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मैं हिन्दू नहीं।

मैं हिन्दू नहीं।

kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



मैं हिन्दू नहीं
ना मैं मुसलमान हूँ।
मैं सिख नहीं
ना मैं क्रिस्चियन हूँ।
मैं लावारिस पड़ा एक हाथ हूँ।
मैं लावारिस पड़ा एक हाथ हूँ।

मैं तो मस्त अपनी धुन में
चला जा रहा था कहीं।
वोट की स्याही भी
कहाँ मिटी थी मेरे नाखून से।
पता नहीं कहाँ से कोई 
गीदड़ों की भीड़ उमड़ पड़ी।
पूछा मेरा नाम
और फिर शेर बनकर 
मुझ पर ही टूट पड़ी।
मैं लाख चिल्लाता रहा 
और गिड़गिड़ाता रहा उन शैतानो से।
मैने क्या गुनाह किया?
ये नाम को मैने चुनके।

पर सुना नहीं किसी ने भी
किसी ने मुझ पर न रहम की।
जिसे जो मिला
उससे वार किया मेरे शरीर पर।
धारदार हथियारों को घुसेड़ दिया
मेरे जिस्म में।
और फिर क्या लगे हमें
लातों से कूटने।
मेरे खून के फव्वारों से
खेला था उन्होंने होलिका दहन।
मेरे अधमरे शरीर को
क्या खूब रौंदा था उन हैवानो ने।
इससे भी जब उनके दिलोदिमाग में 
शुकुन ना आन पड़ा।
एक हाथ को ही काट कर
धड़ से अलग कर 
कहीं दूर उड़ाया।

लोग वहाँ तमाशबीन बन
खड़े हो फ़िल्म देख रहे।
मानो हकीकत की दृश्य देख कर 
उन्हें रोमांच आ रहा हो और बड़ी।

आज का जनतंत्र देख कर
मैं सिर्फ इतना ही केवल पूछ रहा।
क्या इसी दिन देखने को
मोहन ने रचा था 
लोकतंत्र का महान किस्सा।
कुछ दिनों तक न्यूज़ पैनलों में होंगे 
खूब गरमा गरम बहस और जोरदार चर्चा।
कुछ लोग उतर जाएँगे सड़क पर
लेकर हाथ में कैंडल और बैनर पोस्टर।
पर फिर क्या????
फिर से लोग भूल जाएँगे
कुम्भकर्ण की नींद सो जाएँगे।
जब तक फिर से ना घटेगी
हिला देनेवाली कोई नहीं घटना।




Written by sushil kumar


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