह बनाए।

सन्नी ने एक एन.जी.ओ जॉइन किया और वहाँ बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।खुद भी अपनी पढ़ाई जारी रखी।
धीरे धीरे समय बिता,और उसने हिंदी में पी.एच. डी. पूरी कर ली। वो सुहाना के सपने को पूरा करने को जी जान से लग गया।उसने एन जी ओ में काम करने के तरीके में कुछ कमियां पाईं।उसने खुद एक एन जी ओ खोलने का निर्णय लिया।और अपने एन जी ओ का नाम सुहाना जिद्द के नाम से रजिस्टर्ड करवाया।वो बहुत ही खुश था।
वो खुद ही झोपड़पट्टी में अपने टीम के साथ जाता था,और बच्चों को बाहर की दुनिया से अवगत करवाता था,साथ ही साथ उन्हें पढ़ाता भी था।झोपड़पट्टी के बच्चे भी इंग्लिश में जवाब देने लगे थे।और उनके सपनों को साकार करने के लिए सुहाना जिद्द की संस्था ने भरपूर मदद और कोशिश की थी।जिसके फल स्वरूप उनके इस प्रयास को सम्मानित करने के लिए लंदन में इनका नाम नॉमिनेट हुआ था।
सन्नी अपनी टीम के साथ लंदन रवाना हुआ।
वो दिन आ चुका था जब उनके इस प्रयास के लिए उन्हें सम्मानित होना था।आज सारा विश्व की नज़र उनपे थी।मंच सज चुके थे।दर्शकगण बैठ चुके थे।हर क्षेत्र में किए गए प्रयास को सम्मानित किया जा रहा था।हमारे क्षेत्र से दो संस्था और भी थी।एक लंदन की ही संसु नाम की एन जी ओ थी,और एक जापान की समसू नाम की एन जी ओ थी।दोनो ऐसे लग रहे थे मानो उनके संस्थापक जापान या चीन से हैं।
मैं बहुत ज्यादा ही उत्साहित था,कि सुहाना के सपने को पहला उड़ान मिल चुका था।
हमारी संस्था का नाम लिया गया।मैं अपनी टीम की ओर से स्टेज पर पहुँचा।हमारी संस्था के किए गए प्रयास की एक छोटी सी झलक की वीडियो सारे विश्व के सामने रखी गई।पन्द्रह मिनट के वीडियो के बाद सारा ऑडिटोरियम दस मिनट तक लगातार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।हर चेहरे पर खुशी झलक रही थी,कहीं आंसुओ की धारा के द्वारा तो कहीं वाह वाही के द्वारा।हमारी टीम की छाती गर्व से फूल गई।और मुझे मंच पर एक दो शब्द अपनी उपलब्धता पर कहने को कहा गया।
सन्नी:  मैं इस सम्मान का श्रेय केवल और केवल अपनी टीम को देना चाहता हूँ।अगर इनका साथ नहीं मिलता,तो शायद ही कभी इस मंच पर पाँव रख पाता।
पर एक शख्स और भी है,जिसके चलते मैं इस राह पर चल सका।अगर वो ना होता,तो शायद ही इस राह पर मैं कभी आता ही नहीं।वो शायद इस दुनिया में अब नहीं है।वो और कोई नहीं,वो मेरी दोस्त,मेरी सबकुछ,मेरी सुहाना है।ये सुहाना जिद्द उसी के नाम पर रखी गई है।उसका सपना था कि सारे गरीब बच्चों को पढ़ाए और उनका भविष्य सँवारे,साथ ही साथ दुनिया को रहने के लिए उत्तम स्थान बनाए।आज उसका सपना ,मेरा जिद्द बन गई है,और उसे मैं पूरा करके ही दम लूँगा।

तभी एक लड़की आगे की कतार से उठकर मेरी तरफ आने लगती है।उसका चेहरा जैसे जैसे निकट आ रहा था,कोई अपने की तस्वीर दिमाग में उभर कर आ रही थी।
ये ये सुहाना है क्या?
हाँ हाँ(दिल कहे जा रहा था)
नहीं नहीं(दिमाग कह रहा था)
लड़की सन्नी के बाँहो में जाकर लिपट गई।
लड़की: सन्नी!
सन्नी: सुहाना!तुम !तुम! जिंदा हो।
सुहाना: हाँ।आखिरकार तुमने मुझे ढूंढ ही निकाला।
सन्नी और भी कसकर सुहाना को अपनी बाँहो में जकड़ लेता है।
ऑडिटोरियम पूरा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है।
सन्नी: तुम यहाँ कैसे?
सुहाना: संसु की संस्थापक मैं ही हूँ।
सन्नी: वहाँ भी तुमने मुझे अपने संग जोड़ रखा है।
सुहाना: मुझे लगा तुम जीवन में काफी आगे बढ़ गए होगे, इसलिए मैं तुम्हें ढूंढने की प्रयास नहीं की।
सन्नी: चलो ठीक है।तुम कैसी हो अभी?
सुहाना: फर्स्ट क्लास।कैंसर के प्रभाव से मैं कोमा में चली गई थी।माता रानी की कृपा से सात साल के बाद मैं होश में आई।
सन्नी: थैंक गॉड!तुम मुझे मिल गई।
सुहाना: क्या मतलब!तुमने शादी नही की है।
सन्नी: हाँ शादी तो मैंने कर ही ली थी।
सुहाना: किसके साथ?
सन्नी: अपने प्रोफेशन के साथ।
सुहाना जोर जोर से हँस पड़ी और सन्नी से लिपट गई,सदा सदा के लिए।

Written by sushil kumar

14 Jun 2019

लत किसी भी चीज़ की हो,हमेशा जानलेवा ही होती है।

लत किसी भी चीज़ की हो,हमेशा जानलेवा ही होती है।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।


रमेश की मौत की खबर सुनकर उसका सारा परिवार दुख की भौसागर में डूबता ही चला जा रहा था।
आखिर उसकी सास ने अपनी ही बेटी के घर बार को क्यों उजाड़ दिया?ऐसा क्या हुआ था कि उन्हें अपने ही दामाद को मौत के घाट उतारना पड़ा?ऐसे ही बहुत सारे सवाल सभी के दिमाग में घूम रहे थे।

अब आते हैं रमेश पर।रमेश बचपन में बड़ा होनहार बच्चा हुआ करता था।पर गलत संगति में पड़कर,उसकी लत खराब हो गई थी।उसे पोर्न देखने का चस्का लग चुका था।हर स्त्री को बुरी नजर से देखता था।स्कूल बस में भीड़ का सहारा लेकर किसी लड़की की अंगों को छूना, और क्लास में टीचर को भी गलत नज़र से देखना,अपने पड़ोस में रहने वाली लड़कियों के बाथरूम में झांकना और ना जाने क्या क्या।
जब भी मौका मिलता तो पोर्न देखते रहना,कभी किताब के बीच में मोबाइल फ़ोन रखकर पोर्न देखना,और दिखाना अपने माँ बाप को कि वह पढ़ाई कर रहा है।कभी घण्टो गायब रहना और अपने बुरी लत से स्वयं को संतृप्ति पहुँचाने की कोशिश करते रहना।

अपने चचेरी बहनों के भी अंगों को मजाक मजाक में स्पर्श करना।और कुछ वैसे खेल खेलना कि जिससे उसे संतृप्ति मिल सके।वो क्या करता था कि कोई भी छोटा सा समान जैसे रब्बर इत्यादि लेता था और कहता था चलो छुपाओ और ढूंढो वाला खेल खेलते हैं।इस खेल में समान को कोई छुपाएगा और अगला ढूंढेगा।अगर मिल गया तब तो ठीक है,वरना जीतने वाला हारने वाले से कोई भी काम करवा सकता है।
इस खेल के बहाने वो अपने लत को संतृप्त किया करता था।वो उस छोटे से समान को अपने चड्डी में छिपाया करता था।पर जब उसकी चचेरी बहन ढूंढ ढूंढ कर परेशान हो जाया करती थी तब वह अपने चड्डी में हाथ डाल निकाल दिया करता था।और फिर उनके अंगों को देखने को उनसे वस्त्र उतारने को कहता था।और उनसे अपने अंगों को छुआया करता था।

चचेरी बहनो को इस खेल में मज़ा आ रहा था क्योंकि वे भी अभी छोटी थी।पर एक बार चाची ने उन्हें रंगो हाथ पकड़ लिया और फिर क्या सारा घर को सर पर उठा लिया।रमेश के माँ और पिता ने उनके ही बच्चों को दोषी ठहराया और रमेश बच गया।

रमेश बड़ा हुआ तो अपने पिता के धंधे में लग गया क्योंकि पढ़ाई उससे हुई ही नहीं।कभी कभी वह रात में देर से लौटा करता था।और रेड लाइट एरिया में जाया करता था।और घर पर दुकान में काम बहुत ज्यादा होने का बहाना बनाया करता था।
रमेश के माँ बाप को अपने बेटे पर शक हुआ।उन्होंने उसकी जासूसी करनी शुरू की।और जो पाया उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।उन्होंने अपने बेटे की शादी करवाने की ठानी।और फिर धूम धाम से उसकी शादी सेठ रमणिकलाल की बेटी सुगंधा से करवाई,ताकि उसकी आदत में सुधार आ सके।

रमेश अपनी पत्नी को केवल और केवल अपनी भूख मिटाने का समान समझता था।अक्सर उसे भी पोर्न दिखाकर उसी अवस्था मे सेक्स करने को कहता था।सुगंधा अपने पति के बर्ताव से परेशान ही चुकी थी।
तभी सुगंधा के घर पर उसकी छोटी बहन फूलो की सगाई थी,और इस अवसर पर रमेश को भी उसके ससुराल से सगाई पर आने का न्योता मिला था।

सगाई का कार्यक्रम खत्म होने के बाद सभी सो रहे थे।सुगंधा रमेश के साथ नीचे के ऐसी वाले कमरे में सोई हुई थी।उनके बगल में सुगंधा की माँ अकेले एक कमरे में सोई हुई थी।और फूलों अपने कमरे में विश्राम कर रही थी।रमणिकलाल जी छत पे अपने कमरे में आए हुए अतिथिगणों के संग विश्राम कर रहे थे।

तभी बीच रात में सुगंधा की छोटी बहन फूलो की चिल्लाने की आवाज़ आई।उसकी माँ जब कमरे में पहुँचती है,किसी  मर्द को उसे दबोचते हुए देख उसके होश हवास उड़ जाते हैं,और उसे कुछ भी ना समझ में आने के कारण,किनारे पड़े लोहे की रॉड से उसके सर पर वार कर देती है।
सर पर चोट खाकर वह फूलो पर ही गिर पड़ता है।और जब फूलो उसे अपने ऊपर से दूर धकेलती है,सुगंधा की माँ उसकी शक्ल देख सदमे में पड़ जाती है।ये और कोई नही उसका दमाद था।

Written by sushil Kumar

5 Jun 2019

सादगी से जीना सीखना चाहिए,ना कि बाहरी आडम्बरों से।

छोटे कपड़ों से कोई सुंदर नहीं दिखता,दिखता है सुंदर तो केवल अपने सादगी से।

Adhmari Khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।


एक माँ और उसके बेटी के बीच एक बहस चल रही थी।

नहीं माँ मुझे वही कपड़े पहनने हैं।

बेटा अभी समय अच्छा नहीं है।इतने छोटे कपड़े पहनोगी तो लोगों के नज़र में आओगी।और उनकी गंदी नज़र पता नहीं कहाँ कहाँ जाएँगी।

पर माँ मेरे दोस्त लोग तो इससे भी छोटे कपड़े पहनकर आ रहे हैं।मेरी बेइज़्ज़ती हो जाएगी।प्लीज ना प्लीज!

अच्छा एक चीज बताओ।ये कपड़े कहाँ आएँ।

माँ दुकान से।

नहीं रे!नहीं
मैं ये पुछ रही थी,कि ये फैशन कहाँ से आया?

ज़ाहिर सी बात है माँ विदेशो से।

हाँ विदेशों से,उन विकसित देशों से जहाँ की इकॉनमी और पर कैपिटा इनकम बहुत ही बेहतर है।

हाँ माँ, हम भी तो विकासशील देश हैं।

यहाँ रेप क्यों होता है?

क्योंकि यहाँ के लोगों की मेंटेलिटी की ग्रोथ सही सही नहीं हुई है।

ठीक है बेटा अब ये बताओ,इनकी मेंटेलिटी ग्रोथ क्यों नही हुई?

क्योंकि ये गरीब हैं।

अब बात समझ में आई तुम्हें।यहाँ भारत में गरीबी स्तर बहुत ही ज्यादा है।फिर यहाँ के लोग कैसे विकसित देशों की मेंटेलिटी ला पाएँगे।गरीबी ज्यादा है तो बेरोजगारी भी ज्यादा है।बेरोज़गारी ज्यादा होने के कारण,उनकी सोच की परिधि भी सिकुड़ी सी रहती है।फिर ऐसी अवस्था में तुम क्यों छोटे कपड़े पहनने की जिद्द कर रही हो?एक चीज और बेटा,मुझे तुम बताओ कि जैसे जैसे हम विकसित होते जा रहे हैं,हमारे कपड़े सिकुड़ते जा रहे हैं।अगर ऐसे ही सिकुड़ते चले गए हमारे कपड़े तो हममे और हमारे पूर्वजों में क्या अंतर रह जाएगा।सुंदरता कम कपड़ों में नहीं,बल्कि सादगी में होती है।दिखावा पर मत जाओ बेटा।आज विदेशों में हमारी सभ्यता,हमारे पहनावे सभी कुछ अपनाए जा रहे हैं।और हमारे बच्चे अपनी सभ्यता छोड़,विदेशी सभ्यता को अपनाने को आतुर हैं।ऐसा क्यों बेटा ??ऐसा क्यों??

सॉरी माँ।सही बोला आपने।

अब ये आप पर छोड़ा है।क्या माँ सही है?या आपके हिसाब से कुछ और होना चाहिए??

Written by sushil kumar

4 Jun 2019

फेसबुक फ्रेंड।।

फेसबुक फ्रेंड।।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



(फेसबुक चैट)

हे नीना!
कहाँ थी?
बहुत दिनों के बाद दिख रही हो?

ह्म्म्म सन्नी
कुछ नहीं,एग्जाम चल रहे थे।
आज ही पेपर खत्म हुए।

गुड!
कैसा रहा तुम्हारा पेपर?

अच्छा रहा।
तुम बताओ
क्या चल रहा है आजकल।

अरे यार
पक गया हूँ।
रोज का वही लेक्चर्स।
सुबह से शाम तक थक जाता हूँ।
सुनते सुनते।

तुम सन्नी अभी कौन से सेमेस्टर में हो?

अरे बताया था ना।
दूसरा सेमेस्टर।

हूँ हूँ

चलो तुम्हारा पेपर भी अच्छा गया।
क्यों ना कहीं वीकेंड पर मिल कर सेलिब्रेट करते हैं।
वैसे भी बहुत ही ज्यादा मेरे लाइफ में बोरियत भर गई है।

हाँ हाँ।
पर कहाँ?

क्यों ना गोआ चले हमलोग।

सही है।चलते हैं।बड़ा मजा आएगा।

ओके नीना!
तो इस वीकेंड गोआ में धमाल मचाएँगे।
हे हे।

यस ! यस !यस !

ये जो फेसबुक पर इनकी चैट देखी आपने।ऐसी चैट से भरी पड़ी है आज के सोशल नेटवर्किंग साइट्स।लोग फेसबुक जैसे साइट्स से दोस्ती करते हैं,और दोस्ती की सीमाएँ लाँघने को क्या से क्या कर बैठते हैं।

अब नीना जो मैट्रिक की एग्जाम दी है,और उसके दोस्तों के बॉय फ्रेंड हैं।पर उसके घर पर अच्छे संस्कार मिलने के चलते कभी उसे इन सब चीजों की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।पर जब उसके एग्जाम खत्म हो गएँ और सन्नी ने घूमने का आफर रखा,तब वह खुश हो गई।क्योंकि कड़ी मेहनत करके वह थक चुकी थी।और वो भी अपने जीवन में रिफ्रेशमेंट चाहती थी।पर जब उसने अपने पेरेंट्स से गोआ घूमने जाने की बात की,वो भी फेसबुक फ्रेंड के साथ,तो उसके पेरेंट्स गुस्सा हो गएँ।और गोआ घुमाने को वो खुद तैयार हो गएँ

नीना खुश थी, पर जरा अपसेट भी।

फेसबुक चैट।
सन्नी कहाँ हो??

हाँ बोलिए राजकुमारी साहिबा।

काहे का राजकुमारी यार।

क्या हुआ?कुछ अपसेट दिख रही हो।

अरे यार गोआ जाने का प्लान कैंसिल हो गया।

क्या नीना?ऐसा क्यों?
कुछ प्रॉब्लम है क्या?

नहीं मेरे पेरेंट्स मुझे घूमाने ले जाएँगे गोआ।पर तुम्हारे साथ नहीनहीं जाने देंगे।

अरे यार!
अभी भी तू बच्ची की बच्ची रह गई।

क्या बताऊँ यार?
मेरे मॉम डैड मुझे कभी बड़े होने देते ही नहीं हैं।

आज पता चल गया कि मेरी नीना एक बच्ची है।
हूँ हूँ हूँ।

नहीं नहीं नहीं सन्नी।
मैं अभी बच्ची नहीं हूँ।

क्या बताया था अपने मम्मी पापा से।

यही कि मैं तेरे साथ गोआ घूमने जा रही हूँ।

क्या यार।
एकदम बेवकूफ है तू।

क्यों?

चल एक चीज बता,आज तक कभी अपने पेरेंट्स से झूठ बोला है क्या?

नहीं!

फिर तो तू बच्ची की बच्ची ही रह गई ना।
तेरे को चाहिए था,कि कुछ अलग बहाना बना कर अपने घर से निकलती।

जैसे।

क्या यार!
तेरे को बोलना था कि तू तेरी सहेलियों के साथ घूमने जा रही  है गोआ।

नीना को ये बातें उसके दिल को खटकी।
और उसने सन्नी को अपने फ़्रेंडलिस्ट से अनलिस्ट कर ब्लॉक कर दिया।

क्या उसने सन्नी के साथ सही किया।
एक अनजान फेसबुक फ्रेंड जो बहुत ही ज्यादा केयरिंग था।जो हमेशा उसका सपोर्ट करता था।जो बिना किसी शर्त हमेशा उसके साथ खड़ा रहता था।आज जब उसने नीना से उसके माँ बाप के विरुद्ध जाने को कहा,तो क्या गलत कहा।
क्या नीना सही में गलत थी या बिल्कुल सही।

अब आप बताओ?
यहाँ गलत कौन है?
ये आप पर छोड़ा है।
कमेंट करके बताओ ।

Written by sushil kumar



जितनी बार मैं तेरे करीब आया

Shayari जितनी बार मैं तेरे करीब आया kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। जितनी बार मैं तेरे करीब आया उतनी बार दिल म...