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उठ खड़ा हो।

उठ खड़ा हो।

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मेरे तुम्हारे जेहन में
बहुत हैं ऐसे सवाल?
क्यों उपनाम अम्बानी का हुआ इतना विशाल??
क्यों टाटा परिवार को जानते हैं हम सभी आज??

ये कोई एक दो दिन की नहीं है छोटी बात।
बरसों की तपस्या से मिली है उन्हें प्रसाद।
बहुत फर्क पड़ता है
क्या है तुम्हारी सोच?
अम्बर स्पर्श करना हो
तो धरती से ऊपर तो उठ।

झुंड में जो चलने की आदत है
 तो नही है तेरी औकात।
किनारे खड़े रहकर केवल तू
अपने भाग्य पर कर सन्ताप।

बहुत रो लिया
कर लिया अपने किस्मत पर रोष।
उठ खड़ा हो।
जो पाना है
हिमालय की ऊँची चोटी को।

इतना डरा क्यों है?
तरंगों की वेग तेज देखकर।
मोती मिलेगी
तू गोता मार।
मन में दृढ़ विश्वास
रखकर।

असफलताओं से घबड़ा कर कहीं
मंजिल से भटक ना जाना तुम।
सभी को छोड़ते देख तुम
उनके संग ना निकल जाना तुम।
हर हार से एक नई ऊर्जा
तुम अपने अंदर जगा लो यूँ।
अगले कदम पर मंजिल खड़ी हो
तुम्हारी जीत की तुम्हें बधाई देने को।


Written by sushil kumar

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