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मैं तो हार चुका था।

मैं तो हार चुका था।

kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।


मैं तो हार चुका था
ये आखिरी चाल औपचारिकता मात्र थी।
ये हार
केवल एक हार नहीं।
बल्कि कुछ सबक सिखाने वाली थी।
कुछ चाले समझी थी
पर अभी भी
बहुत कुछ समझना बाकि था।
और बहुत कुछ परखना भी बाकि था।

पर जीत की तलब मेरे दिल में
बहुत जोर पकड़ रखी थी।
मंजिल को पाने की ललक में
प्रयासों को मैने और भी तेज कर दी।
भूख प्यास
दिन रात का कुछ भी ख्याल ना रहा।
बस कुछ ध्यान था
तो वो बस मेरे लक्ष्य का।
ऐसी स्थिति जो हो जाए
तो समझ लेना कि
तुम्हारी मंजिल तुम्हें मिलनी वाली है।



Written by sushil kumar


लोग आज बदल गए हैं।

लोग आज बदल गए हैं।

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लोग आज बदल गए हैं।
अपनी सफलता को भूल
दूसरे की असफलता पर जश्न मनाने से
कहाँ चूक रहे हैं लोग।
दुसरो के दुख को देख
आनन्द से गद गद हुए जा रहे हैं ये लोग।

वाकई में
लोग आज बदल गए हैं।

अपनी स्त्री की सुंदरता पर
कभी मोहित हो जाने वाला पति।
उसकी सुंदरता का बखान करते
ना थकने वाला पति।
आज चुप है।
क्यों?
क्योंकि उसे आज दुसरो की स्त्री
ज्यादा आकर्षित करने लगी हैं।
वो सात जन्मों का साथ निभाने का
कभी वादा किया था।
एक जन्म में ही ऊबते दिख रहे हैं लोग।

लोग आज बदल गए हैं।

दूसरों की छोटी सी कुटिया को भी देखकर
उसे उसके महल को टक्कर दे रहे हों
ऐसा सोचकर जल भून जाते हैं।
उसे उस कुटिया में रहने वाले लोग
ज्यादा खुश और सन्तुष्ट नज़र आते हैं।
और उसे ये बर्दास्त से बाहर हो जाता है
और उस कुटिया को बर्बाद करने को
आतुर से दिखते हैं लोग।

सच में।
लोग आज बदल गए हैं।

अपने बच्चे की भूल को छिपाने को
लोग आज कत्ल करने में भी
कहाँ हिचकिचा रहे हैं?
खून तो लोग ऐसे बहा रहे हैं।
मानो पानी से भी सस्ती हो चुकी हो आज।

लोग आज बदल गए हैं।

अपना हिस्सा पाने को
बेटा बाप का
भाई भाई का
रक्त से नहाने में संकोच नहीं कर रहा है।
मानवता का निशान
दुनिया से आज मिटता हुआ
आभास हो रहा है।

सही में।
लोग आज सही में बदल गए हैं।


Written by sushil kumar

उठ खड़ा हो।

उठ खड़ा हो।

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मेरे तुम्हारे जेहन में
बहुत हैं ऐसे सवाल?
क्यों उपनाम अम्बानी का हुआ इतना विशाल??
क्यों टाटा परिवार को जानते हैं हम सभी आज??

ये कोई एक दो दिन की नहीं है छोटी बात।
बरसों की तपस्या से मिली है उन्हें प्रसाद।
बहुत फर्क पड़ता है
क्या है तुम्हारी सोच?
अम्बर स्पर्श करना हो
तो धरती से ऊपर तो उठ।

झुंड में जो चलने की आदत है
 तो नही है तेरी औकात।
किनारे खड़े रहकर केवल तू
अपने भाग्य पर कर सन्ताप।

बहुत रो लिया
कर लिया अपने किस्मत पर रोष।
उठ खड़ा हो।
जो पाना है
हिमालय की ऊँची चोटी को।

इतना डरा क्यों है?
तरंगों की वेग तेज देखकर।
मोती मिलेगी
तू गोता मार।
मन में दृढ़ विश्वास
रखकर।

असफलताओं से घबड़ा कर कहीं
मंजिल से भटक ना जाना तुम।
सभी को छोड़ते देख तुम
उनके संग ना निकल जाना तुम।
हर हार से एक नई ऊर्जा
तुम अपने अंदर जगा लो यूँ।
अगले कदम पर मंजिल खड़ी हो
तुम्हारी जीत की तुम्हें बधाई देने को।


Written by sushil kumar

सामना करना सीखो।


सामना करना सीखो।

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मैं स्वयं के सवालों में कुछ ऐसा जा घिरा।
मानो अभिमन्यु कौरवों के चक्रव्यूह में जा फँसा।
हर सवाल मेरे अस्तित्व को था झकझोर रहा।
मेरी परछाई भी मेरा साथ मानो था छोड़ रहा।
पर मैं भी अपने जिद्द पर अडिग खड़ा रहा।
हर चुनौती को मैने सहज स्वीकार किया।
आज जो मैं डरकर कहीं छुप भी गया।
कल मैं स्वयं से नज़र कैसे मिला पाऊँगा??


Written by sushil kumar




माँ का विश्वास।।

माँ का विश्वास।


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सारी दुनिया चाहे इधर से उधर हो जाए
चाँद दिन में निकल आए
और सूरज सुबह में डूब जाए।
पर एक इंसान है इस जग में
जो अभी भी एक दृढ़ उम्मीद की लौ  है
मन में जगाए।
कि मेरा लाल!
मेरा बेटा!
एक दिन सफलता की ऊँचाइयों को जरूर छूएगा।
वो कोई और नहीं।
तुम्हारी माँ है।

चाहे लाख जग वाले
उसे ये विश्वास है दिलाए।
तेरा बेटा नालायक है।
किसी काम का नहीं है माँए।
पर उसके आस्था को
कहाँ से कोई हिला पाए।
क्योंकि उसे पता है।
उसका छोरा लाखों में एक है।
वो कोई और नहीं
तुम्हारी माँ है।

तू कोशिश कर कर के
परेशान हुए जाए।
सफलता के किनारे को छूते छूते
छूट जाए।
और तू डगमगाते हुए जो
घर पहुँच जाए।
पर तेरी माँ का
तेरे पर यकीन देख
तेरा हौसला के पंख
फिर से फड़फड़ाए।
और फिर क्या?
तेरे लगन और मेहनत के संग
तेरी माँ के दुआ का मेल हो जाए।
कामयाबी तेरे कदम चूमने को
अधीर हो छटपटाए।

ये कुछ और नहीं।
तेरी माँ का ही जादू है।



Written by sushil kumar

मैं हिन्दू नहीं।

मैं हिन्दू नहीं।

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मैं हिन्दू नहीं
ना मैं मुसलमान हूँ।
मैं सिख नहीं
ना मैं क्रिस्चियन हूँ।
मैं लावारिस पड़ा एक हाथ हूँ।
मैं लावारिस पड़ा एक हाथ हूँ।

मैं तो मस्त अपनी धुन में
चला जा रहा था कहीं।
वोट की स्याही भी
कहाँ मिटी थी मेरे नाखून से।
पता नहीं कहाँ से कोई 
गीदड़ों की भीड़ उमड़ पड़ी।
पूछा मेरा नाम
और फिर शेर बनकर 
मुझ पर ही टूट पड़ी।
मैं लाख चिल्लाता रहा 
और गिड़गिड़ाता रहा उन शैतानो से।
मैने क्या गुनाह किया?
ये नाम को मैने चुनके।

पर सुना नहीं किसी ने भी
किसी ने मुझ पर न रहम की।
जिसे जो मिला
उससे वार किया मेरे शरीर पर।
धारदार हथियारों को घुसेड़ दिया
मेरे जिस्म में।
और फिर क्या लगे हमें
लातों से कूटने।
मेरे खून के फव्वारों से
खेला था उन्होंने होलिका दहन।
मेरे अधमरे शरीर को
क्या खूब रौंदा था उन हैवानो ने।
इससे भी जब उनके दिलोदिमाग में 
शुकुन ना आन पड़ा।
एक हाथ को ही काट कर
धड़ से अलग कर 
कहीं दूर उड़ाया।

लोग वहाँ तमाशबीन बन
खड़े हो फ़िल्म देख रहे।
मानो हकीकत की दृश्य देख कर 
उन्हें रोमांच आ रहा हो और बड़ी।

आज का जनतंत्र देख कर
मैं सिर्फ इतना ही केवल पूछ रहा।
क्या इसी दिन देखने को
मोहन ने रचा था 
लोकतंत्र का महान किस्सा।
कुछ दिनों तक न्यूज़ पैनलों में होंगे 
खूब गरमा गरम बहस और जोरदार चर्चा।
कुछ लोग उतर जाएँगे सड़क पर
लेकर हाथ में कैंडल और बैनर पोस्टर।
पर फिर क्या????
फिर से लोग भूल जाएँगे
कुम्भकर्ण की नींद सो जाएँगे।
जब तक फिर से ना घटेगी
हिला देनेवाली कोई नहीं घटना।




Written by sushil kumar


ए दोस्त।

ए दोस्त।

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ए दोस्त
कभी भी किसी से
दिलोजान से प्यार ना करना।
जो प्यार जो करना
तो रब से ये फरियाद जरूर करना।

कि जो ऐसा प्यार
तूने मेरे झोली में जो डाली है।
लख लख शुक्र है तेरा
जो तेरी छवि
मेरे महबूब में नज़र आई है।

बस एक आखिरी दुआ
मेरा कबूल करले मेरे मौला तू।
कभी भी मुझे उससे
जुदा करने की ना सोचना तुम।
वरना वो पल
आखिरी क्षण होगी मेरे जीवन की।
जिस दिन रुख्सत होगी
मेरे दिल से जान मेरी।


Written by sushil kumar

मैं किसी का गुलाम नहीं।

मैं किसी का गुलाम नहीं।

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ये गलतफहमी दिल में ना पालना कभी
कि तुम्हारा गुलाम हूँ मैं।
मेरी सोच में क्रांति की ज्वाला है
नहीं डरता हूँ किसी तूफान से मैं।
मेरी ताकत मेरे बाहों में नहीं
मेरी हौसलों में छिपी हुई है।
चाहे लाख जख्म दे दो मेरे जिस्म को
पर हिला नहीं सकोगे कभी मेरे जज्बे को।
मुझे अकेला समझकर हुँकार मत भरना कभी
मैं डरता नहीं तुम्हारे गीदड़ धमकी से।
झुंड में शिकार करने की आदत होगी तुम्हारी
मैं तो अकेला ही चल पड़ता हूँ
बब्बर शेर की आखेट करने के लिए।

Written by sushil kumar

तुम लिखो कुछ ऐसा

तुम लिखो कुछ ऐसा kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। तुम लिखो कुछ ऐसा जिससे शांत सरोवर की शिथिल लहरों में एक उफान ...