3 Nov 2019

मेरा मेहबूब मिल गया।

Shayari

मेरा मेहबूब मिल गया।

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मुझे क्या पता था
तू मेरे जहन में
ना जाने कब से बसा था।
जब भी आंखों को बंद किया करता था
एक धुंधला सा चेहरा
हमें दिख जाया करता था।
मानो जैसे कोई
बहुत ही गहरा रिश्ता हो
उस चेहरे से
मानो जैसे कोई
जन्मों का नाता था।
आज जो तुझे देखा
वो धुंधली सी छवि
साफ होती चली गई।
मेरा हमसफ़र
मेरा महबूब जो मिल गया था
जिसे ढूंढ रहा था
ना जाने कब से
गली गली।


Written by sushil kumar
Shayari

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