29 Sep 2019

Mai to haar chuka tha.

Shayari

मैं तो हार चुका था।

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मैं तो हार चुका था
ये आखिरी चाल औपचारिकता मात्र थी।
ये हार
केवल एक हार नहीं।
बल्कि कुछ सबक सिखाने वाली थी।
कुछ चाले समझी थी
पर अभी भी
बहुत कुछ समझना बाकि था।
और बहुत कुछ परखना भी बाकि था।

पर जीत की तलब मेरे दिल में
बहुत जोर पकड़ रखी थी।
मंजिल को पाने की ललक में
प्रयासों को मैने और भी तेज कर दी।
भूख प्यास
दिन रात का कुछ भी ख्याल ना रहा।
बस कुछ ध्यान था
तो वो बस मेरे लक्ष्य का।
ऐसी स्थिति जो हो जाए
तो समझ लेना कि
तुम्हारी मंजिल तुम्हें मिलनी वाली है।







main to haar chukaa thaa

ye aakhiri chaal aupchaariktaa maatr thi।

ye haar

keval ek haar nahin।

balki kuchh sabak sikhaane vaali thi।

kuchh chaale samjhi thi

par abhi bhi

bahut kuchh samajhnaa baaki thaa।

aur bahut kuchh parakhnaa bhi baaki thaa।


par jit ki talab mere dil men

bahut jor pakd rakhi thi।

manjil ko paane ki lalak men

pryaason ko maine aur bhi tej kar di।

bhukh pyaas

din raat kaa kuchh bhi khyaal naa rahaa।

bas kuchh dhyaan thaa

to vo bas mere lakshy kaa।

aisi sthiti jo ho jaaa

to samajh lenaa ki

tumhaari manjil tumhen milni vaali hai।




Written by sushil kumar

Shayari


27 Sep 2019

Log aaj badal gae hain.

Shayari

लोग आज बदल गए हैं।

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लोग आज बदल गए हैं।
अपनी सफलता को भूल
दूसरे की असफलता पर जश्न मनाने से
कहाँ चूक रहे हैं लोग।
दुसरो के दुख को देख
आनन्द से गद गद हुए जा रहे हैं ये लोग।

वाकई में
लोग आज बदल गए हैं।

अपनी स्त्री की सुंदरता पर
कभी मोहित हो जाने वाला पति।
उसकी सुंदरता का बखान करते
ना थकने वाला पति।
आज चुप है।
क्यों?
क्योंकि उसे आज दुसरो की स्त्री
ज्यादा आकर्षित करने लगी हैं।
वो सात जन्मों का साथ निभाने का
कभी वादा किया था।
एक जन्म में ही ऊबते दिख रहे हैं लोग।

लोग आज बदल गए हैं।

दूसरों की छोटी सी कुटिया को भी देखकर
उसे उसके महल को टक्कर दे रहे हों
ऐसा सोचकर जल भून जाते हैं।
उसे उस कुटिया में रहने वाले लोग
ज्यादा खुश और सन्तुष्ट नज़र आते हैं।
और उसे ये बर्दास्त से बाहर हो जाता है
और उस कुटिया को बर्बाद करने को
आतुर से दिखते हैं लोग।

सच में।
लोग आज बदल गए हैं।

अपने बच्चे की भूल को छिपाने को
लोग आज कत्ल करने में भी
कहाँ हिचकिचा रहे हैं?
खून तो लोग ऐसे बहा रहे हैं।
मानो पानी से भी सस्ती हो चुकी हो आज।

लोग आज बदल गए हैं।

अपना हिस्सा पाने को
बेटा बाप का
भाई भाई का
रक्त से नहाने में संकोच नहीं कर रहा है।
मानवता का निशान
दुनिया से आज मिटता हुआ
आभास हो रहा है।

सही में।
लोग आज सही में बदल गए हैं।










log aaj badal gaye hain।

apni saphaltaa ko bhul

dusre ki asaphaltaa par jashn manaane se

kahaan chuk rahe hain log।

dusro ke dukh ko dekh

aanand se gad gad hua jaa rahe hain ye log।


vaakaayi men

log aaj badal gaye hain।


apni stri ki sundartaa par

kabhi mohit ho jaane vaalaa pati।

uski sundartaa kaa bakhaan karte

naa thakne vaalaa pati।

aaj chup hai।

kyon?

kyonki use aaj dusro ki stri

jyaadaa aakarshit karne lagi hain।

vo saat janmon kaa saath nibhaane kaa

kabhi vaadaa kiyaa thaa।

ek janm men hi ubte dikh rahe hain log।


log aaj badal gaye hain।


dusron ki chhoti si kutiyaa ko bhi dekhakar

use uske mahal ko takkar de rahe hon

aisaa sochakar jal bhun jaate hain।

use us kutiyaa men rahne vaale log

jyaadaa khush aur santusht njar aate hain।

aur use ye bardaast se baahar ho jaataa hai

aur us kutiyaa ko barbaad karne ko

aatur se dikhte hain log।


sach men।

log aaj badal gaye hain।


apne bachche ki bhul ko chhipaane ko

log aaj katl karne men bhi

kahaan hichakichaa rahe hain?

khun to log aise bahaa rahe hain।

maano paani se bhi sasti ho chuki ho aaj।


log aaj badal gaye hain।


apnaa hissaa paane ko

betaa baap kaa

bhaai bhaai kaa

rakt se nahaane men sankoch nahin kar rahaa hai।

maanavtaa kaa nishaan

duniyaa se aaj mittaa huaa

aabhaas ho rahaa hai।


sahi men।

log aaj sahi men badal gaye hain।



Written by sushil kumar

Shayari

26 Sep 2019

Uth khada ho.

Shayari

उठ खड़ा हो।

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मेरे तुम्हारे जेहन में
बहुत हैं ऐसे सवाल?
क्यों उपनाम अम्बानी का हुआ इतना विशाल??
क्यों टाटा परिवार को जानते हैं हम सभी आज??

ये कोई एक दो दिन की नहीं है छोटी बात।
बरसों की तपस्या से मिली है उन्हें प्रसाद।
बहुत फर्क पड़ता है
क्या है तुम्हारी सोच?
अम्बर स्पर्श करना हो
तो धरती से ऊपर तो उठ।

झुंड में जो चलने की आदत है
 तो नही है तेरी औकात।
किनारे खड़े रहकर केवल तू
अपने भाग्य पर कर सन्ताप।

बहुत रो लिया
कर लिया अपने किस्मत पर रोष।
उठ खड़ा हो।
जो पाना है
हिमालय की ऊँची चोटी को।

इतना डरा क्यों है?
तरंगों की वेग तेज देखकर।
मोती मिलेगी
तू गोता मार।
मन में दृढ़ विश्वास
रखकर।

असफलताओं से घबड़ा कर कहीं
मंजिल से भटक ना जाना तुम।
सभी को छोड़ते देख तुम
उनके संग ना निकल जाना तुम।
हर हार से एक नई ऊर्जा
तुम अपने अंदर जगा लो यूँ।
अगले कदम पर मंजिल खड़ी हो
तुम्हारी जीत की तुम्हें बधाई देने को।











mere tumhaare jehan men

bahut hain aise savaal?

kyon upnaam ambaani kaa huaa etnaa vishaal??

kyon taataa parivaar ko jaante hain ham sabhi aaj??


ye koi ek do din ki nahin hai chhoti baat।

barson ki tapasyaa se mili hai unhen prsaad।

bahut phark pdtaa hai

kyaa hai tumhaari soch?

ambar sparsh karnaa ho

to dharti se upar to uth।


jhund men jo chalne ki aadat hai

 to nahi hai teri aukaat।

kinaare khde rahakar keval tu

apne bhaagy par kar santaap।


bahut ro liyaa

kar liyaa apne kismat par rosh।

uth khdaa ho।

jo paanaa hai

himaalay ki unchi choti ko।


etnaa daraa kyon hai?

tarangon ki veg tej dekhakar।

moti milegi

tu gotaa maar।

man men dridh vishvaas

rakhakar।


asaphaltaaon se ghabdaa kar kahin

manjil se bhatak naa jaanaa tum।

sabhi ko chhodte dekh tum

unke sang naa nikal jaanaa tum।

har haar se ek nayi urjaa

tum apne andar jagaa lo yun।

agle kadam par manjil khdi ho

tumhaari jit ki tumhen badhaai dene ko।



Written by sushil kumar

Shayari

25 Sep 2019

Samana karna sikho

Shayari

सामना करना सीखो।

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मैं स्वयं के सवालों में कुछ ऐसा जा घिरा।
मानो अभिमन्यु कौरवों के चक्रव्यूह में जा फँसा।
हर सवाल मेरे अस्तित्व को था झकझोर रहा।
मेरी परछाई भी मेरा साथ मानो था छोड़ रहा।
पर मैं भी अपने जिद्द पर अडिग खड़ा रहा।
हर चुनौती को मैने सहज स्वीकार किया।
आज जो मैं डरकर कहीं छुप भी गया।
कल मैं स्वयं से नज़र कैसे मिला पाऊँगा??






main svayan ke savaalon men kuchh aisaa jaa ghiraa।

maano abhimanyu kaurvon ke chakravyuh men jaa phnsaa।

har savaal mere astitv ko thaa jhakjhor rahaa।

meri parchhaai bhi meraa saath maano thaa chhod rahaa।

par main bhi apne jidd par adig khdaa rahaa।

har chunauti ko maine sahaj svikaar kiyaa।

aaj jo main darakar kahin chhup bhi gayaa।

kal main svayan se njar kaise milaa paaungaa??



Written by sushil kumar

Shayari



19 Sep 2019

Maa ka vishwas.

Shayari

माँ का विश्वास।


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सारी दुनिया चाहे इधर से उधर हो जाए
चाँद दिन में निकल आए
और सूरज सुबह में डूब जाए।
पर एक इंसान है इस जग में
जो अभी भी एक दृढ़ उम्मीद की लौ  है
मन में जगाए।
कि मेरा लाल!
मेरा बेटा!
एक दिन सफलता की ऊँचाइयों को जरूर छूएगा।
वो कोई और नहीं।
तुम्हारी माँ है।

चाहे लाख जग वाले
उसे ये विश्वास है दिलाए।
तेरा बेटा नालायक है।
किसी काम का नहीं है माँए।
पर उसके आस्था को
कहाँ से कोई हिला पाए।
क्योंकि उसे पता है।
उसका छोरा लाखों में एक है।
वो कोई और नहीं
तुम्हारी माँ है।

तू कोशिश कर कर के
परेशान हुए जाए।
सफलता के किनारे को छूते छूते
छूट जाए।
और तू डगमगाते हुए जो
घर पहुँच जाए।
पर तेरी माँ का
तेरे पर यकीन देख
तेरा हौसला के पंख
फिर से फड़फड़ाए।
और फिर क्या?
तेरे लगन और मेहनत के संग
तेरी माँ के दुआ का मेल हो जाए।
कामयाबी तेरे कदम चूमने को
अधीर हो छटपटाए।

ये कुछ और नहीं।
तेरी माँ का ही जादू है।







saari duniyaa chaahe edhar se udhar ho jaaa

chaand din men nikal aaa

aur suraj subah men dub jaaa।

par ek ensaan hai es jag men

jo abhi bhi ek dridh ummid ki lau  hai

man men jagaaa।

ki meraa laal!

meraa betaa!

ek din saphaltaa ki unchaaeyon ko jarur chhuagaa।

vo koi aur nahin।

tumhaari maan hai।


chaahe laakh jag vaale

use ye vishvaas hai dilaaa।

teraa betaa naalaayak hai।

kisi kaam kaa nahin hai maanaye।

par uske aasthaa ko

kahaan se koi hilaa paaa।

kyonki use pataa hai।

uskaa chhoraa laakhon men ek hai।

vo koi aur nahin

tumhaari maan hai।


tu koshish kar kar ke

pareshaan hua jaaa।

saphaltaa ke kinaare ko chhute chhute

chhut jaaa।

aur tu dagamgaate hua jo

ghar pahunch jaaa।

par teri maan kaa

tere par yakin dekh

teraa hauslaa ke pankh

phir se phdaphdaaa।

aur phir kyaa?

tere lagan aur mehanat ke sang

teri maan ke duaa kaa mel ho jaaa।

kaamyaabi tere kadam chumne ko

adhir ho chhataptaaa।


ye kuchh aur nahin।

teri maan kaa hi jaadu hai।




Written by sushil kumar

Shayari

15 Sep 2019

Mai hindu nahin.

Shayari

मैं हिन्दू नहीं।

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मैं हिन्दू नहीं
ना मैं मुसलमान हूँ।
मैं सिख नहीं
ना मैं क्रिस्चियन हूँ।
मैं लावारिस पड़ा एक हाथ हूँ।
मैं लावारिस पड़ा एक हाथ हूँ।

मैं तो मस्त अपनी धुन में
चला जा रहा था कहीं।
वोट की स्याही भी
कहाँ मिटी थी मेरे नाखून से।
पता नहीं कहाँ से कोई 
गीदड़ों की भीड़ उमड़ पड़ी।
पूछा मेरा नाम
और फिर शेर बनकर 
मुझ पर ही टूट पड़ी।
मैं लाख चिल्लाता रहा 
और गिड़गिड़ाता रहा उन शैतानो से।
मैने क्या गुनाह किया?
ये नाम को मैने चुनके।

पर सुना नहीं किसी ने भी
किसी ने मुझ पर न रहम की।
जिसे जो मिला
उससे वार किया मेरे शरीर पर।
धारदार हथियारों को घुसेड़ दिया
मेरे जिस्म में।
और फिर क्या लगे हमें
लातों से कूटने।
मेरे खून के फव्वारों से
खेला था उन्होंने होलिका दहन।
मेरे अधमरे शरीर को
क्या खूब रौंदा था उन हैवानो ने।
इससे भी जब उनके दिलोदिमाग में 
शुकुन ना आन पड़ा।
एक हाथ को ही काट कर
धड़ से अलग कर 
कहीं दूर उड़ाया।

लोग वहाँ तमाशबीन बन
खड़े हो फ़िल्म देख रहे।
मानो हकीकत की दृश्य देख कर 
उन्हें रोमांच आ रहा हो और बड़ी।

आज का जनतंत्र देख कर
मैं सिर्फ इतना ही केवल पूछ रहा।
क्या इसी दिन देखने को
मोहन ने रचा था 
लोकतंत्र का महान किस्सा।
कुछ दिनों तक न्यूज़ पैनलों में होंगे 
खूब गरमा गरम बहस और जोरदार चर्चा।
कुछ लोग उतर जाएँगे सड़क पर
लेकर हाथ में कैंडल और बैनर पोस्टर।
पर फिर क्या????
फिर से लोग भूल जाएँगे
कुम्भकर्ण की नींद सो जाएँगे।
जब तक फिर से ना घटेगी
हिला देनेवाली कोई नहीं घटना।







main hindu nahin

naa main musalmaan hun।

main sikh nahin

naa main krischiyan hun।

main laavaaris pdaa ek haath hun।

main laavaaris pdaa ek haath hun।


main to mast apni dhun men

chalaa jaa rahaa thaa kahin।

vot ki syaahi bhi

kahaan miti thi mere naakhun se।

pataa nahin kahaan se koi

giddon ki bhid umd pdi।

puchhaa meraa naam

aur phir sher banakar

mujh par hi tut pdi।

main laakh chillaataa rahaa

aur gidgidaataa rahaa un shaitaano se।

maine kyaa gunaah kiyaa?

ye naam ko maine chunke।


par sunaa nahin kisi ne bhi

kisi ne mujh par n raham ki।

jise jo milaa

usse vaar kiyaa mere sharir par।

dhaardaar hathiyaaron ko ghused diyaa

mere jism men।

aur phir kyaa lage hamen

laaton se kutne।

mere khun ke phavvaaron se

khelaa thaa unhonne holikaa dahan।

mere adhamre sharir ko

kyaa khub raundaa thaa un haivaano ne।

esse bhi jab unke dilodimaag men

shukun naa aan pdaa।

ek haath ko hi kaat kar

dhd se alag kar

kahin dur udaayaa।


log vahaan tamaashbin ban

khde ho film dekh rahe।

maano hakikat ki driashy dekh kar

unhen romaanch aa rahaa ho aur bdi।


aaj kaa janatantr dekh kar

main sirph etnaa hi keval puchh rahaa।

kyaa esi din dekhne ko

mohan ne rachaa thaa

lokatantr kaa mahaan kissaa।

kuchh dinon tak nyuj painlon men honge

khub garmaa garam bahas aur jordaar charchaa।

kuchh log utar jaaange sdak par

lekar haath men kaindal aur bainar postar।

par phir kyaa????

phir se log bhul jaaange

kumbhakarn ki nind so jaaange।

jab tak phir se naa ghategi

hilaa denevaali koi nahin ghatnaa।





Written by sushil kumar

Shayari

14 Sep 2019

Ae dost

Shayari

ए दोस्त।

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ए दोस्त
कभी भी किसी से
दिलोजान से प्यार ना करना।
जो प्यार जो करना
तो रब से ये फरियाद जरूर करना।

कि जो ऐसा प्यार
तूने मेरे झोली में जो डाली है।
लख लख शुक्र है तेरा
जो तेरी छवि
मेरे महबूब में नज़र आई है।

बस एक आखिरी दुआ
मेरा कबूल करले मेरे मौला तू।
कभी भी मुझे उससे
जुदा करने की ना सोचना तुम।
वरना वो पल
आखिरी क्षण होगी मेरे जीवन की।
जिस दिन रुख्सत होगी
मेरे दिल से जान मेरी।









aye dost

kabhi bhi kisi se

dilojaan se pyaar naa karnaa।

jo pyaar jo karnaa

to rab se ye phariyaad jarur karnaa।


ki jo aisaa pyaar

tune mere jholi men jo daali hai।

lakh lakh shukr hai teraa

jo teri chhavi

mere mahbub men njar aai hai।


bas ek aakhiri duaa

meraa kabul karle mere maulaa tu।

kabhi bhi mujhe usse

judaa karne ki naa sochnaa tum।

varnaa vo pal

aakhiri kshan hogi mere jivan ki।

jis din rukhsat hogi

mere dil se jaan meri।

Written by sushil kumar

Shayari

Main kisi ka gulam nahin.

Shayari

मैं किसी का गुलाम नहीं।

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ये गलतफहमी दिल में ना पालना कभी
कि तुम्हारा गुलाम हूँ मैं।
मेरी सोच में क्रांति की ज्वाला है
नहीं डरता हूँ किसी तूफान से मैं।
मेरी ताकत मेरे बाहों में नहीं
मेरी हौसलों में छिपी हुई है।
चाहे लाख जख्म दे दो मेरे जिस्म को
पर हिला नहीं सकोगे कभी मेरे जज्बे को।
मुझे अकेला समझकर हुँकार मत भरना कभी
मैं डरता नहीं तुम्हारे गीदड़ धमकी से।
झुंड में शिकार करने की आदत होगी तुम्हारी
मैं तो अकेला ही चल पड़ता हूँ
बब्बर शेर की आखेट करने के लिए।









ye galataphahmi dil men naa paalnaa kabhi

ki tumhaaraa gulaam hun main।

meri soch men kraanti ki jvaalaa hai

nahin dartaa hun kisi tuphaan se main।

meri taakat mere baahon men nahin

meri hauslon men chhipi hui hai।

chaahe laakh jakhm de do mere jism ko

par hilaa nahin sakoge kabhi mere jajbe ko।

mujhe akelaa samajhakar hunkaar mat bharnaa kabhi

main dartaa nahin tumhaare gidd dhamki se।

jhund men shikaar karne ki aadat hogi tumhaari

main to akelaa hi chal pdtaa hun

babbar sher ki aakhet karne ke lia।


Written by sushil kumar

Shayari

Badhali

Shayari ऐसी बदहाली आज दिल पे जो छाई है। मन  है बदहवास और आँखों में नमी आई है। हर वक्त बस ईश्वर से यही दुहाई है। खैर रखना उनकी, मेरी ...