Email subscription

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

एक छोटा आनन्द गृह।🏠

एक छोटा आनन्द गृह।🏠

kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।




माँ पापा आपका कर्ज़ मैं
कभी ना उतार पाऊँगा।
आपके निस्वार्थ प्रेम का भाव
मैं ना लगा पाऊँगा।
चाहता था कुछ ऐसा करना
जहाँ आपका साथ मुकम्मल बना रहता सदा।
सुबह होती आपके चरण स्पर्श कर
दिन अपना कामयाब बनाता जाता सदा।
आपकी खुशी देख मैं हर्षित होता
कोई गम आपके समीप ना आने देता सदा।

पर ऐसा हो ना पाया
मेरे कर्म ने आपसे दूर कराया।
नौकरी करने के खातिर मैं
अपना घर छोड़,परदेस में कदम जमाया।
मेरे दिल तो एक क्षण चाहा था
नहीं जाऊँ आपको छोड़ के।
माँ बाबूजी अगर आप 
एक बार जो बोल दिए होते,
नहीं जाता कहीं ये आपका साया।
पर आप भी बहुत चालाक निकले
यहाँ भी बाजी मार ली आपने।
अपने दिल पर पत्थर रख कर
नहीं छलकने दिया आंसू अपने नयन से।
अपने दिल के टुकड़े को 
किया खुद से आपने यूँ अलग।
रो रोकर बेहाल हुए तब
जब आपको हुई मेरी फिकर।
मुझे आपकी याद ना आए
ऐसा दिन कोई नहीं आया है।
हर सुबह आपकी खैरियत की रब से
दिल से दुआ फरमाया है।

मेरे जीवन को सरस करने को
आपने शादी मेरी रचवा डाली।
मेरा ख्याल हमेशा रखने को
एक अर्धांगिनी मेरी बना डाली।
आप चाहते थे,कि मैं आगे बढ़ूँ
करूँ मैं आपका नाम रोशन।
आपके संस्कार का करिश्मा था ये
जो आज पहुँचा हूँ इतने ऊपर।
आज मेरे पास सबकुछ है माँ बाबूजी
पर आपका साथ नहीं है मेरे जीवन में।
बीबी है जो जान छिड़कती है मुझपर
पर कान उमेठने वाले नहीं है आपलोग।
आजाओ भी ना साथ में  आपलोग
छोड़कर दुनियादारी सारी।
पापा,माँ,मैं और मेरी अर्धांगिनी
मिलकर बसाएँगे हम 
एक छोटा आनन्द गृह।


Written by sushil kumar

No comments:

मैं हिन्दू नहीं।

मैं हिन्दू नहीं। kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। मैं हिन्दू नहीं ना मैं मुसलमान हूँ। मैं सिख नहीं ना मैं क...