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17 Mar 2017

अँधियारी रात

अँधियारी रात थी।मैं अकेला सुनसान सड़क पर रोज की भांति अपनी जोब से वापस लौट रहा था।कान में इअर फोन ठुसा हुआ था।और हनी सिंह के गाने सुनता हुआ,और उस गाने का कुछ स्टेप करता हुआ घर की ओर चला जा रहा था।
       पर  जब मैं अपनी कोलोनी में जाने के लिए सड़क पर मुड़ा,तो मुझे एक जानी पहचानी सी अवाज मेरे पीछे से सुनाई दी।मानो जैसे,किसी ने पुकारा हो,सोनू रूक ना जरा।
      मैं जब पीछे मुड़ कर देखता हूँ,तो पाता हूँ कि,बल्लू मेरा जिगरी दोस्त खड़ा है।
     मैने पूछा,क्या हुआ दोस्त,यहाँ क्यों खड़े हो?और तुम पर ये सफेद पोशाक बहुत ही जंच रहा है।बिल्कुल हीरो की तरह लग रहे हो।
      बल्लू ने कहा,कि हम अपने गाँव जा रहें हैं,तो सोचा कि तुमसे मिलते हुए चलें।
       मैने पूछा,तुम तो हमेशा गाँव अपने माँ बाबूजी के साथ जाते हो।तो आज तुम अकेले ही कैसे जा रहे हो?            बल्लू ने कहा,माँ बाबू जी जरा सा पहले निकल गये हैं,मैं तुमसे मिलने के लिए,तुम्हारा यहाँ इंतजार कर रहा था।
बल्लू की बातें सुन सुन कर पता नहीं क्यों दिल बैठा जा रहा था।मानो अगले ही पल आँसू की धारा आँखो से सैलाब बन कर निकल पड़े।
     फिर मैं बल्लू से जाकर लिपट गया,और बोला,अपना ख्याल रखना दोस्त।
फिर बल्लू ने कहा,चल यार चलता हूँ,तू भी अपना ख्याल रखना।अलविदा।
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         मेरे घर से  लगभग दौ सो कदम पर बल्लू का घर आता था।
          मैं अपने घर का बेल बजाया,और तभी एक बात मेरे दिमाग में ठनका,बल्लू ने मुझे अलविदा क्यों कहा?
          मेरी बीबी शर्मिला ने गेट खोला,और मैं उसके गालों पर चुंबन देकर,हाथ पैर धोने के लिए बाथरूम में गया।
          फिर मैं डायनींग टेबल पर खाने के लिए बैठा।शर्मिला भी साथ में आकर बैठ गई।
           मैने बोला,शर्मिला तुम सो जाओ,मैं आता हूँ ,खाकर।
     शर्मिला ने कहा,मैं भी आपके साथ आज खाऊँगी।
        मैं जरा सा गुश्शा हो गया,और बोला,मेरे लिए इतनी रात तक क्यों इंतजार कर रही थी।तुम्हें खाना समय पर खा लेना चाहिए।
      शर्मिला ने हामी भर कर खाना पड़ोसा,और हमने साथ मिलकर खाना खाया।
     अगली सुबह सात बजे,मेरे मोबाईल फोन पर घंटी बजती है।मैने अधखुली आँखो से फोन के स्कृण को देखा,ये तन्मय अभी फोन क्यों कर रहा है?
      मैने फोन काट दिया।फिर से दुबारा फोन आने पर,मैं जरा सा चिड़चिड़ा कर बोला,क्या हो गया?इतनी सुबह सुबह क्यों फोन कर रहा है।
      उसने बोला,जरा सा बल्लू के घर आना,कुछ बात करनी है।
    मैं बोला,हाँ मैं आता हूँ।
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कहकर फोन काट दिया।
फिर मुझे,कल रात की जोब से लौटते समय वाली घटना याद आ गई।
बल्लू तो गाँव गया है,फिर तन्मय उसके घर पर मुझे क्यों बुला रहा है?
क्या कल रात में बल्लू वापस आ गया?बहुत सारे सवाल मन में गूंज रहे थें।सारे सवालों को मन में लिए,मैं पहुँच गया,बल्लू के घर।वहाँ जाकर देखता हूँ,कि तन्मय बल्लू के घर के बाहर खड़ा है।
    तन्मय ने कहा कि हर रोज जब मैं जोगिंग कर के लौटता था,तब संतोष अंकल रोज सुबह  यहाँ पेपर पढ़ते दिखते थे,और अक्सर हम दोनो में गुप्तगू हो जाया करती थी।और इसी बहाने बल्लू से भी मुलाकात हो जाया करता था।
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       पर आज जब मैं उन्हें यहाँ नहीं पाया,तो उन्हें फोन किया,तो फोन की घंटी की आवाज अंदर से आती हुई सुनाई दी,पर किसी ने उठाई नहीं।फिर मैने बल्लू को फोन किया,पर उसने भी फोन नहीं उठाई,और फोन की घंटी की आवाज फिर से घर के अंदर से आती हुई सुनाई दी।
    तन्मय की बाते सुन मैं जरा सा घड़बड़ा गया।और बोला कि कल रात को मैं बल्लू से कोलोनी के बाहर मिला था।वह...वह तो अपना गाँव जा रहा था।फिर मैने सोचा कि उसने जाते जाते मुझसे अलविदा क्यों कहा था?
       यह सोचते सोचते मेरी आँखें भर आई थी।मैने बोला,तन्मय,बल्लू हो सकता है,सोया हुआ हो।मैं फोन करके देखता हूँ।
      फिर अपने मन में,मैं ईश्वर से प्रर्थना करने लगा कि बल्लू जहाँ भी हो,सुरक्षित हो।
      पर बल्लू ने मेरे फोन को भी नहीं उठाया।और फोन की घंटी की आवाज घर के अंदर से आती हुई सुनाई दे रही थी।फिर मुझे उसकी चिंता होने लगी।और हमने पुलिस को फोन करके सारा हाल बयान किया।
       पुलिस आधे घंटे में वहाँ पहुँच जाती है।फोन ट्रेकर से पुलिस ने पता लगा लिया था,कि दोनो फोन अंदर में ही है।फिर ताबड़तोड़ दरवाजा तोड़ कर जब हम अंदर पहुँचे,तो पुलिस ने हम सभी को आदेश दिया,कि हम कोई भी समान नहीं छुएँ।
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     फिर पुलिस ने एक एक करके सारे  कमरे की तलाशी ली।पर जब हम बल्लू के कमरे के अंदर गयें,तो वहाँ का दृश्य देखकर हम सभी के होश उड़ गयें,और मेरे आँखों से आँसू निकल पड़े।
     मेरा दोस्त पंखे पर बेजान सा लटका हुआ था।उसकी दोनो आँख बाहर निकली हुई थी।बगल में अंटी के मुंह से झाक सा कुछ निकला पड़ा था,और वह भी अचेत सी पड़ी हुइ थी।।और कोने में अंकल अपना एक हाथ छाती पर रखे,बल्लू को देख रहें थे।और वह भी बिल्कुल अचेत थे।
     पुलिस ने सभी की नसें चेक की और सभी को मरा हुआ घोषित किया।अंकल को शायद हर्ट अटैक आया था,और अंटी ज़हर खा कर मरी थी।
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      बल्लू की उमर भी,मेरी जितनी ही थी,लगभग तीस साल।मैं और बल्लू बचपन से ही साथ साथ बड़े हुए थे।साथ में पढ़े,साथ में खेलें,साथ में ही हमने जोब भी हासिल की।पर बल्लू ने अपना जोब,कुछ महीनें में ही छोड़ दिया था।वो कंपनी,जहाँ बल्लू जोब कर रहा था,उसमें बहुत बड़ा घोटाला हुआ था।कंपनी दिवालिया होने की स्थिति में आ गई थी।सारे स्टाफ की निकासी की जा रही थी।मेरे दोस्त बल्लू को भी निकाल दिया गया था।मैं जिस कंपनी में काम कर रहा था,वहाँ नया होने की वजह से,मेरी पहचान उतनी तगड़ी नहीं हुई थी।फिर भी मैं एच आर में जाकर पूछताछ की थी।तो उन्होंने साफ साफ मना कर दिया था,कि अभी कोई वेकेन्सी नहीं है।बल्लू ने तो मानो जोब नहीं करने की जिद्ध ठान के रखी थी।वह बोलता था,जोब ओब मुझसे नहीं होगा,मैं तो बिझनेस करूँगा।
       जब बल्लू ने अपने पिता  से मदद माँगा,तो उसके पिता ने मना कर दिया था, कहा , जोब धूंढो,और मुझसे एक पैसे की उम्मीद मत रखना, कि तुम्हारे बिझनेस में एक पैसा भी मैं लगाऊँगा।बल्लू ने कभी भी मुझसे आकर मदद नहीं माँगा था।पता नहीं क्यों?और मैं भी,अपनी स्थिति को देखते हुए,आगे नहीं बढ़ा था।शायद बल्लू ने सोचा होगा,कि मेरी भी नई नई जोब है,और नई नई शादी हुई है।जिम्मेदारी बढ़ गई है।
        फिर कुछ दिनों के बाद बल्लू और उसके पापा में बहुत ज्यादा ताना तानी रहने लगा।बात यहाँ तक पहुँच गई थी,कि बल्लू ने बँटवारा करने को कह दिया था।
        बल्लू मुझसे सारी बातें शेयर किया करता था।किसी भी दिन जो हमारी मुलाकात नहीं हो पाती,तो वह सारी बातें व्हाट्स एप पर शेयर किया करता था।
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        घटना वाले दिन  बल्लू बहुत ज्यादा ही तिलमिलाया हुआ था।और सुबह से ही बँटवारा करने के लिए झगड़ा कर रहा था।उसके पिता ने भी गुश्शे में आकर बोल दिया,कि वह सारा जमीन जायदाद,और धन दौलत किसी अनाथ आश्रम में दान कर देंगे,पर उसे एक पैसा भी नहीं देंगे।
       मैं बल्लू से मिलने हर दिन की तरह दोपहर एक बजे गया था।बल्लू बहुत गुश्शे में था,और अपनी जिन्दगी से तंग आ गया था।
        मैं उसे हर दिन की तरह आज भी उसे ढांढस बँधवा रहा था।और बोल रहा था,हिम्मत मत हार दोस्त,तेरे बाबू जी एक दिन ज़रूर मान जाएँगे।
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       और तीन बजे जैसे की मुझे अपने जोब पर जाने के लिए घर से निकलना पड़ता है,मैं दो बजे बल्लू के घर से चला आया।
    उस दिन भी उसने आत्महत्या करने से पहले,सारी आपबीती मुझे व्हाट्स एप करके बताया था।पर उस दिन काम का इतना प्रेशर था,कि व्हाट्स एप खोल ही ना सका।
     अगले दिन पुलिस जब पोस्टमोर्टम के लिए अपने साथ सारी बडी ले गई,और मैने घर आकर जब मोबाईल पर नेट ओन किया,तो बल्लू का व्हाट्स एप मुझे मिला।जिसे पढ़कर मैं अवाक् सा रह गया।
     समय कुछ शाम के चार बज कर पाँच मिनट का था।बल्लू ने बोला,पापा आप बँटवारा कर रहें है या नहीं,मैं आखिरी बार पूछ रहा हूँ।
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        बात बिगड़ता देख,माँ भी बिच में आ गई,और संतोष अंकल को समझाने लगी,कि जो बेटा बोलता है,कर दो ना।हमारे बुढ़ापे में,अगर इसने कुछ ऐसा वैसा कर लिया,तो हम कहीं के नहीं रहेंगे।
      संतोष अंकल ने भी चिल्ला कर कह दिया,कि ऐसा नालायक बेटा होने से अच्छा होता,कि हम निःसंतान होते।
     यह सुनकर बल्लू अपने कमरे में चला गया।पीछे पीछे माँ भी गई।बल्लू को उसकी माँ ने बहुत समझाया,कि बेटा,हम बनिये नहीं हैं,हम ठाकुर हैं।हमसे धंधा नहीं संभलेगा।देखो तुम्हारे मामा,धंधे में,घर जायदाद सबकुछ बेचकर रोड पर आ गयें हैं।
      बल्लू का मन पसंद खाना था,आलू का परांठा और टमाटर की चटनी।उसने कहा,माँ आज मुझे,आलू का परांठा खाने की बहुत इच्छा हो रही है।
       बल्लू की माँ खुशी खुशी किचन में आलू का परांठा और चटनी बनाने चली गई।बहुत दिनों के बाद बल्लू ने कुछ फरमाईश की थी,इसलिए माँ भी बहुत खुश थी।
      शाम के पाँच बज गयें थे।माँ आलू का परांठा और चटनी लिए बल्लू के कमरे में पहुँचती है।बल्लू खूब स्वाद लेकर खाता है।
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       माँ पूछती है,कि रात में क्या खाएगा।तो बल्लू ने कहा,जो भी आप प्यार से बनाएँगे, वही खाएँगे।
      माँ किचन में जाकर रात के खाने की तैयारी करने लगी।
      बल्लू ने आगे लिखा,कि मैं अपनी  जिन्दगी से तंग आ गया हूँ,दोस्त।और अब जीने की आस भी नहीं रही है।मैं किसी के भी दबाव में आकर आत्महत्या नहीं कर रहा हूँ,इसके लिए  मैं खुद जिम्मेदार हूँ।मेरे माँ बाबू जी पर कोई एक्शन ना हो,इसलिए मैं ये सारी बातें, अपनी डायरी में लिखकर जा रहा हूँ।
अलविदा,मेरे दोस्त।

यह पढ़कर,मेरा दिल बैठ गया।और कल रात की मेरे दोस्त के द्वारा की गई अलविदा का मतलब अब समझ में आया।https://.blogspoitchingtoreadt.in

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