Showing posts with label Keep motivated. Show all posts
Showing posts with label Keep motivated. Show all posts

14 Jul 2019

Kuchh katu satya.

कुछ कटु सत्य।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।

कोई भी माँ बाप अगर अपने बच्चे के सामने ये बोले कि अब वो कभी भी आगे कोई भी सम्बन्ध किसी परिवार के साथ नहीं रखना चाहेंगे।तो क्या उनका बच्चा कभी भी उस परिवार के साथ घुल मिल सकेगा??क्या बच्चे का कभी भी उस परिवार के साथ सरल सम्बन्ध बन पाएगा।
शायद कभी नहीं।रिश्तों में दरार वहीं से दिल मे पैदा होती जाएगी, और एक दिन गहरी खाई में तब्दील हो जाएगी,जिसे चाह कर भी कोई जोड़ ना पाएगा।और उसके बाद और भी कुछ रिश्ते टूटने को बेबश हो जाएँगे।

कुछ लोगों का मानना होता है,कि आफिस का तनाव आफिस में ही छोड़कर आना चाहिए।घर पर अपनी पत्नी से बाँटना नहीं चाहिए।अब मुझे ये समझ नहीं आता है कि अगर एक पति की आफिस में किसी के साथ बकझक हुई।उसके बॉस ने उसे अच्छे से लताड़ दिया हो।सारा दिन वह तनाव में रहा हो।और जब वह घर आए तो अपने तनाव को किसी के साथ शेयर ना करे,और दिल ही दिल घुटता रहे।और एक दिन तनाव से मुक्ति पाने को फंदे पर झूल जाए,वह अच्छा रहेगा।कोई कैसे बोल सकता है कि अपने तनाव को आफिस में छोड़ कर आओ।ऐसा कभी पॉसिबल है।किसी ने आपके अस्तित्व को झकझोर दिया हो,और आप उसे बांटने के बजाय,अपने अंदर उसे दबा कर रखे रहिए।शायद नहीं।

लोगो को बस अपने बच्चे की खुशी प्यारी है।मेरे बच्चे के साथ मेरे सम्बन्ध बना रहे,बाकी दुनिया जाए भाड़ में।बच्चे की शादी हुई।और फिर क्या कूटनीति शुरू हो जाती है।दोनो पक्ष अच्छे बनने की दौड़ में अच्छी खासी शादी शुदा जोड़ो की जिंदगी को नरक से भी बदतर बना देने को आतुर रहते हैं।







koi bhi maan baap agar apne bachche ke saamne ye bole ki ab vo kabhi bhi aage koi bhi sambandh kisi parivaar ke saath nahin rakhnaa chaahenge।to kyaa unkaa bachchaa kabhi bhi us parivaar ke saath ghul mil sakegaa??kyaa bachche kaa kabhi bhi us parivaar ke saath saral sambandh ban paaagaa।

shaayad kabhi nahin।rishton men daraar vahin se dil me paidaa hoti jaaagi, aur ek din gahri khaai men tabdil ho jaaagi,jise chaah kar bhi koi jod naa paaagaa।aur uske baad aur bhi kuchh rishte tutne ko bebash ho jaaange।


kuchh logon kaa maannaa hotaa hai,ki aaphis kaa tanaav aaphis men hi chhodkar aanaa chaahia।ghar par apni patni se baantnaa nahin chaahia।ab mujhe ye samajh nahin aataa hai ki agar ek pati ki aaphis men kisi ke saath bakajhak hui।uske bas ne use achchhe se lataad diyaa ho।saaraa din vah tanaav men rahaa ho।aur jab vah ghar aaa to apne tanaav ko kisi ke saath sheyar naa kare,aur dil hi dil ghuttaa rahe।aur ek din tanaav se mukti paane ko phande par jhul jaaa,vah achchhaa rahegaa।koi kaise bol saktaa hai ki apne tanaav ko aaphis men chhod kar aao।aisaa kabhi pasibal hai।kisi ne aapke astitv ko jhakjhor diyaa ho,aur aap use baantne ke bajaay,apne andar use dabaa kar rakhe rahia।shaayad nahin।


logo ko bas apne bachche ki khushi pyaari hai।mere bachche ke saath mere sambandh banaa rahe,baaki duniyaa jaaa bhaad men।bachche ki shaadi hui।aur phir kyaa kutniti shuru ho jaati hai।dono paksh achchhe banne ki daud men achchhi khaasi shaadi shudaa jodo ki jindgi ko narak se bhi badatar banaa dene ko aatur rahte hain।


Written by sushil kumar




Sapne atut hain to prayas bhi atut hi rahega.

सपने अटूट हैं,तो प्रयास भी अटूट ही रहेगा।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



नई नई जॉब,नया नया जगह।घर से पहली बार मैं बाहर निकला था।मुम्बई के नाम से ही दिल धड़कने लगता है।पता नहीं कितने लोगों की इस शहर ने जिन्दगानी बदल कर रख दी है।हर कोई एक नया सपना संजोकर इस शहर में कदम रखता है।किसी को हीरो बनना है,तो कोई फैशन डिजाइनिंग में अपना कदम जमाना चाहता है,तो कोई मॉडल बनने का सपना लेकर यहाँ कदम रखा है।पर मैं,मैं तो आई बी पी एस का एग्जाम पास करके बैंक की नौकरी करने को यहाँ कदम रखा था।
सैलरी ठीक ठाक थी।हाउस रेंट अलौवंस मिलता था,पर उसमें सही सही रूम मिल पाना सम्भव नही था।इसलिए मैने निर्णय ले लिया था कि मुझे अपने सैलरी से भी कुछ ना कुछ तो जोड़ना ही होगा।वरना अच्छा रूम मिल पाना सम्भव नहीं।न्यूज़पेपर में अपने आशियाने को तलाशना शुरू किया।ढूंढते ढूंढते मुझे एक पता मिला,जो फोर्ट से जरा दूर था,पर पढ़कर मुझे बहुत खुशी मिली।2बी एच के केवल २२००० में घाटकोपर के इलाके में।मुझे अपने सैलरी से केवल दो हजार ही देने होंगे।चलो देख कर आते हैं।मैने रूम ओनर को फोन किया,और अपनी इच्छा जताई।जब उसने सुना कि मैं कोई बैंक में हूँ,तो वह बहुत खुश हुआ।
मैं बताए हुए टाइम पर घाटकोपर पहुँचा ।लिखे हुए पते पर जब पहुँचा, मुझे बहुत खुशी हुई,वहाँ आलीशान आलीशान बंगले खड़े थे।लिफ्ट से होकर मैं 1203 के सामने पहुँचा।बेल बजाया तो एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बाहर निकला।उसने मुझे कमरे दिखाए,बहुत ही शानदार कमरे थे।मैने उसे एडवांस देकर बुक कर लिया।
अगली सुबह समान लेकर मैं रूम पर पहुँच गया।बैंक से जब  मैं शाम को वापस आया।बहुत ज्यादा काम के वजह से काफि थक गया था।आते ही जो बेड पर लेटा,झपकी लग गई।फिर इग्यारह बजे मेरी भूख से नींद खुली।उठकर फटाफट मैने मैग्गी बना ली और खाकर सो गया।
बिच रात में मेरी नींद किसी आवाज की कारण खुल गई।और दिल मेरा जोर जोर से धड़कने लगा।किसी लड़की की रोने की आवाज अंदर कमरे से आ रही थी।मैने लाइट्स अंदर वाले कमरे की ऑन की,पर वहाँ कोई नही था।मैंने लाइट्स ऑफ कर अपने कमरे में सोने आ गया।मुझे लगा जैसे कोई मिथ्याभास था।सुबह जरा लेट से नींद खुली।फटाफट सैंडविच बनाया,खाया और निकल लिया।
रात में बैंक से आते आते लेट हो गया।बहुत थके होने के कारण रास्ते में ही मैने स्विगगी से खाने का आर्डर कर दिया।स्विगगी वालो का फोन नही आने पर मैं परेशान हो गया।कहीं स्विगगी वालो ने मेरा आर्डर कैंसिल तो नही कर दिया।मैने स्विगगी एप्प खोला,तो पाया कि मेरा खाना डिलीवर भी हो गया है।मुझे लगा मेरा खाना कोई और तो नहीं खा गया।नहीं नहीं!मैं ये कैसी कैसी बातें कर रहा हूँ।जरूर गार्ड ने अपने पास रख लिया होगा।
जब मैं अपने सोसाइटी के गेट पर पहुँचा,तो पूछने पर उसने बताया कि मेरा खाना मेरे रूम पर पहुँच चुका है।मैं सोचा,ऐसे कैसे हो सकता है?ऐसा तो नही कि मेरे पीछे रूम ओनर ने आकर मेरे रूम की चेकिंग की हो।या गार्ड को कुछ कंफ्यूजन हो गया होगा।ऐसी बहुत सारी बातें दिमाग में घूम रही थी।अपने कमरे को खोला तो पाया कि मेरा आर्डर किया हुआ खाना डाइनिंग टेबल पर रखा हुआ है।मैं चौंक गया।मैं गार्ड को फोन किया और पूछा कि मेरे रूम ओनर आए थे क्या?उसने मना कर दिया।फिर मैं और भी डर गया,मतलब मेरे रूम की चाबी यहाँ बिल्डिंग में या सोसाइटी में किसी और के पास भी है।मैने रूम ओनर को फोन कर उसकी पुष्टि की,पर उन्होंने साफ साफ मना कर दिया,कि उस फ्लैट की तीन चाबी है,दो उनके पास है,एक मेरे पास है।
अब ये क्या चक्कर है।सोचते सोचते खाना खाया,और निर्णय लिया कि सोसाइटी के चेयरमैन से बात करके सुबह सुबह आज का पूरा सी सी टीवी फूटेज देखूँगा।खाकर सोने चला गया।तभी रात में एकाएक मेरी नींद खुली।किसी लड़की की फिर से अंदर के कमरे से रोने की आवाज़ आ रही थी।मैं हिम्मत करके लाइट्स ऑन की और अंदर कमरे की ओर चला गया।जब अंदर के कमरे की गेट खोला,तो आवाज़ गायब हो गई।मैने लाइट्स ऑन किया तो कुछ नही पाया।
फिर बेड पर जो आकर लेटा हूँ, सुबह सुबह नींद खुली।मैं सोसाइटी के चेयरमैन से बात करके सारी रात की बातें सामने रखी।उन्होंने सी सी टीवी देखने के लिए परमिशन दे दिया।मैने क्या पाया कि मेरे सुबह सुबह बैंक जाने के बाद और बैंक से घर आने के पहले केवल वह डिलीवरी बॉय आया था।उसने बेल बजाई, और अंदर से डोर खुला,और वह खाना देकर वहाँ से निकल लिया।
मैने मन ही मन सोचा, कि मेरे साथ कोई और भी रहता है क्या???मैं भागा भागा रूम में आया,और नहीं भी तो पच्चीस बार अपने कमरे की बेल बजाई, पर किसी ने डोर नहीं खोला।आखिर क्या राज है???मैने कमरे की कोने कोने से तलाशी ली,पर कोई नहीं मिला।मैने बैंक में फोन करके एक दिन की छुट्टी माँगी, और मेरी छुट्टी सैंक्शन हो गई।मैने आज तय कर लिया था कि उस चोर को पकड़ कर ही दम लूँगा।फिर मुझे लगा कि जो मेरे साथ होता है,वो पुराने वाले रेन्टर लोग के साथ भी होता होगा।मैं गार्ड के पास गया,और मेरे कमरे के पुराने रेन्टर का नम्बर पूछा।पर वो बता ना पाया।फिर पूछा कि वो लोग यहाँ से कब गए।ये भी वह बता नही पा रहा था।और बात को गोल गोल घुमाने लगा।कहा इतने लोग आते जाते हैं,किसकी किसकी खबर रखें?मानो किसी ने उसे साफ साफ हिदायत दी हो,कि उस कमरे के बारे में किसी को भी कुछ नही बताना।फिर मैं उसे साइड में ले जाकर चुपके से ५०० रुपए की एक नोट पकड़ा दी।फिर क्या उसने सारे पत्ते ही खोल दिये।
मेरे से पहले एक स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस यहाँ रहती थी।जो काम कम मिलने के चलते ड्रग्स एडिक्टेड हो गई थी,और जिस्म पड़ोसी के धंधे में भी कूदने को मजबूर हो गई थी।और एक सुबह जब वो अपने कमरे से निकली नही, तो जब उसका कमरा खोला गया,तो उसे फैन पर झूलते हुए पाया गया था।वो मर चुकी थी।
मेरा दिमाग ठनका,शायद इसी कारण से रात में मुझे किसी लड़की की रोने की आवाज़ आती है।मैने फोन कर रूम ओनर से बात की,और सारी घटना को विस्तार से बताया।पर गार्ड का नाम नही बताया।फिर सारा सामान लेकर केवल तीन दिनों में उस भूतिया घर को अलविदा कहकर किसी और के फ्लैट में शिफ्ट हो गया।
आँखों मे सपने लिए लोग यहाँ आते हैं।
कुछ के ही सपने पूरे होते हैं
बाकी के मिट जाते हैं।
पर मिटने का ये मतलब तो नहीं
कि प्रयास ही बंद कर दो।
सपने अगर अटूट हैं
तो प्रयास भी निरन्तर जारी रहती है।
भले मंजिल से चूक गए हैं आज
पर कल का सवेरा,कल का दिन और
कल की रात तो मेरी ही होगी।
है ना😉






nayi nayi jab,nayaa nayaa jagah।ghar se pahli baar main baahar niklaa thaa।mumbaayi ke naam se hi dil dhdakne lagtaa hai।pataa nahin kitne logon ki es shahar ne jindgaani badal kar rakh di hai।har koi ek nayaa sapnaa sanjokar es shahar men kadam rakhtaa hai।kisi ko hiro bannaa hai,to koi phaishan dijaaening men apnaa kadam jamaanaa chaahtaa hai,to koi madal banne kaa sapnaa lekar yahaan kadam rakhaa hai।par main,main to aai bi pi es kaa egjaam paas karke baink ki naukri karne ko yahaan kadam rakhaa thaa।

sailri thik thaak thi।haaus rent alauvans miltaa thaa,par usmen sahi sahi rum mil paanaa sambhav nahi thaa।esalia maine nirnay le liyaa thaa ki mujhe apne sailri se bhi kuchh naa kuchh to jodnaa hi hogaa।varnaa achchhaa rum mil paanaa sambhav nahin।nyujpepar men apne aashiyaane ko talaashnaa shuru kiyaa।dhundhte dhundhte mujhe ek pataa milaa,jo phort se jaraa dur thaa,par pdhakar mujhe bahut khushi mili।2bi ech ke keval 22000 men ghaatkopar ke elaake men।mujhe apne sailri se keval do hajaar hi dene honge।chalo dekh kar aate hain।maine rum onar ko phon kiyaa,aur apni echchhaa jataai।jab usne sunaa ki main koi baink men hun,to vah bahut khush huaa।

main bataaa hua taaem par ghaatkopar pahunchaa ।likhe hua pate par jab pahunchaa, mujhe bahut khushi hui,vahaan aalishaan aalishaan bangle khde the।lipht se hokar main 1203 ke saamne pahunchaa।bel bajaayaa to ek adhed umr kaa vyakti baahar niklaa।usne mujhe kamre dikhaaa,bahut hi shaandaar kamre the।maine use edvaans dekar buk kar liyaa।

agli subah samaan lekar main rum par pahunch gayaa।baink se jab  main shaam ko vaapas aayaa।bahut jyaadaa kaam ke vajah se kaaphi thak gayaa thaa।aate hi jo bed par letaa,jhapki lag gayi।phir egyaarah baje meri bhukh se nind khuli।uthakar phataaphat maine maiggi banaa li aur khaakar so gayaa।

bich raat men meri nind kisi aavaaj ki kaaran khul gayi।aur dil meraa jor jor se dhdakne lagaa।kisi ldki ki rone ki aavaaj andar kamre se aa rahi thi।maine laaets andar vaale kamre ki aun ki,par vahaan koi nahi thaa।mainne laaets auph kar apne kamre men sone aa gayaa।mujhe lagaa jaise koi mithyaabhaas thaa।subah jaraa let se nind khuli।phataaphat saindavich banaayaa,khaayaa aur nikal liyaa।

raat men baink se aate aate let ho gayaa।bahut thake hone ke kaaran raaste men hi maine sviggi se khaane kaa aardar kar diyaa।sviggi vaalo kaa phon nahi aane par main pareshaan ho gayaa।kahin sviggi vaalo ne meraa aardar kainsil to nahi kar diyaa।maine sviggi epp kholaa,to paayaa ki meraa khaanaa dilivar bhi ho gayaa hai।mujhe lagaa meraa khaanaa koi aur to nahin khaa gayaa।nahin nahin!main ye kaisi kaisi baaten kar rahaa hun।jarur gaard ne apne paas rakh liyaa hogaa।

jab main apne sosaaeti ke get par pahunchaa,to puchhne par usne bataayaa ki meraa khaanaa mere rum par pahunch chukaa hai।main sochaa,aise kaise ho saktaa hai?aisaa to nahi ki mere pichhe rum onar ne aakar mere rum ki cheking ki ho।yaa gaard ko kuchh kamphyujan ho gayaa hogaa।aisi bahut saari baaten dimaag men ghum rahi thi।apne kamre ko kholaa to paayaa ki meraa aardar kiyaa huaa khaanaa daaening tebal par rakhaa huaa hai।main chaunk gayaa।main gaard ko phon kiyaa aur puchhaa ki mere rum onar aaa the kyaa?usne manaa kar diyaa।phir main aur bhi dar gayaa,matalab mere rum ki chaabi yahaan bilding men yaa sosaaeti men kisi aur ke paas bhi hai।maine rum onar ko phon kar uski pushti ki,par unhonne saaph saaph manaa kar diyaa,ki us phlait ki tin chaabi hai,do unke paas hai,ek mere paas hai।

ab ye kyaa chakkar hai।sochte sochte khaanaa khaayaa,aur nirnay liyaa ki sosaaeti ke cheyarmain se baat karke subah subah aaj kaa puraa si si tivi phutej dekhungaa।khaakar sone chalaa gayaa।tabhi raat men ekaaak meri nind khuli।kisi ldki ki phir se andar ke kamre se rone ki aavaaj aa rahi thi।main himmat karke laaets aun ki aur andar kamre ki or chalaa gayaa।jab andar ke kamre ki get kholaa,to aavaaj gaayab ho gayi।maine laaets aun kiyaa to kuchh nahi paayaa।

phir bed par jo aakar letaa hun, subah subah nind khuli।main sosaaeti ke cheyarmain se baat karke saari raat ki baaten saamne rakhi।unhonne si si tivi dekhne ke lia paramishan de diyaa।maine kyaa paayaa ki mere subah subah baink jaane ke baad aur baink se ghar aane ke pahle keval vah dilivri bay aayaa thaa।usne bel bajaai, aur andar se dor khulaa,aur vah khaanaa dekar vahaan se nikal liyaa।

maine man hi man sochaa, ki mere saath koi aur bhi rahtaa hai kyaa???main bhaagaa bhaagaa rum men aayaa,aur nahin bhi to pachchis baar apne kamre ki bel bajaai, par kisi ne dor nahin kholaa।aakhir kyaa raaj hai???maine kamre ki kone kone se talaashi li,par koi nahin milaa।maine baink men phon karke ek din ki chhutti maangi, aur meri chhutti sainkshan ho gayi।maine aaj tay kar liyaa thaa ki us chor ko pakd kar hi dam lungaa।phir mujhe lagaa ki jo mere saath hotaa hai,vo puraane vaale rentar log ke saath bhi hotaa hogaa।main gaard ke paas gayaa,aur mere kamre ke puraane rentar kaa nambar puchhaa।par vo bataa naa paayaa।phir puchhaa ki vo log yahaan se kab gaye।ye bhi vah bataa nahi paa rahaa thaa।aur baat ko gol gol ghumaane lagaa।kahaa etne log aate jaate hain,kiski kiski khabar rakhen?maano kisi ne use saaph saaph hidaayat di ho,ki us kamre ke baare men kisi ko bhi kuchh nahi bataanaa।phir main use saaed men le jaakar chupke se 500 rupaaye ki ek not pakdaa di।phir kyaa usne saare patte hi khol diye।

mere se pahle ek stragaling ektres yahaan rahti thi।jo kaam kam milne ke chalte drags edikted ho gayi thi,aur jism pdosi ke dhandhe men bhi kudne ko majbur ho gayi thi।aur ek subah jab vo apne kamre se nikli nahi, to jab uskaa kamraa kholaa gayaa,to use phain par jhulte hua paayaa gayaa thaa।vo mar chuki thi।

meraa dimaag thankaa,shaayad esi kaaran se raat men mujhe kisi ldki ki rone ki aavaaj aati hai।maine phon kar rum onar se baat ki,aur saari ghatnaa ko vistaar se bataayaa।par gaard kaa naam nahi bataayaa।phir saaraa saamaan lekar keval tin dinon men us bhutiyaa ghar ko alavidaa kahakar kisi aur ke phlait men shipht ho gayaa।

aankhon me sapne lia log yahaan aate hain।

kuchh ke hi sapne pure hote hain

baaki ke mit jaate hain।

par mitne kaa ye matalab to nahin

ki pryaas hi band kar do।

sapne agar atut hain

to pryaas bhi nirantar jaari rahti hai।

bhale manjil se chuk gaye hain aaj

par kal kaa saveraa,kal kaa din aur

kal ki raat to meri hi hogi।

hai naa😉





Written by sushil kumar

7 Jul 2019

Buri aadaton se bachen.

बुरी आदतों से बचें।मानव जीवन ईश्वर के द्वारा प्रदान किया हुआ सबसे अनमोल तोफा है।उसे व्यर्थ में मत गंवाओ।

Adhmari Khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।

मेरे पांव लड़खड़ा रहे थे,मैं रस्ते पर सीधा चलने की कोशिश कर रहा था।पर चाह कर भी अपने कदमो पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था। कभी रोड के इस तरफ तो कभी रोड के उस तरफ पहुंच जा रहा था।तभी बहुत जोर से हॉर्न की आवाज सुनाई दी,और ठीक उसी वक़्त किसी गाड़ी ने पीछे से जो धक्का मारा है,मैं हवा में उड़ने लग गया था।और जाकर रोड के साइड में गिरा।मुझे चोट जो लगी सो तो लगी ही थी,पर मेरे शरीर के हिस्सों में से खून भी बह निकले थे।मैं दर्द से कराह रहा था।बार बार माँ को याद किया जा रहा था।माँ हमेशा बोलती थी कि पीना छोड़ दो,एक दिन ये शराब तुम्हारी जान ले कर ही छोड़ेगी।माँ तुमने सही बोला था,मैने तुम्हारी बात क्यों नही मानी माँ!क्यों नहीं मानी माँ!
मैं शराबी पहले नहीं था।मैं ना ही तंबाखू खाता था,ना सिगरेट पीता था,ना शराब।मेरे अंदर कोई भी खोट नहीं थी।लेकिन फिर कैसे पीना शुरू कर दी थी मैने?
दरअसल एक लड़की थी मेरे कॉलेज में,जिसका नाम सोनम था,मैं उससे बहुत प्यार करता था।और शायद वो भी मुझसे प्यार करती थी।शायद हाँ।
जब भी मुझे वो देखती,तो मुस्काती थी,और उसकी उस मुस्कान पर मैं फिदा हो जाता था।जिस दिन उसकी मुस्कान नहीं देख पाता था,मेरा दिल बिल्कुल नहीं लगता था और उदास उदास रहा करता था।
और मैं कोई ना कोई बहाना लेकर,उसके करीब पहुँच ही जाया करता था।पर उसकी प्रतिक्रिया कुछ अच्छी नहीं रहती थी।उसे देखे बिना मेरा कोई दिन नही जाता था।आखिरकार वो दिन आ ही गया,जब उसने मुझसे कुछ बात करने की बात कही।मुझे उसकी बेसब्री देख,उसके दिल में मेरे लिए प्यार की जो गहराई थी,उसका अनुमान लगाने की कोशिश करने लगा।
सोनम:-तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो।
मैं:-हाँ।
सोनम:-तुम उसकी सीमाओं को लांघो मत भी ना।प्लीज।
मैं:-समझ गया।शायद उसे मेरा व्यवहार सही नही लग रहा है।मैं उससे हिम्मत कर पूछा कि क्या तुम्हारा कोई बॉय फ़्रेंड है क्या?
(मन ही मन में:-नहीं हो,नहीं हो)
सोनम:- हाँ।
मुझे उस हाँ शब्द ने अंदर से झकझोर दिया था।और मेरे अंदर के जीने की इच्छा को भी खत्म करने लगा था।मुझे ऐसी हालत में देख,मेरे यार संजय ने सब कुछ भूल आगे बढ़ने की राय दी।राय देना आसान था।पर जो इतने दिनों का प्यार था,भले ही एकतरफा था,पर था तो।उसे कैसे एक पल में कोई दिलोदिमाग से मिटा दे।
तभी मेरा दोस्त सन्नी ने मुझे उस शाम में अपने बर्थडे पार्टी पर अपने घर में बुलाया।मैं अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वहाँ पहुँच गया।सन्नी ने भी किसी लड़की को छोड़ा था।सो मैने उससे पूछ लिया,कि आखिर कैसे तुमने उस लड़की को दिल से सदा सदा के लिए मिटा दिया।उसने कहा कि शराब ही है एक ऐसी वस्तु है,जिसके आगोश में अगर तुम जाते हो,तो फिर वो लड़की क्या सारे दुनिया के गम को तुम अपने हृदय से मिटा सकते हो।मुझे उसकी बात दिल को लग गई।
मैंने शराब पीना शुरू कर दी।और मेरी आदत जो बिगड़ने की आगाज़ हुई,मैं गांजा,चरस,सिगरेट,तम्बाकू सब कुछ का सेवन करने लगा।
सुबह हो चुकी थी।मुझे होश आया तो खुद को रोड पर लेटा हुआ पाया।मैने उठने की कोशिश की,पर जख्म और दर्द की वजह से कराह उठा।फिर भी कैसे भी उठकर अपने घर की ओर चल पड़ा।मुझे अपनी माँ से बोलना था कि माँ मैं सारी बुरी आदतें छोड़ना चाहता हूँ।मैं जब अपने घर के बाहर पहुँचा, तो वहाँ काफी भीड़ पाया।बहुत सारे लोग किसी को घेर कर खड़े हुए थे।भीड़ के अंदर से मानो मेरी माँ पापा और मेरी बहन के रोने की आवाज़ आ रही थी।मैं किसी तरह अंदर घुसा तो पाया कि कोई मेरा हमशक्ल वहाँ मृत लेटा हुआ है।मैं हँस पड़ा, और चिल्ला कर सबसे कहने लगा,माँ बाबूजी मैं यहाँ हूँ।बहना मैं यहाँ हूँ।लाख चिल्लाने और उन्हें बताने की कोशिश में जब विफल हो गया,तो मैं रो पड़ा।आखिरकार मेरी बुरी आदतों ने मुझे मौत के मुंह में धकेल ही दिया।







mere paanv ldakhdaa rahe the,main raste par sidhaa chalne ki koshish kar rahaa thaa।par chaah kar bhi apne kadmo par niyantran nahin kar paa rahaa thaa। kabhi rod ke es taraph to kabhi rod ke us taraph pahunch jaa rahaa thaa।tabhi bahut jor se harn ki aavaaj sunaai di,aur thik usi vkt kisi gaadi ne pichhe se jo dhakkaa maaraa hai,main havaa men udne lag gayaa thaa।aur jaakar rod ke saaed men giraa।mujhe chot jo lagi so to lagi hi thi,par mere sharir ke hisson men se khun bhi bah nikle the।main dard se karaah rahaa thaa।baar baar maan ko yaad kiyaa jaa rahaa thaa।maan hameshaa bolti thi ki pinaa chhod do,ek din ye sharaab tumhaari jaan le kar hi chhodegi।maan tumne sahi bolaa thaa,maine tumhaari baat kyon nahi maani maan!kyon nahin maani maan!

main sharaabi pahle nahin thaa।main naa hi tambaakhu khaataa thaa,naa sigret pitaa thaa,naa sharaab।mere andar koi bhi khot nahin thi।lekin phir kaise pinaa shuru kar di thi maine?

darasal ek ldki thi mere kalej men,jiskaa naam sonam thaa,main usse bahut pyaar kartaa thaa।aur shaayad vo bhi mujhse pyaar karti thi।shaayad haan।

jab bhi mujhe vo dekhti,to muskaati thi,aur uski us muskaan par main phidaa ho jaataa thaa।jis din uski muskaan nahin dekh paataa thaa,meraa dil bilkul nahin lagtaa thaa aur udaas udaas rahaa kartaa thaa।

aur main koi naa koi bahaanaa lekar,uske karib pahunch hi jaayaa kartaa thaa।par uski pratikriyaa kuchh achchhi nahin rahti thi।use dekhe binaa meraa koi din nahi jaataa thaa।aakhirkaar vo din aa hi gayaa,jab usne mujhse kuchh baat karne ki baat kahi।mujhe uski besabri dekh,uske dil men mere lia pyaar ki jo gahraai thi,uskaa anumaan lagaane ki koshish karne lagaa।

sonam:-tum mere bahut achchhe dost ho।

main:-haan।

sonam:-tum uski simaaon ko laangho mat bhi naa।plij।

main:-samajh gayaa।shaayad use meraa vyavhaar sahi nahi lag rahaa hai।main usse himmat kar puchhaa ki kyaa tumhaaraa koi bay frend hai kyaa?

(man hi man men:-nahin ho,nahin ho)

sonam:- haan।

mujhe us haan shabd ne andar se jhakjhor diyaa thaa।aur mere andar ke jine ki echchhaa ko bhi khatm karne lagaa thaa।mujhe aisi haalat men dekh,mere yaar sanjay ne sab kuchh bhul aage bdhne ki raay di।raay denaa aasaan thaa।par jo etne dinon kaa pyaar thaa,bhale hi ekatarphaa thaa,par thaa to।use kaise ek pal men koi dilodimaag se mitaa de।

tabhi meraa dost sanni ne mujhe us shaam men apne barthde paarti par apne ghar men bulaayaa।main apne akelepan ko dur karne ke lia vahaan pahunch gayaa।sanni ne bhi kisi ldki ko chhodaa thaa।so maine usse puchh liyaa,ki aakhir kaise tumne us ldki ko dil se sadaa sadaa ke lia mitaa diyaa।usne kahaa ki sharaab hi hai ek aisi vastu hai,jiske aagosh men agar tum jaate ho,to phir vo ldki kyaa saare duniyaa ke gam ko tum apne hriaday se mitaa sakte ho।mujhe uski baat dil ko lag gayi।

mainne sharaab pinaa shuru kar di।aur meri aadat jo bigdne ki aagaaj hui,main gaanjaa,charas,sigret,tambaaku sab kuchh kaa sevan karne lagaa।

subah ho chuki thi।mujhe hosh aayaa to khud ko rod par letaa huaa paayaa।maine uthne ki koshish ki,par jakhm aur dard ki vajah se karaah uthaa।phir bhi kaise bhi uthakar apne ghar ki or chal pdaa।mujhe apni maan se bolnaa thaa ki maan main saari buri aadten chhodnaa chaahtaa hun।main jab apne ghar ke baahar pahunchaa, to vahaan kaaphi bhid paayaa।bahut saare log kisi ko gher kar khde hua the।bhid ke andar se maano meri maan paapaa aur meri bahan ke rone ki aavaaj aa rahi thi।main kisi tarah andar ghusaa to paayaa ki koi meraa hamashakl vahaan mriat letaa huaa hai।main hnas pdaa, aur chillaa kar sabse kahne lagaa,maan baabuji main yahaan hun।bahnaa main yahaan hun।laakh chillaane aur unhen bataane ki koshish men jab viphal ho gayaa,to main ro pdaa।aakhirkaar meri buri aadton ne mujhe maut ke munh men dhakel hi diyaa।


Written by sushil kumar

6 Jul 2019

Manavta ka dharm sabse shresth dharm hai.

मानवता का धर्म सबसे श्रेष्ठ धर्म है।

Adhikari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।

ये कहानी काल्पनिक है।इसका सम्बन्ध किसी भी जीवित या मृत आदमी से नहीं है।


बहुत तेज़ बारिश हो रही थी।दिन का समय था,पर घनघोर बादल छाने के कारण,शाम का माहौल लग रहा था।फायरिंग  लगातार जारी थी।मेरे पास भी गोलियां खत्म हो रही थी।साथ वाले या तो मारे जा चुके थे,या घायल अवस्था में बेहोश हो गिरे हुए थे।मै पीछे हटने के प्रयास में एक कदम पीछे क्या हटाया था कि एक बुल्लेट मेरे सर को छूते हुए निकल गई।मेरे मुँह से "ओ माँ" शब्द अनायास ही  निकल पड़े।मेरे चेहरे पर से होते हुए खून नीचे टपक रहा था।सारी घटनाएं मेरी बचपन से अभी तक की एक पल में मुझे दिख गए थे।मानो ईश्वर सजा मुकर्रर करने से पहले मेरे द्वारा किए गए अच्छे और बुरे कृत का दृश्य मुझे दिखाना चाहता हो।आइए उन दृश्यों के झलक को आपको भी दिखाएँ।
ये बात कुछ बत्तीस साल पहले की है,जब मैं छह साल का था।मेरा जन्म पी.ओ.के. यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हुआ था।मैं जन्म से हिन्दू था।मेरी माँ मुस्लिम थी और मेरे पिता हिन्दू।पर बाद में मेरे पिता को जबरन इस्लाम कबुलाया गया था।मेरे पिता और मेरी माँ भले मुसलमान थे,पर दिल से सभी धर्मों का सम्मान करते थे और यही संस्कार बचपन से मुझे देने की कोशिश करते थे।
मैं पढ़ाई करने मदरसा जाया करता था।वहाँ हमें ये सीख दी जाती थी कि हम बड़े ही भाग्यशाली हैं,जो इस पाक धरती पर हमने जन्म लिया है।हमारे भाई बन्धु जो पहाड़ी के उस पार रहते हैं,उनपर रोज़ जुल्म ढाए जा रहे हैं,वहाँ की हुक्मरानों के द्वारा।हमें उन्हें आज़ाद कराना है,हर हालत में,हर कीमत पर।पढ़ाई होती थी,पर नाम भर की।हमें हमारे शहिद भाईयों की कहानियां सुनाई जाती थी,कि कैसे उन्होंने हिंदुस्तानियों के घर में घुस कर उनके नाक में दम कर रखे थे,और हुक्मरानों की नींद हराम कर रखी थी।
गैर मुस्लिमों से नफरत करना, उन्हें हमेशा अपने जूते के नोक पर रखना।क्योंकि वही लोग हमारे मुसलमान भाइयों के दुश्मन हैं,उन्होंने उन पर बहुत जुल्म ढाए हैं।अगर हम उन्हें जहन्नुम पहुँचा देंगे,तो अल्लाह हमे जन्नत बख्शेगा।और हम पूरे जोश में अपने कदम को अंधकार की ओर बढ़ाते चले गए।कश्मीर को हर हालात में हिंदुस्तानियों से आज़ाद कराना ही हमारा मकसद बताया जाता था।और इसीलिए हमें अल्लाह ने इस धरती पर भेजा है,हमें ये जिंदगी बख्शी है।
मतलब इतने जहर,इतने जहर कि अगर कोई गैर मजहबी सामने से शांति पूर्वक कहीं जा रहा हो,तो उसे भी मौत के घाट उतारने को अपना धर्म समझ बैठे थे,हम सभी ने।
फिर हमारी ट्रेनिंग जमकर हुई।हमें सारे राइफल्स,बन्धुके, गोली बारूद की शिक्षा दी गई।और ये सब कितने साल में,केवल दस साल में।हमें हमारे दिमाग की इंटेलिजेंस के हिसाब से काम सौंपे जाते थे।जिसका दिमाग ज्यादा चलता है,उन्हें हाईयर स्टडीज के लिए भेजा  गया,ताकि हम जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके।और जो हमारे जैसे थे,जिनका दिमाग नॉर्मल चलता था,उन्हें और भी कड़ी ट्रेनिंग के लिए एक गुप्त जगह भेजा गया।पर जिनका दिमाग बिल्कुल ही नहीं चलता था और जिनकी झूठ आसानी से पकड़ी जाती थी,उन्हें ह्यूमन बम बनाकर हिंदुस्तान के सरजमीं पर भेज दिया जाता था।जहाँ उनका ब्रेन वाश कर बम ब्लास्ट करवाए जाते थे।
मेरी ट्रेनिंग के दौरान मेरे पिता और माता के इंतकाल की खबर आई।मैं बिल्कुल टूट सा गया।पर फिर से मौलवियों ने इतनी जहर घोली कि मैं ट्रेनिंग में पूरी शिद्दत से लग गया।और सोलह साल की उम्र में हिंदुस्तानी बॉर्डर क्रॉस कर कश्मीर में पनाह ले ली थी।कश्मीर में अपने भाइयों पर जुल्म होते देख मेरा खून खोल उठता था।किसी दिन जब भी खबर आती थी कि आज एक और कश्मीरी भाई हमारा शहीद हुआ है,मेरा मन करता था कि बारूदों से सारे हिंदुस्तानी सैनिकों को उड़ा डालूँ।पर मेरे हाथ बंधे हुए थे।हाइ कमान से जब तक कोई इशारा नहीं मिले,तब तक मुझे यहीं छिप कर रहना है।
तभी मेरी दोस्ती वहीं पड़ोस में रहने वाली रिहाना से हुई।रिहाना का भाई सेना में अच्छे पोस्ट पर था।रिहाना अक्सर अपने भाई की बहादुरी के खीस्से सुनाया करती थी।मुझे उसके भाई के बहादुरी की बातों से ज्यादा मजा,किसी बहाने उससे बात करने में लगती थी।मुझे वह अच्छी लगने लगी थी।

हाई कमान का आदेश आ चुका था,मुझे कश्मीर में बम ब्लास्ट करना था।सारी व्यवस्था हो चुकी थी।हमारी बम ब्लास्ट कामयाब हुई थी।और उसमें बहुत सारे हिन्दू सैनिक और कुछ अपने मुस्लिम भाई मारे गए थे।मेरी नाम की चर्चा पाकिस्तान में फैल चुकी थी।मुझे शाबाशी दी जा रही थी।मैं बहुत ही खुश था,और खुद पर बहुत ही फक्र कर रहा था।मैने अपना मिशन खत्म कर जब अपने ठिकाने पर वापस आया,तो पाया कि रिहाना का भाई कोई आतंकवादी हमले में शहीद हो गया है।और रिहाना और उसका परिवार बिलख बिलख कर रो रहै थे।उसका भाई मेरे द्वारा ही किए गए बम ब्लास्ट में मारा गया था,ये सोच सोच कर मैं पागल सा हुआ जा रहा था।ये मैने क्या कर डाला?मुझे उनकी हालात देखी नहीं जा रही थी।उसके कुछ दिनों बाद ही रिहाना और उसके परिवार ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर लिया।मैं उनकी लाशें देख बिल्कुल ही टूट चुका था।मुझे मरे हुए लोगो के परिवार के रोने की आवाज़ सुनाई देने लगी थी।हारकर जब मुझे रहा नही गया,मैं खुद वहाँ के पुलिस थाने में पहुँच अपना जुर्म कबूल कर सरेंडर कर दिया।मुझ पर वहाँ मुकदमा चला और मेरे सरेंडर करने के चलते,मुझपर रहमत बरती गई,और मुझे फाँसी नहीं पन्द्रह साल की बामुशक्कत कैद की सजा सुनाई गई।पर मैं मुकदमा के दौरान जज से गुजारिश करता रह गया था कि मुझे मौत की सज़ा ही दी जाए।पर वो सुने नहीं।
मैने जेल में हिंदी पढ़ना सीखा।फिर ढेर सारी लिटरेचर हिंदी के पढ़ता चला गया,और मेरा झुकाव हिंदी साहित्य की ओर होता चला गया।फिर मैंने अपने कुछ कैदी भाइयो से रमायन की कुछ घटनाओं के वर्णन सुने,जिससे मेरी उसे पढ़ने की चेष्टा दिल मे और भी जाग गई।मैने रमायन पढ़ा, जिससे मुझे हिन्दू धर्म को और भी नज़दीक से जानने की इच्छा हुई।
मेरे अच्छे व्यवहार को देख प्रशासन ने मुझे पन्द्रह दिन पहले ही छोड़ने का निर्णय ले लिया।
मैं जेल से जब बाहर निकला,तो कश्मीर की स्थिति जस की तस बनी हुई थी।मैने तय कर लिया कि अब और लोगों को धर्म के नाम पर,जहर उगलने नही दूँगा।घाटी में शांति लाकर ही रहूँगा।अपने लोगो को मैं समझाऊँगा, उन्हें सही राह पर लेकर आऊँगा।और फिर क्या ?मैं बिना डरे,निर्भीक हो अपने भटके मुसलमान भाइयो के पास जाकर उन्हें सही राह बताने की कोशिश करने लगा।उन्हें सच्चाई से वाकिफ करवाने लगा,कि आजादी का असली अर्थ क्या है?आज़ादी का अर्थ है,बुरे कृत्यों से आज़ादी,सारी बुराइयों से आज़ादी, अपने अंदर बैठे शैतान से आज़ादी।हर धर्म ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रेम का पथ ही उत्तम बताया है,सो सभी मनुष्यों से बिना उसके धर्म जाने,बिना उसकी जाति जाने प्रेम करना ही उच्चतम धर्म है।मानवता का धर्म ही श्रेष्ठ है।
मेरे बात से प्रभावित हो बहुत से भटके राही मेरे तरफ सही राह पर चलने को आ गएँ।पर कुछ अभी भी वही नफरत की राह पर आगे बढ़ने को उत्सुक दिख रहे थे।
मैं उन सभी नौजवानों को (जो सही राह पर वापस आ चुके थे)लेकर सरेंडर करने के लिए नजदीकी पुलिस स्टेशन जा रहा था,कि तभी कुछ भटके नौजवानों ने पीछे से फायरिंग करना शुरू कर दिया।हम सभी ने भी जो हमारे पास हथियार थे उससे उनपर जवाबी हमला किया।लगातार दोनो ओर से फायरिंग चालू थी।मैने भी पन्द्रह साल के बाद,अपने हाथ में हथियार उठाया था।पर इस बार की बात ही कुछ और थी।इस बार मानवता के खातिर हथियार उठाए थे।अगर वो भटके राही इस दुनिया में रहेंगे तो वो केवल आतंक ही समाज में फैलाएंगे, और इससे मानव जाति पर खतरा मंडराता ही रहेगा।तो अच्छा रहेगा कि वे रहे ही नहीं।
मेरे साथ वालों ने लगभग मेरा साथ छोड़ चुके थे।मेरे सर को छूती हुई जो बुलेट गई,उसने मुझे झकझोर कर रख दिया था।इधर से गोली बारी बन्द होने के कारण सामने वालो को ऐसा प्रतीत हुआ कि हम सभी मारे जा चुके हैं।तो उन्होंने हमारे तरफ किसी एक को देखने के लिए भेजा।मेरे बगल में पड़े साथी के पास मशीन गन पड़ी हुई थी।मैं भी खुद को उन्हें मरे हुए की हालत में दिखाने को,वहीं चुप चाप लेटा हुआ था।
उनके बन्दे ने निरीक्षण करके बोला कि सभी मर चुके हैं।फिर सभी लोग हमारे तरफ आने लगे।मैने सृष्टि चलाने वाले सभी ईश्वर,अल्लाह,राम,यीशु,वाहे गुरु का नाम लिया और पड़ी हुई मशीन गन उठाकर उन सारे आतंकियों पर फायरिंग शुरू कर दी,और उन्हें वहीं मार गिराया।और ईश्वर से उन सभी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
ये कैसे हुआ मुझे पता नहीं,इतना विश्वास मुझमे कैसे था,कि उस पड़े मशीन गन में गोलियां उतनी हैं,जिससे इन दस बारह आतंकियों को मार गिराया जा सके।ये मुझे पता नहीं।ये ईश्वर की मौज ही थी,कि इन आतंकियों द्वारा कोई रिहाना या पिंकी के घर में मातम का माहौल अब नहीं रहेगा,ये सोचते सोचते मैं बेहोशी की हालत में चला गया।
मेरे खून इतने बह चुके थे कि मेरा बचना नामुमकिन सा था और मैं कोमा में चला गया।दस साल के बाद जब मुझे होश आया,मैं बिल्कुल अकेला सा एक हॉस्पिटल के रूम में सारे मशीनों के बीच में पाया।तभी नर्स ने डॉक्टर को आवाज़ दिया।डॉक्टर ने आकर मेरा चेक अप किया,और फिर मुझे मेरी हालत पूछा।फिर किसी ने पुलिस को मेरे होश में आने की खबर दे दी ।पुलिस ने आकर मुझसे उस हमले की जानकारी ली।और फिर बताया कि मेरे चलते घाटी के बहुत से भटके बच्चे सही राह पर आ गए हैं।उनमें से एक वो डॉक्टर भी है,जो आपका आज चेक अप किया था।
मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था,इतनी खुशी तो शायद स्वर्ग या जन्नत पा लेने पर भी नसीब नहीं होती,जितनी उस वक़्त थी।

आमीन।।





ye kahaani kaalpanik hai।eskaa sambandh kisi bhi jivit yaa mriat aadmi se nahin hai।



bahut tej baarish ho rahi thi।din kaa samay thaa,par ghanghor baadal chhaane ke kaaran,shaam kaa maahaul lag rahaa thaa।phaayaring  lagaataar jaari thi।mere paas bhi goliyaan khatm ho rahi thi।saath vaale yaa to maare jaa chuke the,yaa ghaayal avasthaa men behosh ho gire hua the।mai pichhe hatne ke pryaas men ek kadam pichhe kyaa hataayaa thaa ki ek bullet mere sar ko chhute hua nikal gayi।mere munh se "o maan" shabd anaayaas hi  nikal pde।mere chehre par se hote hua khun niche tapak rahaa thaa।saari ghatnaaan meri bachapan se abhi tak ki ek pal men mujhe dikh gaye the।maano ishvar sajaa mukarrar karne se pahle mere dvaaraa kia gaye achchhe aur bure kriat kaa driashy mujhe dikhaanaa chaahtaa ho।aaea un driashyon ke jhalak ko aapko bhi dikhaaan।

ye baat kuchh battis saal pahle ki hai,jab main chhah saal kaa thaa।meraa janm pi.o.ke. yaani paakistaan adhikriat kashmir men huaa thaa।main janm se hindu thaa।meri maan muslim thi aur mere pitaa hindu।par baad men mere pitaa ko jabaran eslaam kabulaayaa gayaa thaa।mere pitaa aur meri maan bhale musalmaan the,par dil se sabhi dharmon kaa sammaan karte the aur yahi sanskaar bachapan se mujhe dene ki koshish karte the।

main pdhaai karne madarsaa jaayaa kartaa thaa।vahaan hamen ye sikh di jaati thi ki ham bde hi bhaagyshaali hain,jo es paak dharti par hamne janm liyaa hai।hamaare bhaai bandhu jo pahaadi ke us paar rahte hain,unapar roj julm dhaaa jaa rahe hain,vahaan ki hukmraanon ke dvaaraa।hamen unhen aajaad karaanaa hai,har haalat men,har kimat par।pdhaai hoti thi,par naam bhar ki।hamen hamaare shahid bhaaiyon ki kahaaniyaan sunaai jaati thi,ki kaise unhonne hindustaaniyon ke ghar men ghus kar unke naak men dam kar rakhe the,aur hukmraanon ki nind haraam kar rakhi thi।

gair muslimon se napharat karnaa, unhen hameshaa apne jute ke nok par rakhnaa।kyonki vahi log hamaare musalmaan bhaaeyon ke dushman hain,unhonne un par bahut julm dhaaa hain।agar ham unhen jahannum pahunchaa denge,to allaah hame jannat bakhshegaa।aur ham pure josh men apne kadam ko andhkaar ki or bdhaate chale gaye।kashmir ko har haalaat men hindustaaniyon se aajaad karaanaa hi hamaaraa makasad bataayaa jaataa thaa।aur esilia hamen allaah ne es dharti par bhejaa hai,hamen ye jindgi bakhshi hai।

matalab etne jahar,etne jahar ki agar koi gair majahbi saamne se shaanti purvak kahin jaa rahaa ho,to use bhi maut ke ghaat utaarne ko apnaa dharm samajh baithe the,ham sabhi ne।

phir hamaari trening jamakar hui।hamen saare raaephals,bandhuke, goli baarud ki shikshaa di gayi।aur ye sab kitne saal men,keval das saal men।hamen hamaare dimaag ki entelijens ke hisaab se kaam saumpe jaate the।jiskaa dimaag jyaadaa chaltaa hai,unhen haaiyar stdij ke lia bhejaa  gayaa,taaki ham jamaane ke saath kadam se kadam milaakar chal sake।aur jo hamaare jaise the,jinkaa dimaag narmal chaltaa thaa,unhen aur bhi kdi trening ke lia ek gupt jagah bhejaa gayaa।par jinkaa dimaag bilkul hi nahin chaltaa thaa aur jinki jhuth aasaani se pakdi jaati thi,unhen hyuman bam banaakar hindustaan ke sarajmin par bhej diyaa jaataa thaa।jahaan unkaa bren vaash kar bam blaast karvaaa jaate the।

meri trening ke dauraan mere pitaa aur maataa ke entkaal ki khabar aai।main bilkul tut saa gayaa।par phir se maulaviyon ne etni jahar gholi ki main trening men puri shiddat se lag gayaa।aur solah saal ki umr men hindustaani bardar kras kar kashmir men panaah le li thi।kashmir men apne bhaaeyon par julm hote dekh meraa khun khol uthtaa thaa।kisi din jab bhi khabar aati thi ki aaj ek aur kashmiri bhaai hamaaraa shahid huaa hai,meraa man kartaa thaa ki baarudon se saare hindustaani sainikon ko udaa daalun।par mere haath bandhe hua the।haae kamaan se jab tak koi eshaaraa nahin mile,tab tak mujhe yahin chhip kar rahnaa hai।

tabhi meri dosti vahin pdos men rahne vaali rihaanaa se hui।rihaanaa kaa bhaai senaa men achchhe post par thaa।rihaanaa aksar apne bhaai ki bahaaduri ke khisse sunaayaa karti thi।mujhe uske bhaai ke bahaaduri ki baaton se jyaadaa majaa,kisi bahaane usse baat karne men lagti thi।mujhe vah achchhi lagne lagi thi।


haai kamaan kaa aadesh aa chukaa thaa,mujhe kashmir men bam blaast karnaa thaa।saari vyavasthaa ho chuki thi।hamaari bam blaast kaamyaab hui thi।aur usmen bahut saare hindu sainik aur kuchh apne muslim bhaai maare gaye the।meri naam ki charchaa paakistaan men phail chuki thi।mujhe shaabaashi di jaa rahi thi।main bahut hi khush thaa,aur khud par bahut hi phakr kar rahaa thaa।maine apnaa mishan khatm kar jab apne thikaane par vaapas aayaa,to paayaa ki rihaanaa kaa bhaai koi aatankvaadi hamle men shahid ho gayaa hai।aur rihaanaa aur uskaa parivaar bilakh bilakh kar ro rahai the।uskaa bhaai mere dvaaraa hi kia gaye bam blaast men maaraa gayaa thaa,ye soch soch kar main paagal saa huaa jaa rahaa thaa।ye maine kyaa kar daalaa?mujhe unki haalaat dekhi nahin jaa rahi thi।uske kuchh dinon baad hi rihaanaa aur uske parivaar ne phaansi lagaakar aatmahatyaa kar liyaa।main unki laashen dekh bilkul hi tut chukaa thaa।mujhe mare hua logo ke parivaar ke rone ki aavaaj sunaai dene lagi thi।haarakar jab mujhe rahaa nahi gayaa,main khud vahaan ke pulis thaane men pahunch apnaa jurm kabul kar sarendar kar diyaa।mujh par vahaan mukadmaa chalaa aur mere sarendar karne ke chalte,mujhapar rahamat barti gayi,aur mujhe phaansi nahin pandrah saal ki baamushakkat kaid ki sajaa sunaai gayi।par main mukadmaa ke dauraan jaj se gujaarish kartaa rah gayaa thaa ki mujhe maut ki sjaa hi di jaaa।par vo sune nahin।

maine jel men hindi pdhnaa sikhaa।phir dher saari litrechar hindi ke pdhtaa chalaa gayaa,aur meraa jhukaav hindi saahity ki or hotaa chalaa gayaa।phir mainne apne kuchh kaidi bhaaeyo se ramaayan ki kuchh ghatnaaon ke varnan sune,jisse meri use pdhne ki cheshtaa dil me aur bhi jaag gayi।maine ramaayan pdhaa, jisse mujhe hindu dharm ko aur bhi njdik se jaanne ki echchhaa hui।

mere achchhe vyavhaar ko dekh prshaasan ne mujhe pandrah din pahle hi chhodne kaa nirnay le liyaa।

main jel se jab baahar niklaa,to kashmir ki sthiti jas ki tas bani hui thi।maine tay kar liyaa ki ab aur logon ko dharm ke naam par,jahar ugalne nahi dungaa।ghaati men shaanti laakar hi rahungaa।apne logo ko main samjhaaungaa, unhen sahi raah par lekar aaungaa।aur phir kyaa ?main binaa dare,nirbhik ho apne bhatke musalmaan bhaaeyo ke paas jaakar unhen sahi raah bataane ki koshish karne lagaa।unhen sachchaai se vaakiph karvaane lagaa,ki aajaadi kaa asli arth kyaa hai?aajaadi kaa arth hai,bure kriatyon se aajaadi,saari buraaeyon se aajaadi, apne andar baithe shaitaan se aajaadi।har dharm ne ishvar ki praapti ke lia prem kaa path hi uttam bataayaa hai,so sabhi manushyon se binaa uske dharm jaane,binaa uski jaati jaane prem karnaa hi uchchatam dharm hai।maanavtaa kaa dharm hi shreshth hai।

mere baat se prbhaavit ho bahut se bhatke raahi mere taraph sahi raah par chalne ko aa gan।par kuchh abhi bhi vahi napharat ki raah par aage bdhne ko utsuk dikh rahe the।

main un sabhi naujvaanon ko (jo sahi raah par vaapas aa chuke the)lekar sarendar karne ke lia najdiki pulis steshan jaa rahaa thaa,ki tabhi kuchh bhatke naujvaanon ne pichhe se phaayaring karnaa shuru kar diyaa।ham sabhi ne bhi jo hamaare paas hathiyaar the usse unapar javaabi hamlaa kiyaa।lagaataar dono or se phaayaring chaalu thi।maine bhi pandrah saal ke baad,apne haath men hathiyaar uthaayaa thaa।par es baar ki baat hi kuchh aur thi।es baar maanavtaa ke khaatir hathiyaar uthaaa the।agar vo bhatke raahi es duniyaa men rahenge to vo keval aatank hi samaaj men phailaaange, aur esse maanav jaati par khatraa mandraataa hi rahegaa।to achchhaa rahegaa ki ve rahe hi nahin।

mere saath vaalon ne lagabhag meraa saath chhod chuke the।mere sar ko chhuti hui jo bulet gayi,usne mujhe jhakjhor kar rakh diyaa thaa।edhar se goli baari band hone ke kaaran saamne vaalo ko aisaa prtit huaa ki ham sabhi maare jaa chuke hain।to unhonne hamaare taraph kisi ek ko dekhne ke lia bhejaa।mere bagal men pde saathi ke paas mashin gan pdi hui thi।main bhi khud ko unhen mare hua ki haalat men dikhaane ko,vahin chup chaap letaa huaa thaa।

unke bande ne nirikshan karke bolaa ki sabhi mar chuke hain।phir sabhi log hamaare taraph aane lage।maine sriashti chalaane vaale sabhi ishvar,allaah,raam,yishu,vaahe guru kaa naam liyaa aur pdi hui mashin gan uthaakar un saare aatankiyon par phaayaring shuru kar di,aur unhen vahin maar giraayaa।aur ishvar se un sabhi ki aatmaa ki shaanti ke lia praarthnaa ki।

ye kaise huaa mujhe pataa nahin,etnaa vishvaas mujhme kaise thaa,ki us pde mashin gan men goliyaan utni hain,jisse en das baarah aatankiyon ko maar giraayaa jaa sake।ye mujhe pataa nahin।ye ishvar ki mauj hi thi,ki en aatankiyon dvaaraa koi rihaanaa yaa pinki ke ghar men maatam kaa maahaul ab nahin rahegaa,ye sochte sochte main behoshi ki haalat men chalaa gayaa।

mere khun etne bah chuke the ki meraa bachnaa naamumakin saa thaa aur main komaa men chalaa gayaa।das saal ke baad jab mujhe hosh aayaa,main bilkul akelaa saa ek haspital ke rum men saare mashinon ke bich men paayaa।tabhi nars ne daktar ko aavaaj diyaa।daktar ne aakar meraa chek ap kiyaa,aur phir mujhe meri haalat puchhaa।phir kisi ne pulis ko mere hosh men aane ki khabar de di ।pulis ne aakar mujhse us hamle ki jaankaari li।aur phir bataayaa ki mere chalte ghaati ke bahut se bhatke bachche sahi raah par aa gaye hain।unmen se ek vo daktar bhi hai,jo aapkaa aaj chek ap kiyaa thaa।

meri khushi kaa thikaanaa nahin thaa,etni khushi to shaayad svarg yaa jannat paa lene par bhi nasib nahin hoti,jitni us vkt thi।


aamin।।



Written by sushil kumar

4 Jul 2019

Mera time aa gaya

मेरा टाइम आ गया।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।

मेरी कहानी काल्पनिक है,इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नही है।

अध्याय:-1

मेरी हालात नाजुक थे,मैं मर रहा था।मैने चूहा मारने वाला दवा जो खा लिया था।ऐसी मजबूरी आई क्यों?आइए हम पाँच वर्ष पूर्व चलते हैं।


अध्याय:-2

मैं यानी सुशील कुमार,बहुत ही सभ्य,सुशील और शांत स्वभाव का लड़का था।दो वर्ष पूर्व मुझे बैंक में नौकरी लग गई थी।मेरी उम्र आज पच्चीस की हो गई थी।शादी के लिए रिश्ते घर पर आने लगे थे।कोई लड़की के माता पिता मेरे माता पिता से मिल मेरी सारी जानकारी लेकर मुझसे मिलने,मेरे पोस्टिंग की जगह यानी सतना आने वाले थे।सतना मध्यप्रदेश का एक छोटा सा शहर है,जो कि मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बॉर्डर पर स्थित है।मैं वहाँ पर एक छोटे से कमरे में गुजारा करता था।
अब सम्भावित पत्नी के पिता और माता,यानी सम्भावित ससुर और सम्भावित सासु माँ आ रहे हैं,तो उनका विशेष ध्यान तो रखना ही पड़ेगा।चलो उनका नहीं तो अपने माँ बाप के इज्जत का ख्याल तो रखना ही पड़ेगा।कहीं ऐसा ना हो कि ये वापस जाकर माँ बाबू जी से शिकायत कर दें,कि बच्चे में आपके बिल्कुल संस्कार नाम की चीज़ ही नहीं है।हमे भगवान भरोसे छोड़ वह चला गया था,या नहीं आया था।
चलिए उनका आने का दिन आया।मेरे पास एक अननोन नंबर से फोन आया।उस समय दोपहर के तीन बजे रहे थे।

मैं: हेलो
सामने से:- हाँ बेटा,हम सतना दो घण्टे में पहुँचने वाले हैं।
मैं:-जी,कौन सी ट्रैन से आ रहे हैं,आपलोग?
सामने से:-मुम्बई एक्सप्रेस है।गाड़ी नम्बर रुकिए देखकर बताता हूँ।
लगभग एक मिनट होने वाला था,तभी फोन से एक आवाज़ और भी सुनाई देती है, किसी स्त्री का,अरे जल्दी कीजिए,दामाद जी को कितना वैट करवाईएगा।
सामने:-बेटा जी गाड़ी का नम्बर है,12142।
मैं:- जी ये तो सुबह ही पहुँच जाती है,सतना।
सामने:-दरअसल पटना से ही काफी लेट खुली थी।
मैं :-(मन ही मन,अच्छा हुआ,वरना आज आफिस से छुट्टी लेनी पड़ जाती)जी अच्छा।
सामने से:-बेटा जी एक कष्ट कीजिएगा,अपना अपॉइंटमेंट लेटर और सैलरी स्लिप अपने साथ ले आइएगा।
मैं:- जी,बिल्कुल।
सामने से:-चलिए आकर मिलते हैं।
मैं:-जी,आइए ना।फोन रखते हैं,प्रणाम।
सामने से:-जी प्रणाम,प्रणाम।
मानो सासु माँ के भी तरफ से इन्होंने प्रणाम किया हो।कहीं दामाद जो को बुरा ना लग जाए।

मैंने फ़ोन पर ट्रैन की स्टेटस चेक किया,पता चला कि ट्रैन दो घण्टे में पहुँचने वाली है।मेरी पोस्टिंग उस वक़्त सतना से लगभग 20की.मि. की दूरी पर स्थित छोटे से शहर नागोद में थी।हर रोज सतना से अप डाउन करता था,बस से।नागोद से सतना आने में मुश्किल से 20 मिनट समय लगते थे।मैने अपने दिमाग में उस तरीके से कैलकुलेशन कर,सतना पहुँचने का प्लानिंग कर लिया,कि एक तो उनसे आधे घण्टे पहले पहुँच कर वही स्टेशन के पास में स्थित किसी होटल में उनके ठहरने का व्यवस्था कर देंगे।
उसी हिसाब से मैं चार से सवा चार बजे तक निकलने का फैसला लिया।सतना स्टेशन पहुँचने के बाद होटल साई पैलेस में एक ए.सी. कमरे की बुकिंग मैने एक दिन के लिए अपने नाम से करवा ली।क्योंकि उस होटल का हमारे यहाँ एकाउंट था,उन्होंने मुझे 50% डिस्काउंट पर,एक हज़ार रुपये में एक कमरा दे दिया।साथ में कंप्लीमेंट्री ब्रेकफास्ट भी था।मैंने चाभी लेकर अपने कमरे की मुआयना भी करली।कमरे और बाथरूम बिल्कुल साफ थे।कमरे की ए.सी. भी चल रही थी,बाथरूम का फ्लश वगैरह सभी सही सलामत चल रहे थे।उनके ट्रैन की स्टेटस मैने फोन पर चेक किया,तो पता चला पाँच मिनट में ट्रेन पहुँचने वाली है।मैं फटाफट स्टेशन पहुँच गया,उन्हें रिसीव करने के लिए।उसी ट्रैन की अनाउंसमेंट लगातार जारी थी।
तभी मेरी फोन की घण्टी बजी।उसमें प्रोबेबळ ससुर जी के नाम से कॉल आ रहा था,मैने ऐसा नाम किस लिए रखा था,ये बताने की आपको जरूरत नहीं है।इतने तो समझदार आपलोग होंगे।
मैंने फोन उठाया।

मैं:- जी प्रणाम।
सामने से:-प्रणाम प्रणाम।
मैं:- जी हम स्टेशन आ चुके हैं।
सामने से:-जी ठीक है।आप टिकट काउंटर के पास ही मिलिए।एक नंबर से ही बाहर निकलना है ना।
मैं:-जी जी बिल्कुल।
सामने से:-ठीक है,अब ट्रैन स्टेशन पहुँच गई है,हम आ रहे हैं।प्रणाम।
मैं:-जी प्रणाम।

मैं टिकट काउंटर पर जाकर खड़ा हो गया,और उनका इंतज़ार करने लगा।मेरा जी बहुत घबरा रहा था।आखिर घबराएगा भी क्यों नहीं?बिल्कुल सीधा साधा जो था।
तभी फिरसे प्रोबेबळ ससुर जी के नाम से कॉल आया।मैंने फोन उठाया,और इधर उधर नज़र दौड़ाया।एक पचास से पचपन साल के वृद्ध को फोन को कान पर लगाकर बात करते देख,उनके पास पहुँच गया।
मैं:- हेलो(फोन पर)
सामने वाले वृद्ध के पैर छूने लगा।
मैं:-जी प्रणाम।
वृद्ध:-खुश रहो!खुश रहो!
फोन से:-बेटा हम इधर हैं।तुम्हारे पीछे।
मैं पीछे मुड़ा।
मैं:-अरे आप इधर हैं।
प्रोबेबळ ससुर जी:-लगता है आपको कंफ्यूजन हो गया।
मैंने दोनो के पैर छुए।दोनो ने खुश रहिए ही कहा।
मैं:-चलिए पास में ही होटल है।
प्रोबेबळ ससुर जी:-चलिए।
रास्ते में उन्हें साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहा था,लेकिन वो बार बार मुझे आगे चलने को कह रहे थे।मानो मेरी हाइट को वो अपनी आँखों से नापने की कोशिश में थे,या देखना चाहते थे कि पैर से दामाद जी ठीक हैं की नहीं,कहीं लंगड़ाते तो नहीं हैं?
हम होटल पहुँचे।
प्रोबेबळ ससुर जी:- अरे दामाद जी होटल की बुकिंग करके रखी थी आपने?
मैं:- जी जी।
प्रोबेबळ ससुर जी:-बहुत बहुत आपका धन्यवाद।
मैं:-जी धन्यवाद बोलकर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए।आप लोग फ्रेश हो जाइए।आपके लिए कुछ खाने को मँगवा देता हूँ।
प्रोबेबळ ससुर जी:-ठीक है।
मैं होटल के रिसेप्शन पर गया,और शाम का मेनू पूछा।फिर बड़ा सोच कर 1 प्लेट वेज पकोड़ा,तीन समोसा,तीन गुलाब जामुन और तीन टोमेटो सूप का आर्डर किया।फिर रोका और आर्डर में चेंज किया,क्योंकि मुझे लगा ये तो खाना ही हो जाएगा।वेज पकोड़ा उसमे से कटवा दिया।और बोला रूम नम्बर 203 में पहुँचा दीजिए।ये आर्डर का पेमेंट अपने पर्स से निकाल कर मैने कर दी।
कुछ देर बाद।
प्रोबेबळ ससुर जी का फोन आया।
मैं:-जी बोलिए।
प्रोबेबळ ससुर जी:-कहाँ हैं,हम फ्रेश हो लिए हैं।आइए नाश्ता आया है।साथ में नाश्ता करते हैं।
मैं:-जी आया।(मुझे ऐसा आभास हुआ कि इन्होंने भी कुछ आर्डर कर दिया है)
कमरे में जब पहुँचा तो पाया कि मेरा ही आर्डर किया हुआ नाश्ता, वहाँ स्टूल पर रखा हुआ है।
मैं:-आप काफी थक गए होंगे।
प्रोबेबळ ससुर जी:-नहीं बेटा जी,आराम से सोते सोते आए हैं।मैं:-जी
प्रोबेबळ ससुर जी:-लीजिए नाश्ता कीजिए,ठंडा हो जाएगा।
(फिर हम सभी ने नाश्ता किया,प्रोबेबळ ससुर जी ने बिच बिच में लम्बा लम्बा धकार भी लिया।
मैं:-जी आप मिनरल वाटर पिएँगे या नार्मल वाटर।
प्रोबेबळ ससुर जी:-मिनरल वाटर हो तो ज्यादा अच्छा होगा बेटा जी।
मैंने रिसेप्शन को फोन कर तीन बिसलेरी बोतल का आर्डर कर दिया।
प्रोबेबळ ससुर जी:-आइए बैठिए बेटा जी।
मैं वहीं रखे पास कुर्सी पर बैठ गया।
प्रोबेबळ ससुर जी:-अच्छा बेटा जी सैलरी स्लिप और अपॉइंटमेंट लेटर लेकर आए हैं।
मैं:-जी
(अपना जेब टटोलते हुए)
मैं:-ये लीजिए।
पहले तो उन्होंने खुद चेक किया,फिर अपनी बीबी को भी दिया।
प्रोबेबळ ससुर जी:-अच्छा बेटा जी अभी आप मैनेजर हैं।
मैं:-जी नहीं।अभी मैं अफसर हूँ।एक साल के बाद मैं मैनेजर के पोस्ट के लिए एलीजिबल हो जाऊँगा।
प्रोबेबळ ससुर जी:-हुम्म।कितना सैलरी आपका हो जाएगा इसके बाद।
मैं:-पचपन हज़ार के आस पास तो हो ही जाएगा।
प्रोबेबळ ससुर जी:-गुड।
मैं:- जी।
प्रोबेबळ ससुर जी:-आपका क्या हॉबी है?
मैं:-मुझे क्रिकेट खेलना बहुत पसंद है।
प्रोबेबळ ससुर जी:-जी बहुत अच्छा।मेरा भी बेटा बेटी क्रिकेट खेलना बहुत पसंद करता है।
मैं:- जी।
प्रोबेबळ ससुर जी:-चलिए अच्छी जोड़ी बनेगी आपलोगों की।
ये लीजिए फोटो,मेरी बिटिया सविता की।
मैं फोटो लेते हुए।
प्रोबेबळ ससुर जी:-कैसी लगी।
मैं:-जी अच्छी है।
प्रोबेबळ ससुर जी:-अभी सविता पी.एन.बी. में प्राइवेट जॉब कर रही है।अभी उसकी पोस्टिंग बंगलोर में है।मैं उसे बोलता हूँ कि एक सप्ताह के लिए यहाँ आ जाएगी।आप लोग एक दूसरे को अच्छे से समझ बुझ लीजिएगा।है कि नहीं।
मैं:-जी।(जरा हिचकते हुए)
प्रोबेबळ ससुर जी:-तो ठीक है,कल हमारी ट्रेन है,सुबह सुबह 6 बजे की।हम आपके मम्मी पापा से मिलने परसों पहुँचेंगे।उन्हें बता दीजिएगा कि आपको सविता पसन्द है।ठीक है।
मैं:-जी जी।बिल्कुल।
(मन में सोचते हुए,मुझे तो लड़की कुछ खास लगी नहीं,पर उसके मम्मी पापा भी कुछ ज्यादा ही फॉरवर्ड लग रहे हैं।पता नही आज के समय कौन सा माँ बाप अपनी बच्ची को किसी गैर के पास एक दूसरे को समझने बुझने के लिए भेजता है?शायद इन्हें मेरी संस्कार देख ,मुझपर अत्यधिक भरोसा हो गया होगा?वगैरह वगैरह मेरे मन में ख्याल आया रहे थे।
मैं:- चलिए डिनर का समय हो गया।क्या खाइएगा?
प्रोबेबळ ससुर जी:-पनीर मखनी,दाल और तावा रोटी सही रहेगा।
मैं:-जी जी।
मैने रिसेप्शन पर फ़ोन कर के खाना मँगवा लिया।
और टीवी ओन कर दी।पाँच मिनट में डोर बेल बजा।
प्रोबेबळ ससुर जी:- देखिए बेटा जी लगता है,खाना आया।
मैं:-जी जी।देखता हूँ।
प्रोबेबळ ससुर जी:-चलिए आइए खाना खा लेते हैं।
हमने साथ मे खाना खाया।फिर मैं उन्हें गुड नाईट बोलकर रूम से बाहर निकल गया।
मैं अपने रूम में जब पहुँचा, माँ को फोन लगाया और सारी घटनाओं को विस्तार से बताया।माँ बोली कि देख बेटा, लोग तो तुम्हें देखने आते रहेंगे,अगर तुम सब का खर्चा उठाओगे,फिर तुम अपना महीना कैसे चलाओगे?तुम्हे रूम बुक करना चाहिए था केवल, पैसे नहीं देने चाहिए थे।खाने का खर्चा भी तुमने ही उठाया।और वो लोग कैसे लोग थे,कहीं का भी खर्चा नहीं उठाया।बिल्कुल ही कंजूस लोग थे क्या?।फिर मैने जब उन्हें ये बताया कि वे सविता को मेरे पास सात दिनों के लिए भेजना चाह रहे थे,ताकि हम दोनों एक दूसरे को अच्छे से समझ सके।फिर तो माँ बहुत ज्यादा ही क्रोधित हो गई।फिर उन्होंने पूछा कि मुझे लड़की कैसी लगी?मैंने बताया,कुछ खास नहीं ।और उससे शादी करने को मैने मना कर दिया।
इस घटना से मुझे एक सबक तो मिला था कि कोई भी आए मुझे देखने के लिए,अब मैं एक पैसा भी खर्च नहीं करूँगा।इस बार मेरे पॉकेट से एक दिन में छह हजार का फ़टका लग चुका था।मैं बहुत ही अपसेट था।

अध्याय:-3

उसके बाद जब भी कोई देखने को आता,मैं उन्हें रिसीव करने नहीं जाता।साथ में ये भी बता देता कि काम का बोझ बहुत ही ज्यादा है,स्टाफ की बहुत ही शॉर्टेज है,तो मैं आपको रिसीव करने नहीं आ पाऊँगा।कोई भी जिद्द नहीं कर पाता था।अगर कोई पूछता कि स्टेशन के आसपास के कोई अच्छे होटल का एड्रेस दे दीजिए,तो उन्हें साई पैलेस होटल का नाम बता देता था।फिर क्या?शाम को आराम से किसी रेस्टोरेंट में हम मिलते थे,बात चीत होती थी।मैं अपने अपॉइंटमेंट लेटर और सैलरी स्लिप हमेशा साथ लेकर जाता था।और अगले दिन कोई कोई हमारे बैंक में आते थे,कुछ देर ब्राँच मैनेजर और स्टाफ से बात चीत कर वहाँ से भी निकल जाते थे।मुझे कोई लड़की पसन्द नहीं आ रही थी।

अध्याय:-4

मेरे माँ पिता मैं और मेरी बहन सत्संग से जुड़े हुए हैं।सत्संग यानी राधास्वामी व दाता दयाल के मत के सत्संग से।मुझे भी अपने मालिक पर बहुत ही ज्यादा श्रद्धा और भरोसा है।अब मेरे कहानी पर आते हैं।मेरे मालिक की बहू,जिन्हें हम दीदी कहते थे,उन्होंने अपनी बहन की बिटिया कविता से मेरी शादी की बात मेरे पापा मम्मी से की।हमारे माँ पापा के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात नहीं हो सकती थी कि उनके साथ हमारा सम्बंध बने।दोनो परिवारों में बात चली।बात आगे बढ़ने पर कविता के माँ पापा और उसके चाचा मुझे देखने सतना आने का प्लान बनाने लगे।मुझे जब पता चला कि मेरा रिश्ता दीदी(मालिक जी की बहू) के बहन के घर में हो रहा है,तो मैं दिल ही दिल बहुत खुश हुआ था।
इस बार मैं पूरा सोच कर रखा था कि सारा खर्चा मैं ही उठाऊँगा।उनका आने का दिन फिक्स हुआ।पर मुझे एक बार भी किसी का फोन नही आया।ये पहली बार हुआ कि मैं कस्टमर से घिरा हुआ था,और पीछे कुछ अनजान लोग खड़े हो मेरे कार्य को देख रहे थे।पर मैं भीड़ में इतना वयस्त था कि उन्हें नोटिस कर ही नहीं पाया।फिर जब मैं भीड़ से खाली हुआ तो उनमें से एक व्यक्ति आकर अपना परिचय हमें देते हैं,कहते हैं कि वे कविता के चाचा हैं,वो जो दोनो उधर खड़े हैं,वे उसके माता पिता हैं।मैं अपने चेयर से उठ खड़ा हुआ और सभी के पैर छुए।फिर कविता के पापा ने मुझे होटल कमल में शाम को आने को कहा।और फिर वो हमसे विदा लेकर अपने होटल की ओर प्रस्थान किए।
मैं शाम में बैंक से सीधे होटल कमल में पहुँचा।और उन्हें फोन कर उनसे उनका कमरे का नम्बर पूछा।जब कमरे में गया तो उन्होंने हमें बैठने को कहा।फिर सवालों की बारिश शुरू हो गई।मैने भी उनके सारे सवालों का जवाब दिया।
पापा:-आपकी हॉबी क्या है?
मैं:-क्रिकेट खेलना,कविता लिखना।
चाचा :-क्रिकेट में कौन सा खिलाड़ी आपको पसंद है।
मैं:-महेंद्र सिंह धोनी
पापा:-आपने होटल मैनेजमेंट भी किया हुआ है।
मैं:- जी।
पापा:-फिर तो आपको खाना बनाना आता ही होगा।
मैं:-जी।
चाचा :-क्या क्या बना लेते हैं?
मैं:-जी लगभग सब कुछ।
(मन ही मन,अच्छा है ये केवल इंटरव्यू है,अगर प्रैक्टिकल होता,तो फँस ही गया था।)
पापा:-आपको कैसी लड़की पसन्द है?
मैं:-सुंदर हो,सुशील हो,समझदार हो।
पापा:-अगर सांवली हो तो चलेगा।
मैं:-जी ।सनकुचाते हुए।
पापा:-बिल्कुल मेरे जैसी है।
(मन ही मन,पर आप तो घने सांवले हैं,बाप रे)
मैं:-जी,चलेगी।(हिम्मत बाँध कर बोला)
फिर हम रेस्टॉरेंट में गएँ डिनर करने के लिए।
पापा:-बताइए सुशील जी क्या खाएँगे(मेनू कार्ड मेरे तरफ बढ़ाते हुए)।
मैं:-जी आपलोग जी आर्डर कीजए ना।
पापा:-अरे आप होटल मैनेजमेंट किए हैं,हमसे ज्यादा ज्ञान खाने का आपको ही होगा।चलिए फटाफट टेस्टी टेस्टी खाने का आर्डर कीजिए।
मैंने भी मेनू कार्ड पढ़कर,सभी लोगो के लिए आर्डर कर दिया।

उन्हें मैं शायद पसन्द आया था,मुझे भी वे पसन्द आएँ थे।पर एक बात दिल में खटकती रह गई,ऐसा क्यों बोला उन्होंने की कविता बिल्कुल उनकी ही जैसी है।बाप रे।

अध्याय:-5

बहुत बार कोशिशें हुईं,पर नाकाम रहीं हमें(मुझे और कविता को) मिलाने के लिए।मेरे माँ पिता और बहन कविता को देखने और मिलने पटना के एक रेस्टॉरेंट में गएँ।मुझे उन्होंने कविता के बारे में जो बताया वो कल्पनीय था ,बहुत ही सुंदर और सुशील लड़की है,तुम दोनों की जोड़ी बहुत ही अच्छी लगेगी।मैं उसके कल्पनाओं में डूब गया।
जब मैं घर गया,तो मुझे उसकी फोटो मुझे दिखाई गई।जिसे देख मेरे आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।कैसा चेहरा दिख रहा है, फोटो में इनका,न कोई चमक है,ना कोई सुंदरता है,बिल्कुल उदास उदास दिखती है।पर माँ ने बताया कि फोटो पर मत जाओ,असल में बहुत ही सुंदर है कविता।मेरी बहन और पापा जी ने भी माँ के बातों में हामी भर दी।मुझे भी अपने परिवार के बातों पर विश्वास हो गया था।


अध्याय:-6

मेरी इंगजमेंट कविता के साथ हुई।बहुत ही भव्य आयोजन किया गया था।मैं स्टेज पर बैठ पूजा कर रहा था।पंडित जी मन्त्र का उच्चारण किए जा रहे थे।मेरा दिल यहाँ धड़का जा रहा था,कि लड़की मुझे पसंद आएगी या नहीं।मेरी पूजा समाप्त हुई,मैं अपने आसन पर जाकर बैठ गया।कविता को उसकी चाची स्टेज पर लेकर आई।कविता को एक झलक जो देखा,मेरी तो आँख ही चोन्धरा गई।गजब की सुंदरता की मूर्ति वो दिख रही थी।बड़े बड़े आँखें, सुंदर नाक नक्स क्या बात है।मैं अपने मालिक जी को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था।और साथ मे माँ, पिता और बहन को भी।फिर रस्म शुरू हुई,हमने एक दूजे को अंगूठी पहनाई।जो उसने मेरा हाथ को छुआ तो मुझे ऐसा आभास हुआ कि कितना पुराना रिश्ता है हमारा।बहुत ही अदम्य अहसास था वो।उस पल को मैं जब भी याद करता हूँ तो सिहर जाता हूँ।
फिर साथ में हमने खाना खाया।और अपना विजिटिंग कार्ड उसे दे दिया।पर जब उससे उसका नम्बर माँगा, तो उसने देने से मना कर दिया।

अध्याय:-7

वो दिन याद है,जब मुझे विदा करने को कविता अपने भाई बहनों के संग पटना स्टेशन पर आई थी।दरअसल मैं देवघर,अपने घर से सतना जा रहा था।मेरी सतना वाली ट्रैन पटना से खुलती थी।मैं जब पटना स्टेशन पर अपनी सतना वाली ट्रेन के लिए वैट कर रहा था,जिसके आने का समय अभी भी दो घण्टे पश्चात का था,मेरे फोन की घण्टी बजी।कविता का फोन था।
कविता:-स्टेशन के बाहर आइए,हमलोग आपसे मिलने के लिए आए हुए हैं।
मैं:-क्या?सही में।
मैं जब बाहर निकला तो पूरी फौज को पाया ।सारे भाई बहन के साथ मे आई थी वो।उस दिन भी कविता बहुत ही सुंदर दिख रही थी।मैं उससे बहुत ही ज्यादा प्यार करने लगा था।
वो मेरे लिए रास्ते का भोजन बनाकर लाई थी।फिर हमें गाड़ी में अकेले छोड़ सभी बाहर निकल गएँ।हम दोनों ने बहुत सारी बातें की।समय कब निकलता चला गया,पता ही नही चला।फिर मैं सभी से विदा ले आगे की सफर पर निकल पड़ा।

अध्याय:-8

इंगेजमेंट और शादी के बिच में तीन महीने का गैप था।हम घण्टों फोन पर बिता दिया करते थे,फिर भी मन था कि भरता ही नहीं था।एक दूसरे को समझने का ,एक दूसरे के परिवार को बुझने का ये सुनहरा मौका था।वो एक आध्यात्मिक लड़की थी।बाबा(भोले बाबा) और माँ(पार्वती माँ) पर असीम श्रद्धा रखने वाली।मैं भी आध्यात्मिक था,पर मेरा झुकाव राधास्वामी और दाता दयाल के मत के सत्संग  की ओर था।अक्सर हम दोनों के बिच में आधात्मिक चर्चाएं होती ही रहती थी।

अध्याय:-9

हमारी शादी काफी धूम धाम से हुई।विदाई का समय आया।सभी लोगों के आँखों से अश्रु की धारा बहने को व्याकुल सी दिख रही थी।उनकी हालत देख,मेरा दिल भी बेचैन सा हो रहा था।रह रह कर मेरे आँखों में अश्रु छलके जा रहे थे।और वीडियो रिकॉर्डिंग वालों को इससे अच्छा सीन कहाँ मिल सकता था।दुल्हन की विदाई में दूल्हे की आँखों में आंसू।वाह-वाह।कविता एक पल के लिए भी नहीं रोई।
फिर जब विदाई हमारी हो गई।हम लगभग एक कि.मि. भी नही पहुँचे होंगे,तो वो रोना शुरू कर दी।बहुत चुप करवाते करवाते शांत हुई,और फिर सो गई।मैं और कविता पन्द्रह दिनों की छुट्टी बैंक से लेकर आए थे।मैने उसे पूरा देवघर घुमाया।उसे बहुत अच्छा लगा।मुझे उसकी खुशी देख बहुत आनन्द आ रहा था ।दस दिनों में ही वो काफी घुल मिल गई थी सभी से।

अध्याय:-10

हम दोनों शादी के बाद लगभग एक साल अकेले रहें।पर उस दूरी में भी हमारा प्यार उफान मारता रहा।हम और भी करीब एक दूसरे के आ गए थे।फिर मेरा प्रमोशनल ट्रांसफर हुआ,और मैं मुम्बई आ गया।तीन साल तक हम साथ रहे,एक दूसरे के साथ में खुश थे।उन दिनों हम दोनों में खटपट भी हो जाया करती थी,पर हम ज्यादा देर एक दूसरे से अलग भी नहीं रह सकते थे,और शाम होते होते हम दोनों में सुलह भी हो जाया करती थी।कविता हमारे बच्चे को गर्भधारण कर चुकी थी।मेरे माँ पिता और कविता के माँ पिता ने आकर उसकी सम्हाल किए।और छह महीने के बाद डॉक्टर से चेक आप करवाया और पटना लेकर कविता को चले गए।क्योंकि पटना में पापा(ससुर जी) की बहुत सारे डॉक्टरों से अच्छी पहचान थी और सारी सुख सुविधाएं उपलब्ध थी,इसलिए कविता के लिए उससे उचित जगह मुझे कहीं और दिखी नहीं।

अध्याय:-11

मैं यहाँ, तुम वहाँ।मैं हमेशा फोन पर उससे बहुत सारी प्यार भरी बातें किया करता था,और उसे मेंटली सपोर्ट किया करता था।
मैं बैंक में था,मेरे पास फोन आया पापा का(ससुर जी)।आ जाइए बच्चा वेंटिलेटर पर है।मैं बहुत डर गया था।और आँखों से अश्रु निकल पड़े थे।मैने माँ को फोन किया,वो रो रही थी कि बच्चे को साँस लेने में दिक्कत हो रही है,पता नही अभी कैसा होगा।उसे अंदर ले गए हैं।
मुझे रोते देख सारा बैंक का स्टाफ मुझे घेर लिया था।और मुझसे रोने का कारण पूछने लगे थे।मेरी खबर सुन उन्होंने मुझे तुरन्त पटना जाने को कहा।मैने भी फटाफट फ्लाइट की टिकट बुक की,और टैक्सी ले कर निकल पड़ा।वो पल मेरे जीवन का सबसे भारी पल था।
फ्लाइट में भी दिल कहाँ रुक रहा था।लागतार आँसू मेरे आंखों से निकले जा रहे थे।मन भी विचारों की उफान में मचल रहा था।किसी तरह पटना पहुँचा।जब हॉस्पिटल पहुँचा, तो पता चला मेरा बेटा निकल लिया है,बिना बाप से मिले ही निकल लिया।क्या मैं इतना पापी था,कि मैं अपने बच्चे से भी ना मिल सका!उसे अपने गोद में भी ना उठा सका, वगैरह वगैरह सवाल मेरे दिमाग मे घूमने लगे।मैं रोया,खूब रोया,जी भर कर रोया।
मेरी पत्नी को प्रेगनेंसी के दौरान एक कन्धे के बोन का डिसलोकेशन हो गया था।डॉक्टर ने फिजियोथेरेपी एक्सरसाइजेस करने की सलाह दी थी।
उसी दौरान मेरी प्रोमोशन क्लियर हुआ,और मुझे मुंबई से हटा पुणे ज़ोन भेज दिया गया।

अध्याय:-12

पुणे जोनल आफिस में रिपोर्टिंग के समय मैने अपनी पत्नी की प्रॉब्लम शेयर की थी,पर उन्होंने मेरी एक ना सुनी,और मुझे उठाकर गोआ भेज दिया।मैनेजमेंट इतना निर्दय कैसे हो सकता है?मैं सोच सोच कर परेशान हो गया था।एक साल  कट चुके थे।मेरी पत्नी की जो प्रॉब्लम थी,वो भी भयावह रूप ले ली थी।उसे स्पॉन्डिलाइटिस ने जकड़ लिया था।मैं मन ही मन बहुत दुखी रहने लगा था।माँ बाप साथ आकर रह नहीं सकते थे,क्योंकि वो खुद वृद्ध हो चुके थे और बहन की शादी की जिम्मेदारी अभी भी उनके कंधे पर थी।मैं बहुत परेशान और टेंस रहने लगा था।डॉक्टर ने कविता को साफ साफ भारी समान उठाने से मना किया था।मैनेजमेंट ने अलग परेशान करके मुझे रखा हुआ था,कि लोन क्यों नहीं बाँट रहे हो,ब्रांच में बैठे रहते हो।मेरा सर फटता सा जा रहा था।उन्ही टेंशनो से निजाद पाने को मैने चूहे मारने की दबा खा ली थी।

अध्याय:-13

जब होश आया तो मैं खुद को सभी से घेरे हुए पाया।पत्नी,माँ, पापा सभी मुझे घेरे हुए थे।सभी के आंखे डबडबाई हुई थी।मेरी गलती की एहसास मुझे हो चुकी थी।उस दिन लगा मुझे कि मैंने पुनर्जन्म पा लिया हो।मेरी जिम्मेवारी अभी बाकी थी,मैने कैसे इतना गलत कदम उठा लिया था।और कसम खाई कि अब कभी भी ऐसे घिनौने काम को अंजाम नहीं दूँगा,भले नौकरी छोड़ दूँगा, पर सुसाइड एटेम्पट कभी नहीं करूँगा।





adhyaay:-1

meri haalaat naajuk the,main mar rahaa thaa।maine chuhaa maarne vaalaa davaa jo khaa liyaa thaa।aisi majburi aai kyon?aaea ham paanch varsh purv chalte hain।



adhyaay:-2

main yaani sushil kumaar,bahut hi sabhy,sushil aur shaant svbhaav kaa ldkaa thaa।do varsh purv mujhe baink men naukri lag gayi thi।meri umr aaj pachchis ki ho gayi thi।shaadi ke lia rishte ghar par aane lage the।koi ldki ke maataa pitaa mere maataa pitaa se mil meri saari jaankaari lekar mujhse milne,mere posting ki jagah yaani satnaa aane vaale the।satnaa madhyaprdesh kaa ek chhotaa saa shahar hai,jo ki madhyaprdesh aur uttaraprdesh ke bardar par sthit hai।main vahaan par ek chhote se kamre men gujaaraa kartaa thaa।

ab sambhaavit patni ke pitaa aur maataa,yaani sambhaavit sasur aur sambhaavit saasu maan aa rahe hain,to unkaa vishesh dhyaan to rakhnaa hi pdegaa।chalo unkaa nahin to apne maan baap ke ejjat kaa khyaal to rakhnaa hi pdegaa।kahin aisaa naa ho ki ye vaapas jaakar maan baabu ji se shikaayat kar den,ki bachche men aapke bilkul sanskaar naam ki chij hi nahin hai।hame bhagvaan bharose chhod vah chalaa gayaa thaa,yaa nahin aayaa thaa।

chalia unkaa aane kaa din aayaa।mere paas ek annon nambar se phon aayaa।us samay dopahar ke tin baje rahe the।


main: helo

saamne se:- haan betaa,ham satnaa do ghante men pahunchne vaale hain।

main:-ji,kaun si train se aa rahe hain,aaplog?

saamne se:-mumbaayi eksapres hai।gaadi nambar rukia dekhakar bataataa hun।

lagabhag ek minat hone vaalaa thaa,tabhi phon se ek aavaaj aur bhi sunaai deti hai, kisi stri kaa,are jaldi kijia,daamaad ji ko kitnaa vait karvaaiagaa।

saamne:-betaa ji gaadi kaa nambar hai,12142।

main:- ji ye to subah hi pahunch jaati hai,satnaa।

saamne:-darasal patnaa se hi kaaphi let khuli thi।

main :-(man hi man,achchhaa huaa,varnaa aaj aaphis se chhutti leni pd jaati)ji achchhaa।

saamne se:-betaa ji ek kasht kijiagaa,apnaa apaentment letar aur sailri slip apne saath le aaeagaa।

main:- ji,bilkul।

saamne se:-chalia aakar milte hain।

main:-ji,aaea naa।phon rakhte hain,prnaam।

saamne se:-ji prnaam,prnaam।

maano saasu maan ke bhi taraph se enhonne prnaam kiyaa ho।kahin daamaad jo ko buraa naa lag jaaa।


mainne fon par train ki stetas chek kiyaa,pataa chalaa ki train do ghante men pahunchne vaali hai।meri posting us vkt satnaa se lagabhag 20ki.mi. ki duri par sthit chhote se shahar naagod men thi।har roj satnaa se ap daaun kartaa thaa,bas se।naagod se satnaa aane men mushkil se 20 minat samay lagte the।maine apne dimaag men us tarike se kailakuleshan kar,satnaa pahunchne kaa plaaning kar liyaa,ki ek to unse aadhe ghante pahle pahunch kar vahi steshan ke paas men sthit kisi hotal men unke thaharne kaa vyavasthaa kar denge।

usi hisaab se main chaar se savaa chaar baje tak nikalne kaa phaislaa liyaa।satnaa steshan pahunchne ke baad hotal saai pailes men ek aye.si. kamre ki buking maine ek din ke lia apne naam se karvaa li।kyonki us hotal kaa hamaare yahaan ekaaunt thaa,unhonne mujhe 50% diskaaunt par,ek hjaar rupye men ek kamraa de diyaa।saath men kamplimentri brekphaast bhi thaa।mainne chaabhi lekar apne kamre ki muaaynaa bhi karli।kamre aur baathrum bilkul saaph the।kamre ki aye.si. bhi chal rahi thi,baathrum kaa phlash vagairah sabhi sahi salaamat chal rahe the।unke train ki stetas maine phon par chek kiyaa,to pataa chalaa paanch minat men tren pahunchne vaali hai।main phataaphat steshan pahunch gayaa,unhen risiv karne ke lia।usi train ki anaaunsment lagaataar jaari thi।

tabhi meri phon ki ghanti baji।usmen probebळ sasur ji ke naam se kal aa rahaa thaa,maine aisaa naam kis lia rakhaa thaa,ye bataane ki aapko jarurat nahin hai।etne to samajhdaar aaplog honge।

mainne phon uthaayaa।


main:- ji prnaam।

saamne se:-prnaam prnaam।

main:- ji ham steshan aa chuke hain।

saamne se:-ji thik hai।aap tikat kaauntar ke paas hi milia।ek nambar se hi baahar nikalnaa hai naa।

main:-ji ji bilkul।

saamne se:-thik hai,ab train steshan pahunch gayi hai,ham aa rahe hain।prnaam।

main:-ji prnaam।


main tikat kaauntar par jaakar khdaa ho gayaa,aur unkaa entjaar karne lagaa।meraa ji bahut ghabraa rahaa thaa।aakhir ghabraaagaa bhi kyon nahin?bilkul sidhaa saadhaa jo thaa।

tabhi phirse probebळ sasur ji ke naam se kal aayaa।mainne phon uthaayaa,aur edhar udhar njar daudaayaa।ek pachaas se pachapan saal ke vriaddh ko phon ko kaan par lagaakar baat karte dekh,unke paas pahunch gayaa।

main:- helo(phon par)

saamne vaale vriaddh ke pair chhune lagaa।

main:-ji prnaam।

vriaddh:-khush raho!khush raho!

phon se:-betaa ham edhar hain।tumhaare pichhe।

main pichhe mudaa।

main:-are aap edhar hain।

probebळ sasur ji:-lagtaa hai aapko kamphyujan ho gayaa।

mainne dono ke pair chhua।dono ne khush rahia hi kahaa।

main:-chalia paas men hi hotal hai।

probebळ sasur ji:-chalia।

raaste men unhen saath lekar chalne ki koshish kar rahaa thaa,lekin vo baar baar mujhe aage chalne ko kah rahe the।maano meri haaet ko vo apni aankhon se naapne ki koshish men the,yaa dekhnaa chaahte the ki pair se daamaad ji thik hain ki nahin,kahin langdaate to nahin hain?

ham hotal pahunche।

probebळ sasur ji:- are daamaad ji hotal ki buking karke rakhi thi aapne?

main:- ji ji।

probebळ sasur ji:-bahut bahut aapkaa dhanyvaad।

main:-ji dhanyvaad bolakar mujhe sharmindaa mat kijia।aap log phresh ho jaaea।aapke lia kuchh khaane ko mnagvaa detaa hun।

probebळ sasur ji:-thik hai।

main hotal ke risepshan par gayaa,aur shaam kaa menu puchhaa।phir bdaa soch kar 1 plet vej pakodaa,tin samosaa,tin gulaab jaamun aur tin tometo sup kaa aardar kiyaa।phir rokaa aur aardar men chenj kiyaa,kyonki mujhe lagaa ye to khaanaa hi ho jaaagaa।vej pakodaa usme se katvaa diyaa।aur bolaa rum nambar 203 men pahunchaa dijia।ye aardar kaa pement apne pars se nikaal kar maine kar di।

kuchh der baad।

probebळ sasur ji kaa phon aayaa।

main:-ji bolia।

probebळ sasur ji:-kahaan hain,ham phresh ho lia hain।aaea naashtaa aayaa hai।saath men naashtaa karte hain।

main:-ji aayaa।(mujhe aisaa aabhaas huaa ki enhonne bhi kuchh aardar kar diyaa hai)

kamre men jab pahunchaa to paayaa ki meraa hi aardar kiyaa huaa naashtaa, vahaan stul par rakhaa huaa hai।

main:-aap kaaphi thak gaye honge।

probebळ sasur ji:-nahin betaa ji,aaraam se sote sote aaa hain।main:-ji

probebळ sasur ji:-lijia naashtaa kijia,thandaa ho jaaagaa।

(phir ham sabhi ne naashtaa kiyaa,probebळ sasur ji ne bich bich men lambaa lambaa dhakaar bhi liyaa।

main:-ji aap minaral vaatar piange yaa naarmal vaatar।

probebळ sasur ji:-minaral vaatar ho to jyaadaa achchhaa hogaa betaa ji।

mainne risepshan ko phon kar tin bisleri botal kaa aardar kar diyaa।

probebळ sasur ji:-aaea baithia betaa ji।

main vahin rakhe paas kursi par baith gayaa।

probebळ sasur ji:-achchhaa betaa ji sailri slip aur apaentment letar lekar aaa hain।

main:-ji

(apnaa jeb tatolte hua)

main:-ye lijia।

pahle to unhonne khud chek kiyaa,phir apni bibi ko bhi diyaa।

probebळ sasur ji:-achchhaa betaa ji abhi aap mainejar hain।

main:-ji nahin।abhi main aphasar hun।ek saal ke baad main mainejar ke post ke lia elijibal ho jaaungaa।

probebळ sasur ji:-humm।kitnaa sailri aapkaa ho jaaagaa eske baad।

main:-pachapan hjaar ke aas paas to ho hi jaaagaa।

probebळ sasur ji:-gud।

main:- ji।

probebळ sasur ji:-aapkaa kyaa habi hai?

main:-mujhe kriket khelnaa bahut pasand hai।

probebळ sasur ji:-ji bahut achchhaa।meraa bhi betaa beti kriket khelnaa bahut pasand kartaa hai।

main:- ji।

probebळ sasur ji:-chalia achchhi jodi banegi aaplogon ki।

ye lijia photo,meri bitiyaa savitaa ki।

main photo lete hua।

probebळ sasur ji:-kaisi lagi।

main:-ji achchhi hai।

probebळ sasur ji:-abhi savitaa pi.en.bi. men praaevet jab kar rahi hai।abhi uski posting banglor men hai।main use boltaa hun ki ek saptaah ke lia yahaan aa jaaagi।aap log ek dusre ko achchhe se samajh bujh lijiagaa।hai ki nahin।

main:-ji।(jaraa hichakte hua)

probebळ sasur ji:-to thik hai,kal hamaari tren hai,subah subah 6 baje ki।ham aapke mammi paapaa se milne parson pahunchenge।unhen bataa dijiagaa ki aapko savitaa pasand hai।thik hai।

main:-ji ji।bilkul।

(man men sochte hua,mujhe to ldki kuchh khaas lagi nahin,par uske mammi paapaa bhi kuchh jyaadaa hi pharavard lag rahe hain।pataa nahi aaj ke samay kaun saa maan baap apni bachchi ko kisi gair ke paas ek dusre ko samajhne bujhne ke lia bhejtaa hai?shaayad enhen meri sanskaar dekh ,mujhapar atyadhik bharosaa ho gayaa hogaa?vagairah vagairah mere man men khyaal aayaa rahe the।

main:- chalia dinar kaa samay ho gayaa।kyaa khaaeagaa?

probebळ sasur ji:-panir makhni,daal aur taavaa roti sahi rahegaa।

main:-ji ji।

maine risepshan par fon kar ke khaanaa mnagvaa liyaa।

aur tivi on kar di।paanch minat men dor bel bajaa।

probebळ sasur ji:- dekhia betaa ji lagtaa hai,khaanaa aayaa।

main:-ji ji।dekhtaa hun।

probebळ sasur ji:-chalia aaea khaanaa khaa lete hain।

hamne saath me khaanaa khaayaa।phir main unhen gud naait bolakar rum se baahar nikal gayaa।

main apne rum men jab pahunchaa, maan ko phon lagaayaa aur saari ghatnaaon ko vistaar se bataayaa।maan boli ki dekh betaa, log to tumhen dekhne aate rahenge,agar tum sab kaa kharchaa uthaaoge,phir tum apnaa mahinaa kaise chalaaoge?tumhe rum buk karnaa chaahia thaa keval, paise nahin dene chaahia the।khaane kaa kharchaa bhi tumne hi uthaayaa।aur vo log kaise log the,kahin kaa bhi kharchaa nahin uthaayaa।bilkul hi kanjus log the kyaa?।phir maine jab unhen ye bataayaa ki ve savitaa ko mere paas saat dinon ke lia bhejnaa chaah rahe the,taaki ham donon ek dusre ko achchhe se samajh sake।phir to maan bahut jyaadaa hi krodhit ho gayi।phir unhonne puchhaa ki mujhe ldki kaisi lagi?mainne bataayaa,kuchh khaas nahin ।aur usse shaadi karne ko maine manaa kar diyaa।

es ghatnaa se mujhe ek sabak to milaa thaa ki koi bhi aaa mujhe dekhne ke lia,ab main ek paisaa bhi kharch nahin karungaa।es baar mere paket se ek din men chhah hajaar kaa ftkaa lag chukaa thaa।main bahut hi apset thaa।


adhyaay:-3

uske baad jab bhi koi dekhne ko aataa,main unhen risiv karne nahin jaataa।saath men ye bhi bataa detaa ki kaam kaa bojh bahut hi jyaadaa hai,staaph ki bahut hi shartej hai,to main aapko risiv karne nahin aa paaungaa।koi bhi jidd nahin kar paataa thaa।agar koi puchhtaa ki steshan ke aaspaas ke koi achchhe hotal kaa edres de dijia,to unhen saai pailes hotal kaa naam bataa detaa thaa।phir kyaa?shaam ko aaraam se kisi restorent men ham milte the,baat chit hoti thi।main apne apaentment letar aur sailri slip hameshaa saath lekar jaataa thaa।aur agle din koi koi hamaare baink men aate the,kuchh der braanch mainejar aur staaph se baat chit kar vahaan se bhi nikal jaate the।mujhe koi ldki pasand nahin aa rahi thi।


adhyaay:-4

mere maan pitaa main aur meri bahan satsang se jude hua hain।satsang yaani raadhaasvaami v daataa dayaal ke mat ke satsang se।mujhe bhi apne maalik par bahut hi jyaadaa shraddhaa aur bharosaa hai।ab mere kahaani par aate hain।mere maalik ki bahu,jinhen ham didi kahte the,unhonne apni bahan ki bitiyaa kavitaa se meri shaadi ki baat mere paapaa mammi se ki।hamaare maan paapaa ke lia esse jyaadaa khushi ki baat nahin ho sakti thi ki unke saath hamaaraa sambandh bane।dono parivaaron men baat chali।baat aage bdhne par kavitaa ke maan paapaa aur uske chaachaa mujhe dekhne satnaa aane kaa plaan banaane lage।mujhe jab pataa chalaa ki meraa rishtaa didi(maalik ji ki bahu) ke bahan ke ghar men ho rahaa hai,to main dil hi dil bahut khush huaa thaa।

es baar main puraa soch kar rakhaa thaa ki saaraa kharchaa main hi uthaaungaa।unkaa aane kaa din phiks huaa।par mujhe ek baar bhi kisi kaa phon nahi aayaa।ye pahli baar huaa ki main kastamar se ghiraa huaa thaa,aur pichhe kuchh anjaan log khde ho mere kaary ko dekh rahe the।par main bhid men etnaa vayast thaa ki unhen notis kar hi nahin paayaa।phir jab main bhid se khaali huaa to unmen se ek vyakti aakar apnaa parichay hamen dete hain,kahte hain ki ve kavitaa ke chaachaa hain,vo jo dono udhar khde hain,ve uske maataa pitaa hain।main apne cheyar se uth khdaa huaa aur sabhi ke pair chhua।phir kavitaa ke paapaa ne mujhe hotal kamal men shaam ko aane ko kahaa।aur phir vo hamse vidaa lekar apne hotal ki or prasthaan kia।

main shaam men baink se sidhe hotal kamal men pahunchaa।aur unhen phon kar unse unkaa kamre kaa nambar puchhaa।jab kamre men gayaa to unhonne hamen baithne ko kahaa।phir savaalon ki baarish shuru ho gayi।maine bhi unke saare savaalon kaa javaab diyaa।

paapaa:-aapki habi kyaa hai?

main:-kriket khelnaa,kavitaa likhnaa।

chaachaa :-kriket men kaun saa khilaadi aapko pasand hai।

main:-mahendr sinh dhoni

paapaa:-aapne hotal mainejment bhi kiyaa huaa hai।

main:- ji।

paapaa:-phir to aapko khaanaa banaanaa aataa hi hogaa।

main:-ji।

chaachaa :-kyaa kyaa banaa lete hain?

main:-ji lagabhag sab kuchh।

(man hi man,achchhaa hai ye keval entaravyu hai,agar praiktikal hotaa,to phnas hi gayaa thaa।)

paapaa:-aapko kaisi ldki pasand hai?

main:-sundar ho,sushil ho,samajhdaar ho।

paapaa:-agar saanvli ho to chalegaa।

main:-ji ।sanakuchaate hua।

paapaa:-bilkul mere jaisi hai।

(man hi man,par aap to ghane saanvle hain,baap re)

main:-ji,chalegi।(himmat baandh kar bolaa)

phir ham restarent men gan dinar karne ke lia।

paapaa:-bataaea sushil ji kyaa khaaange(menu kaard mere taraph bdhaate hua)।

main:-ji aaplog ji aardar kijaaye naa।

paapaa:-are aap hotal mainejment kia hain,hamse jyaadaa jyaan khaane kaa aapko hi hogaa।chalia phataaphat testi testi khaane kaa aardar kijia।

mainne bhi menu kaard pdhakar,sabhi logo ke lia aardar kar diyaa।


unhen main shaayad pasand aayaa thaa,mujhe bhi ve pasand aaan the।par ek baat dil men khatakti rah gayi,aisaa kyon bolaa unhonne ki kavitaa bilkul unki hi jaisi hai।baap re।


adhyaay:-5

bahut baar koshishen huin,par naakaam rahin hamen(mujhe aur kavitaa ko) milaane ke lia।mere maan pitaa aur bahan kavitaa ko dekhne aur milne patnaa ke ek restarent men gan।mujhe unhonne kavitaa ke baare men jo bataayaa vo kalpniy thaa ,bahut hi sundar aur sushil ldki hai,tum donon ki jodi bahut hi achchhi lagegi।main uske kalpnaaon men dub gayaa।

jab main ghar gayaa,to mujhe uski photo mujhe dikhaai gayi।jise dekh mere aankhon ke saamne andheraa chhaane lagaa।kaisaa chehraa dikh rahaa hai, photo men enkaa,n koi chamak hai,naa koi sundartaa hai,bilkul udaas udaas dikhti hai।par maan ne bataayaa ki photo par mat jaao,asal men bahut hi sundar hai kavitaa।meri bahan aur paapaa ji ne bhi maan ke baaton men haami bhar di।mujhe bhi apne parivaar ke baaton par vishvaas ho gayaa thaa।



adhyaay:-6

meri engajment kavitaa ke saath hui।bahut hi bhavy aayojan kiyaa gayaa thaa।main stej par baith pujaa kar rahaa thaa।pandit ji mantr kaa uchchaaran kia jaa rahe the।meraa dil yahaan dhdkaa jaa rahaa thaa,ki ldki mujhe pasand aaagi yaa nahin।meri pujaa samaapt hui,main apne aasan par jaakar baith gayaa।kavitaa ko uski chaachi stej par lekar aai।kavitaa ko ek jhalak jo dekhaa,meri to aankh hi chondhraa gayi।gajab ki sundartaa ki murti vo dikh rahi thi।bde bde aankhen, sundar naak naks kyaa baat hai।main apne maalik ji ko man hi man dhanyvaad de rahaa thaa।aur saath me maan, pitaa aur bahan ko bhi।phir rasm shuru hui,hamne ek duje ko anguthi pahnaai।jo usne meraa haath ko chhuaa to mujhe aisaa aabhaas huaa ki kitnaa puraanaa rishtaa hai hamaaraa।bahut hi adamy ahsaas thaa vo।us pal ko main jab bhi yaad kartaa hun to sihar jaataa hun।

phir saath men hamne khaanaa khaayaa।aur apnaa vijiting kaard use de diyaa।par jab usse uskaa nambar maangaa, to usne dene se manaa kar diyaa।


adhyaay:-7

vo din yaad hai,jab mujhe vidaa karne ko kavitaa apne bhaai bahnon ke sang patnaa steshan par aai thi।darasal main devaghar,apne ghar se satnaa jaa rahaa thaa।meri satnaa vaali train patnaa se khulti thi।main jab patnaa steshan par apni satnaa vaali tren ke lia vait kar rahaa thaa,jiske aane kaa samay abhi bhi do ghante pashchaat kaa thaa,mere phon ki ghanti baji।kavitaa kaa phon thaa।

kavitaa:-steshan ke baahar aaea,hamlog aapse milne ke lia aaa hua hain।

main:-kyaa?sahi men।

main jab baahar niklaa to puri phauj ko paayaa ।saare bhaai bahan ke saath me aai thi vo।us din bhi kavitaa bahut hi sundar dikh rahi thi।main usse bahut hi jyaadaa pyaar karne lagaa thaa।

vo mere lia raaste kaa bhojan banaakar laai thi।phir hamen gaadi men akele chhod sabhi baahar nikal gan।ham donon ne bahut saari baaten ki।samay kab nikaltaa chalaa gayaa,pataa hi nahi chalaa।phir main sabhi se vidaa le aage ki saphar par nikal pdaa।


adhyaay:-8

engejment aur shaadi ke bich men tin mahine kaa gaip thaa।ham ghanton phon par bitaa diyaa karte the,phir bhi man thaa ki bhartaa hi nahin thaa।ek dusre ko samajhne kaa ,ek dusre ke parivaar ko bujhne kaa ye sunahraa maukaa thaa।vo ek aadhyaatmik ldki thi।baabaa(bhole baabaa) aur maan(paarvti maan) par asim shraddhaa rakhne vaali।main bhi aadhyaatmik thaa,par meraa jhukaav raadhaasvaami aur daataa dayaal ke mat ke satsang  ki or thaa।aksar ham donon ke bich men aadhaatmik charchaaan hoti hi rahti thi।


adhyaay:-9

hamaari shaadi kaaphi dhum dhaam se hui।vidaai kaa samay aayaa।sabhi logon ke aankhon se ashru ki dhaaraa bahne ko vyaakul si dikh rahi thi।unki haalat dekh,meraa dil bhi bechain saa ho rahaa thaa।rah rah kar mere aankhon men ashru chhalke jaa rahe the।aur vidiyo rikarding vaalon ko esse achchhaa sin kahaan mil saktaa thaa।dulhan ki vidaai men dulhe ki aankhon men aansu।vaah-vaah।kavitaa ek pal ke lia bhi nahin roi।

phir jab vidaai hamaari ho gayi।ham lagabhag ek ki.mi. bhi nahi pahunche honge,to vo ronaa shuru kar di।bahut chup karvaate karvaate shaant hui,aur phir so gayi।main aur kavitaa pandrah dinon ki chhutti baink se lekar aaa the।maine use puraa devaghar ghumaayaa।use bahut achchhaa lagaa।mujhe uski khushi dekh bahut aanand aa rahaa thaa ।das dinon men hi vo kaaphi ghul mil gayi thi sabhi se।


adhyaay:-10

ham donon shaadi ke baad lagabhag ek saal akele rahen।par us duri men bhi hamaaraa pyaar uphaan maartaa rahaa।ham aur bhi karib ek dusre ke aa gaye the।phir meraa prmoshanal traansaphar huaa,aur main mumbaayi aa gayaa।tin saal tak ham saath rahe,ek dusre ke saath men khush the।un dinon ham donon men khatapat bhi ho jaayaa karti thi,par ham jyaadaa der ek dusre se alag bhi nahin rah sakte the,aur shaam hote hote ham donon men sulah bhi ho jaayaa karti thi।kavitaa hamaare bachche ko garbhdhaaran kar chuki thi।mere maan pitaa aur kavitaa ke maan pitaa ne aakar uski samhaal kia।aur chhah mahine ke baad daktar se chek aap karvaayaa aur patnaa lekar kavitaa ko chale gaye।kyonki patnaa men paapaa(sasur ji) ki bahut saare daktron se achchhi pahchaan thi aur saari sukh suvidhaaan upalabdh thi,esalia kavitaa ke lia usse uchit jagah mujhe kahin aur dikhi nahin।


adhyaay:-11

main yahaan, tum vahaan।main hameshaa phon par usse bahut saari pyaar bhari baaten kiyaa kartaa thaa,aur use mentli saport kiyaa kartaa thaa।

main baink men thaa,mere paas phon aayaa paapaa kaa(sasur ji)।aa jaaea bachchaa ventiletar par hai।main bahut dar gayaa thaa।aur aankhon se ashru nikal pde the।maine maan ko phon kiyaa,vo ro rahi thi ki bachche ko saans lene men dikkat ho rahi hai,pataa nahi abhi kaisaa hogaa।use andar le gaye hain।

mujhe rote dekh saaraa baink kaa staaph mujhe gher liyaa thaa।aur mujhse rone kaa kaaran puchhne lage the।meri khabar sun unhonne mujhe turant patnaa jaane ko kahaa।maine bhi phataaphat phlaaet ki tikat buk ki,aur taiksi le kar nikal pdaa।vo pal mere jivan kaa sabse bhaari pal thaa।

phlaaet men bhi dil kahaan ruk rahaa thaa।laagtaar aansu mere aankhon se nikle jaa rahe the।man bhi vichaaron ki uphaan men machal rahaa thaa।kisi tarah patnaa pahunchaa।jab haspital pahunchaa, to pataa chalaa meraa betaa nikal liyaa hai,binaa baap se mile hi nikal liyaa।kyaa main etnaa paapi thaa,ki main apne bachche se bhi naa mil sakaa!use apne god men bhi naa uthaa sakaa, vagairah vagairah savaal mere dimaag me ghumne lage।main royaa,khub royaa,ji bhar kar royaa।

meri patni ko pregnensi ke dauraan ek kandhe ke bon kaa dislokeshan ho gayaa thaa।daktar ne phijiyotherepi eksarsaaejes karne ki salaah di thi।

usi dauraan meri promoshan kliyar huaa,aur mujhe mumbaayi se hataa pune jon bhej diyaa gayaa।


adhyaay:-12

pune jonal aaphis men riporting ke samay maine apni patni ki prablam sheyar ki thi,par unhonne meri ek naa suni,aur mujhe uthaakar goaa bhej diyaa।mainejment etnaa nirday kaise ho saktaa hai?main soch soch kar pareshaan ho gayaa thaa।ek saal  kat chuke the।meri patni ki jo prablam thi,vo bhi bhayaavah rup le li thi।use spandilaaetis ne jakd liyaa thaa।main man hi man bahut dukhi rahne lagaa thaa।maan baap saath aakar rah nahin sakte the,kyonki vo khud vriaddh ho chuke the aur bahan ki shaadi ki jimmedaari abhi bhi unke kandhe par thi।main bahut pareshaan aur tens rahne lagaa thaa।daktar ne kavitaa ko saaph saaph bhaari samaan uthaane se manaa kiyaa thaa।mainejment ne alag pareshaan karke mujhe rakhaa huaa thaa,ki lon kyon nahin baant rahe ho,braanch men baithe rahte ho।meraa sar phattaa saa jaa rahaa thaa।unhi tenshno se nijaad paane ko maine chuhe maarne ki dabaa khaa li thi।


adhyaay:-13

jab hosh aayaa to main khud ko sabhi se ghere hua paayaa।patni,maan, paapaa sabhi mujhe ghere hua the।sabhi ke aankhe dabadbaai hui thi।meri galti ki ehsaas mujhe ho chuki thi।us din lagaa mujhe ki mainne punarjanm paa liyaa ho।meri jimmevaari abhi baaki thi,maine kaise etnaa galat kadam uthaa liyaa thaa।aur kasam khaai ki ab kabhi bhi aise ghinaune kaam ko anjaam nahin dungaa,bhale naukri chhod dungaa, par susaaed etempat kabhi nahin karungaa।


Written by sushil kumar

2 Jul 2019

Ankita dreams

अंकिता ड्रीम्स।

kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठको को समर्पित है।



कभी सोचा ही नहीं था,कि कभी ऐसे दिन भी देखने पड़ेंगे।ऐय्यासी की जिंदगी से सीधे एक एनजीओ में वालंटियर बन काम करने में मशगूल था।मैं देवेश राज,एक नामी गिरामी बिजनेसमैन कल्पेश राज का इकलौता बेटा।
मेरे पापा बहुत ही अनुशासन प्रिय इंसान थे और मैं उनका बिल्कुल ही उल्टा।आराम से सुबह उठना, रात को देर रात तक जागना,दोस्तों के संग घूमना,फिरना,ऐय्यासी करना बस मज़े में जिंदगी कट रही थी।मेरे आगे पीछे लड़कियों की लाइन लगी रहती थी।सभी मेरे साथ दोस्ती करने को किसी भी हद्द तक जाने को तैयार रहती थी।पर मुझे उनमें किसी भी प्रकार की दिलचस्पी नहीं थी,इसलिए उनको मैंने कभी भाव दिया नहीं।
मेरे दोस्त भी गिने चुने ही थे,जो मेरे लेवल के थे।
फिर कॉलेज में हमने दाखिला लिया।वहाँ एक लड़की ने एडमिशन लिया,जो सावली सी,बाल सीधे सीधे,पर नाक नक्स जबरदस्त थे।मैंने उसे भी भाव नही दिया।पर कुछ तो बात थी जो मेरी नज़र दुबारा उसे ढूंढने को चारों तरफ दौड़ गई।
उसका नाम अंकिता था।वो भी मैथ्स साइंस में हमारे साथ मे थी।हमेशा वो आगे के रो में ही बैठती थी।
उसे देख ऐसा लगता था,कि कितना अच्छा होता मैं मैथ्स साइंस में एक्सपर्ट होता,और उसके साथ में बैठता।वो मुझपे विभिन्न प्रकार के सवाल दागती रहती,और मैं हँस हँस कर सारे सवालों के जवाब देता रहता,देता रहता और देता है रहता।
अब मैने तय कर लिया था कि मैं आगे वाले रो में ही बैठूंगा,वो भी अंकिता के साथ।भले मैं उसके सवालों का जवाब ना दे पाऊँ, पर उससे अपने सवालों के जवाब तो मांग ही सकता हूँ।और धीरे धीरे ही सही हमारी दोस्ती परवान तो चढ़ेगी।
यही सोच मैं आगे वाले रो में बैठ गया।मेरे बगल में अंकिता आकर बैठ गई।
देवेश:- हाई, मैं देवेश।
अंकिता:-हेलो,मैं अंकिता हूँ।वैसे देवेश तुम कौन से स्कूल से पास आउट हो।
देवेश:- मैं सन्त जोसफ से।और तुम?
अंकिता:-मैं सन्त क्राइस्ट से पास हूँ।कितने परसेंटेज आए थे,तुम्हारे बोर्ड में?
देवेश:-ज्यादा नहीं(मन में सोचते हुए,अगर 65% बताऊँगा तो पता नहीं,पीछे बैठने को ना बोल दे) बस 90%
अंकिता:-गुड देवेश।
देवेश:- और तुम?
अंकिता:-मेरे तुमसे कम ही आए थे,82%.
देवेश:-देखो अंकिता तुम्हारे भी अच्छे ही मार्क्स हैं।
अंकिता:-हुम्।थैंक्यू।
देवेश:-मुझसे फ्रेंडशिप करोगी अंकिता।
अंकिता:-यस
फिर हमारी दोस्ती चल पड़ी।
मुझे उससे दोस्ती बनाकर रखने के लिए,पता नहीं कितने पापड़ बेलने पड़े।मैने सारे विषयों के ट्यूशन क्लासेज जॉइन किए।और सारे विषयों का अध्ययन बड़ा जोर शोर लगा कर किया।अब वो मुझसे मुझसे पूछती सवाल,मैं उसे झटाझट देता था जवाब।आखिर मुझे अपनी 90%वाली छवि जो बनाकर रखनी थी।
एक दिन अंकिता कुछ उदास उदास आकर अपने जगह पर बैठ गई।
देवेश:- क्या हुआ अंकिता, इतनी चुप चुप क्यों हो?
अंकिता:- तुम्हारे पिता का नाम क्या है?
देवेश:- कल्पेश राज।
अंकिता:- इस कॉलेज के ट्रस्टी हैं ना तुम्हारे पापा।
देवेश:-हाँ, पर हुआ क्या?
अंकिता:- तुम्हारा एडमिशन यहाँ मैनेजमेंट कोटा के तहत हुआ है।है कि नहीं।
देवेश:- (मन में सोचते हुए,इसे ये जानकारी किसने दी।साले मेरे हरामी दोस्तो ने दी होगी।)हाँ हुआ है।
अंकिता:- तुम्हारे बोर्ड में कितने परसेंटेज आए थे?देवेश!
देवेश:-65%
अंकिता:-फिर तुम सारे सवालों का जवाब कैसे दे देते थे?
देवेश:-मैने कोचिंग जॉइन कर की थी।

अंकिता उठी,और बगल वाले सीट पर जाकर बैठ गई।
मैं गुस्से में पीछे गया और अपने दोस्तों को माँ बहन की गाली दे कहने लगा।

देवेश:- मा.चो.  ब.के.लो. साले तुम लोगो के दिल को मिल गई सन्तुष्टि।
अंकिता:- देवेश इसमें इनकी कोई गलती नहीं है,मैं फेसबुक प्रोफाइल तुम्हारा चेक कर रही थी,वहाँ से सब कुछ पता चला।
मैने अंकिता से लाख माफी माँगी, पर वो मानी नहीं।पर जब वो मेरी रोज की माफी माँगने की किट किट से परेशान हो गई,तब वो कॉलेज आना ही बंद कर दी थी।
दस बारह दिन बाद जब वो नही आई,तब मैं परेशान हो गया।उसकी एक सहेली हुआ करती थी,मोनी,जिसके साथ उसका आना जाना लगा रहता था।
देवेश:-मोनी ये अंकिता कहाँ गई।आती नही है।उसका पता बताओ ना।
मोनी:-देवेश तुम्हें पता नहीं, उसे ब्रेन ट्यूमर निकला था,लास्ट स्टेज का।उसके पापा उसे बंगलोर लेकर गए थे।
देवेश:-अभी कुछ खबर आई क्या उसकी?(देवेश हकलाता हुआ)
मोनी:-हाँ, अंकिता कुछ ही दिन की मेहमान है,जैसा कि अंकल जी ने बताया था।
मुझे जिंदगी में पहली बार अपने अमीर होने पर इतनी दुख और घृणा हो रही थी।मैंने ठान लिया था कि  जिस पैसे की वजह से मेरी अंकिता दूर गई है,उसे बरबाद कर दूँगा।फिर मुझे लगा कि बरबाद करने से अच्छा होगा कि सारे गरीबो में उसे बाँट दूँगा।
अंकिता का भी सपना था कि वो आगे जाकर सोशल वर्क करेगी,और देश से गरीबी को दूर हटाने में योगदान देगी।
मेरे पापा मम्मी के दुनिया छोड़ जाने तक मैंने बिज़नेस सम्भाला।मेरी माँ पहले गुजरी,फिर पापा के गुजरने के बाद, मैने अपना सारा बिज़नेस का सिमटाव करना शुरू कर दिया।और अपने वर्कर्स को उनके मन मुताबिक मुआवजा देने के बाद,जो पैसा बचा उसे लेकर मैने एक एनजीओ का रजिस्ट्रेशन किया और उसका उदघाटन किया।और सारे पैसे  मैंने उसके खाते में जमा कर दिया।उस एनजीओ का नाम अंकिता ड्रीम्स रखा।
जब बिज़नेस में था,तब एक एनजीओ से एक वालंटियर आया था।उसे मैंने दस हज़ार रुपये का चेक दिया था।उसने अपना नाम संजय बताया।उसने अपने काम करने का तरीका बताया,मुझे बहुत अच्छा लगा।मैने उसका मोबाइल नम्बर मांग लिया।
अंकिता ड्रीम्स  के उदघाटन पर मैंने संजय को बुलाया और उसे ट्रस्टी बनने का ऑफर दिया।संजय मान गया।आज मैं वालंटियर बन गया हूँ,और झोपड़पट्टियों में बच्चोबको पढ़ाया करता हूँ।मुझे अंदर से बहुत खुशी मिलती है।मेरी अंतरआत्मा अति प्रसन्न हो जाती है।
आज अंकिता की बहुत याद आ रही है।अगर वो यहाँ होती ,तो बहुत खुश होती कि कैसे उसके सपने को पूर्ण करने में मैं लगा हूँ।







kabhi sochaa hi nahin thaa,ki kabhi aise din bhi dekhne pdenge।aiyyaasi ki jindgi se sidhe ek enjio men vaalantiyar ban kaam karne men mashgul thaa।main devesh raaj,ek naami giraami bijnesmain kalpesh raaj kaa eklautaa betaa।

mere paapaa bahut hi anushaasan priy ensaan the aur main unkaa bilkul hi ultaa।aaraam se subah uthnaa, raat ko der raat tak jaagnaa,doston ke sang ghumnaa,phirnaa,aiyyaasi karnaa bas mje men jindgi kat rahi thi।mere aage pichhe ldakiyon ki laaen lagi rahti thi।sabhi mere saath dosti karne ko kisi bhi hadd tak jaane ko taiyaar rahti thi।par mujhe unmen kisi bhi prkaar ki dilachaspi nahin thi,esalia unko mainne kabhi bhaav diyaa nahin।

mere dost bhi gine chune hi the,jo mere leval ke the।

phir kalej men hamne daakhilaa liyaa।vahaan ek ldki ne edamishan liyaa,jo saavli si,baal sidhe sidhe,par naak naks jabaradast the।mainne use bhi bhaav nahi diyaa।par kuchh to baat thi jo meri njar dubaaraa use dhundhne ko chaaron taraph daud gayi।

uskaa naam ankitaa thaa।vo bhi maiths saaens men hamaare saath me thi।hameshaa vo aage ke ro men hi baithti thi।

use dekh aisaa lagtaa thaa,ki kitnaa achchhaa hotaa main maiths saaens men eksapart hotaa,aur uske saath men baithtaa।vo mujhpe vibhinn prkaar ke savaal daagti rahti,aur main hnas hnas kar saare savaalon ke javaab detaa rahtaa,detaa rahtaa aur detaa hai rahtaa।

ab maine tay kar liyaa thaa ki main aage vaale ro men hi baithungaa,vo bhi ankitaa ke saath।bhale main uske savaalon kaa javaab naa de paaun, par usse apne savaalon ke javaab to maang hi saktaa hun।aur dhire dhire hi sahi hamaari dosti parvaan to chdhegi।

yahi soch main aage vaale ro men baith gayaa।mere bagal men ankitaa aakar baith gayi।

devesh:- haai, main devesh।

ankitaa:-helo,main ankitaa hun।vaise devesh tum kaun se skul se paas aaut ho।

devesh:- main sant josaph se।aur tum?

ankitaa:-main sant kraaest se paas hun।kitne parsentej aaa the,tumhaare bord men?

devesh:-jyaadaa nahin(man men sochte hua,agar 65% bataaungaa to pataa nahin,pichhe baithne ko naa bol de) bas 90%

ankitaa:-gud devesh।

devesh:- aur tum?

ankitaa:-mere tumse kam hi aaa the,82%.

devesh:-dekho ankitaa tumhaare bhi achchhe hi maarks hain।

ankitaa:-hum।thainkyu।

devesh:-mujhse phrendaship karogi ankitaa।

ankitaa:-yas

phir hamaari dosti chal pdi।

mujhe usse dosti banaakar rakhne ke lia,pataa nahin kitne paapd belne pde।maine saare vishyon ke tyushan klaasej jaen kia।aur saare vishyon kaa adhyayan bdaa jor shor lagaa kar kiyaa।ab vo mujhse mujhse puchhti savaal,main use jhataajhat detaa thaa javaab।aakhir mujhe apni 90%vaali chhavi jo banaakar rakhni thi।

ek din ankitaa kuchh udaas udaas aakar apne jagah par baith gayi।

devesh:- kyaa huaa ankitaa, etni chup chup kyon ho?

ankitaa:- tumhaare pitaa kaa naam kyaa hai?

devesh:- kalpesh raaj।

ankitaa:- es kalej ke trasti hain naa tumhaare paapaa।

devesh:-haan, par huaa kyaa?

ankitaa:- tumhaaraa edamishan yahaan mainejment kotaa ke tahat huaa hai।hai ki nahin।

devesh:- (man men sochte hua,ese ye jaankaari kisne di।saale mere haraami dosto ne di hogi।)haan huaa hai।

ankitaa:- tumhaare bord men kitne parsentej aaa the?devesh!

devesh:-65%

ankitaa:-phir tum saare savaalon kaa javaab kaise de dete the?

devesh:-maine koching jaen kar ki thi।


ankitaa uthi,aur bagal vaale sit par jaakar baith gayi।

main gusse men pichhe gayaa aur apne doston ko maan bahan ki gaali de kahne lagaa।


devesh:- maa.cho.  b.ke.lo. saale tum logo ke dil ko mil gayi santushti।

ankitaa:- devesh esmen enki koi galti nahin hai,main phesabuk prophaael tumhaaraa chek kar rahi thi,vahaan se sab kuchh pataa chalaa।

maine ankitaa se laakh maaphi maangi, par vo maani nahin।par jab vo meri roj ki maaphi maangne ki kit kit se pareshaan ho gayi,tab vo kalej aanaa hi band kar di thi।

das baarah din baad jab vo nahi aai,tab main pareshaan ho gayaa।uski ek saheli huaa karti thi,moni,jiske saath uskaa aanaa jaanaa lagaa rahtaa thaa।

devesh:-moni ye ankitaa kahaan gayi।aati nahi hai।uskaa pataa bataao naa।

moni:-devesh tumhen pataa nahin, use bren tyumar niklaa thaa,laast stej kaa।uske paapaa use banglor lekar gaye the।

devesh:-abhi kuchh khabar aai kyaa uski?(devesh haklaataa huaa)

moni:-haan, ankitaa kuchh hi din ki mehmaan hai,jaisaa ki ankal ji ne bataayaa thaa।

mujhe jindgi men pahli baar apne amir hone par etni dukh aur ghrinaa ho rahi thi।mainne thaan liyaa thaa ki  jis paise ki vajah se meri ankitaa dur gayi hai,use barbaad kar dungaa।phir mujhe lagaa ki barbaad karne se achchhaa hogaa ki saare garibo men use baant dungaa।

ankitaa kaa bhi sapnaa thaa ki vo aage jaakar soshal vark karegi,aur desh se garibi ko dur hataane men yogdaan degi।

mere paapaa mammi ke duniyaa chhod jaane tak mainne bijnes sambhaalaa।meri maan pahle gujri,phir paapaa ke gujarne ke baad, maine apnaa saaraa bijnes kaa simtaav karnaa shuru kar diyaa।aur apne varkars ko unke man mutaabik muaavjaa dene ke baad,jo paisaa bachaa use lekar maine ek enjio kaa rajistreshan kiyaa aur uskaa udghaatan kiyaa।aur saare paise  mainne uske khaate men jamaa kar diyaa।us enjio kaa naam ankitaa drims rakhaa।

jab bijnes men thaa,tab ek enjio se ek vaalantiyar aayaa thaa।use mainne das hjaar rupye kaa chek diyaa thaa।usne apnaa naam sanjay bataayaa।usne apne kaam karne kaa tarikaa bataayaa,mujhe bahut achchhaa lagaa।maine uskaa mobaael nambar maang liyaa।

ankitaa drims  ke udghaatan par mainne sanjay ko bulaayaa aur use trasti banne kaa auphar diyaa।sanjay maan gayaa।aaj main vaalantiyar ban gayaa hun,aur jhopdapattiyon men bachchobko pdhaayaa kartaa hun।mujhe andar se bahut khushi milti hai।meri antraatmaa ati prasann ho jaati hai।

aaj ankitaa ki bahut yaad aa rahi hai।agar vo yahaan hoti ,to bahut khush hoti ki kaise uske sapne ko purn karne men main lagaa hun।



Written by sushil kumar

29 Jun 2019

Mera din bhi aa hi gaya.

मेरा दिन भी आ ही गया।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



मैं बचपन से ही ऐसा ही हूँ,बिल्कुल शांत,खुद में ही सिमटा हुआ।भले पड़ोसी में रहने वाला संदीप पूरे इलाके में टॉप किया हो,पर मुझे उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता था।अब आप बोलोगे,ऐसा कैसे और क्यों?अब मेरी सुनो,आज उसका दिन था,उसने टॉप किया,कल आने वाला दिन मेरा होगा, उस दिन मैं टॉप करूँगा।बी पॉजिटिव:-मेरी सोच में भी थी और मेरे खून में भी ।हुम्!
पर वो कल के इंतज़ार में काफी समय निकल गया,पर वो कल नहीं आया।पर आज भी मैं हिम्मत नहीं हारा हूँ।और आज मैं एक स्ट्रगलिंग एक्टर हूँ।जो छोटे मोटे एड करने को दूसरे स्त्रगलर्स से भिड़ता रहता है।आज ही सुबह सुबह मैं बेड पर सोया हुआ था,कि मेरी फोन की घण्टी बजी।
हेलो
हाँ अकरम बोल रहा हूँ,किंग से।
मै :-हाँ बोलो सर।
अकरम:-एक एड करना है,करेगा।
मैं:-हाँ ना सर करूँगा।
अकरम:- नहीं करेगा!
मैं:- करूँगा सर।
अकरम:- एक घण्टे में घाटकोपर के राजू स्टूडियो में पहुँच।
मैं:- आता हूँ ना सर।

में फटाफट तैयार हो पहुँच गया स्टूडियो,वो भी दस मिनट पहले।
यहाँ अकरम भाई कौन हैं।
रिसेप्शनिस्ट: क्या काम है।
मैं: में कार्तिक।आज उनका फोन आया था।कुछ एड करने को बुलाया था।
रिसेप्शनिस्ट: ओके!प्लीज सीट।
मैं:- वहाँ लगे सोफे सेट पर बैठ गया।
रिसेप्शनिस्ट:- कार्तिक सर,अंदर जाइए।
मैं अंदर पहुँचा।
अकरम:-कार्तिक प्लीज कम।
फिर अकरम ने मुझे सारा सीन समझाया।
सीन कुछ ऐसा था।मेरे मोबाइल का रिंगटोन बजता है।में फोन उठाता हूँ।

मेरा दिन आ ही गया।

Adhmari khwahish द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।


।अनजान आदमी:- सर मेरा गधा गढ्ढे में गिर गया गया है।उसे बचा लीजिए।आप सारी दुनिया की मदद करते हैं।मेरे गधे की भी मदद कर दीजिए।
मैं पहुँच जाता हूँ,शक्तिमान की भाँति, चक्कर मारते मारते।और अपने शर्ट को खोल उसके एक बाँह से गधे को बाँधता हूँ और दूसरा बाँह पकड़कर गढ्ढे से बाहर आ जाता हूँ।फिर ज़ोर लगा गधे को बाहर खींच लेता हूँ।
वो अनजान आदमी मेरे पैर पर गिर जाता है,और मुझे बहुत बहुत शुक्रिया बोलने लगता है।पर मैं उसे उठता हूँ और अपने बैग से एक नया बनियान देता हूँ।और कहता हूँ,तुम भी किंग बनियान ही पहना करो और अपने अंदर की शक्ति और ऊर्जा को बढ़ाओ।
उस एड में मेरी एक्टिंग काफी पसंद की गई थी।और मुझे एक बच्चों के शो का ऑफर आया।में बहुत की खुश था,कि आखिरकार मेरा भी दिन आ ही गया।








main bachapan se hi aisaa hi hun,bilkul shaant,khud men hi simtaa huaa।bhale pdosi men rahne vaalaa sandip pure elaake men tap kiyaa ho,par mujhe usse kuchh phark nahin pdtaa thaa।ab aap bologe,aisaa kaise aur kyon?ab meri suno,aaj uskaa din thaa,usne tap kiyaa,kal aane vaalaa din meraa hogaa, us din main tap karungaa।bi pajitiv:-meri soch men bhi thi aur mere khun men bhi ।hum!

par vo kal ke entjaar men kaaphi samay nikal gayaa,par vo kal nahin aayaa।par aaj bhi main himmat nahin haaraa hun।aur aaj main ek stragaling ektar hun।jo chhote mote ed karne ko dusre stragalars se bhidtaa rahtaa hai।aaj hi subah subah main bed par soyaa huaa thaa,ki meri phon ki ghanti baji।

helo

haan akaram bol rahaa hun,king se।

mai :-haan bolo sar।

akaram:-ek ed karnaa hai,karegaa।

main:-haan naa sar karungaa।

akaram:- nahin karegaa!

main:- karungaa sar।

akaram:- ek ghante men ghaatkopar ke raaju studiyo men pahunch।

main:- aataa hun naa sar।


men phataaphat taiyaar ho pahunch gayaa studiyo,vo bhi das minat pahle।

yahaan akaram bhaai kaun hain।

risepshanist: kyaa kaam hai।

main: men kaartik।aaj unkaa phon aayaa thaa।kuchh ed karne ko bulaayaa thaa।

risepshanist: oke!plij sit।

main:- vahaan lage sophe set par baith gayaa।

risepshanist:- kaartik sar,andar jaaea।

main andar pahunchaa।

akaram:-kaartik plij kam।

phir akaram ne mujhe saaraa sin samjhaayaa।

sin kuchh aisaa thaa।mere mobaael kaa rington bajtaa hai।men phon uthaataa hun।

meraa din aa hi gayaa।

Adhmari khwahish dvaaraa aap sabhi paathkon ko samarpit hai।


।anjaan aadmi:- sar meraa gadhaa gadhdhe men gir gayaa gayaa hai।use bachaa lijia।aap saari duniyaa ki madad karte hain।mere gadhe ki bhi madad kar dijia।

main pahunch jaataa hun,shaktimaan ki bhaanti, chakkar maarte maarte।aur apne shart ko khol uske ek baanh se gadhe ko baandhtaa hun aur dusraa baanh pakdakar gadhdhe se baahar aa jaataa hun।phir jor lagaa gadhe ko baahar khinch letaa hun।

vo anjaan aadmi mere pair par gir jaataa hai,aur mujhe bahut bahut shukriyaa bolne lagtaa hai।par main use uthtaa hun aur apne baig se ek nayaa baniyaan detaa hun।aur kahtaa hun,tum bhi king baniyaan hi pahnaa karo aur apne andar ki shakti aur urjaa ko bdhaao।

us ed men meri ekting kaaphi pasand ki gayi thi।aur mujhe ek bachchon ke sho kaa auphar aayaa।men bahut ki khush thaa,ki aakhirkaar meraa bhi din aa hi gayaa।


Written by sushil kumar

तू ही मेरी दुनिया है। tu hi meri duniya hai.

Tu hi meri duniya hai. Shayari तकलीफ मेरे हिस्से की तू मुझे ही सहने दे। आँसू मेरे बादल के तू मुझ पर ही बरसने दे। सारे मुसीबतों क...