2 Dec 2019

Ae shakti tu prahar kar

Shayari

ए शक्ति तू प्रहार कर।

kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



अरे भाई!
ये कैसी मर्दानगी है?
और कैसा पुरूषत्व है?
घर पर तो राम है,
गृहरेखा से बाहर निकलते ही
रावण क्यों बन जाता है?

ये किसका अभिशाप है
या कलयुग का प्रभाव है।
वहशी राक्षस यहाँ भटक रहे हैं
अपनी शिकार के तलाश में।

क्यों उनका दिल नहीं पिघलता है?
किसी के दर्द के चीत्कार से।
क्यों उनके आँखों में सैलाब नहीं उमड़ते हैं?
किसी की दयनीय पुकार से।
क्यों उनके हाथ नही काँपते हैं।
किसी को मौत के घाट उतारकर।

जिस नारी से जन्म लिया
उसी नारी का अपमान किया।
जब चाहा रौंदा ,भोग किया
जब मन भरा तो अग्नि को सौंप दिया।
हर नर में दुशासन है छिपा
चाह रहा द्रोपदी का
करने को चीरहरण।

हरि नहीं आएँगे अब
तेरी रक्षा करने को।
तू शस्त्र उठा
कर प्रहार उन दैत्यों पर
जो उठे हैं तेरी भक्षण को।
स्वयं को तू कम ना समझ
तू ही शक्ति
तू ही चण्डिका है।
रौद्र रूप तू दिखा उन दानवों को
जो कभी तेरे प्रतिष्ठा पर खतरा बने।
Rise up





are bhaai!

ye kaisi mardaangi hai?

aur kaisaa purushatv hai?

ghar par to raam hai,

griahrekhaa se baahar nikalte hi

raavan kyon ban jaataa hai?


ye kiskaa abhishaap hai

yaa kalayug kaa prbhaav hai।

vahshi raakshas yahaan bhatak rahe hain

apni shikaar ke talaash men।


kyon unkaa dil nahin pighaltaa hai?

kisi ke dard ke chitkaar se।

kyon unke aankhon men sailaab nahin umdte hain?

kisi ki dayniy pukaar se।

kyon unke haath nahi kaanpte hain।

kisi ko maut ke ghaat utaarakar।


jis naari se janm liyaa

usi naari kaa apmaan kiyaa।

jab chaahaa raundaa ,bhog kiyaa

jab man bharaa to agni ko saump diyaa।

har nar men dushaasan hai chhipaa

chaah rahaa dropdi kaa

karne ko chiraharan।


hari nahin aaange ab

teri rakshaa karne ko।

tu shastr uthaa

kar prhaar un daityon par

jo uthe hain teri bhakshan ko।

svayan ko tu kam naa samajh

tu hi shakti

tu hi chandikaa hai।

raudr rup tu dikhaa un daanvon ko

jo kabhi tere pratishthaa par khatraa bane।


Shayari
Written by sushil kumar

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