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मैं अकेला रह गया हूँ।

मैं अकेला रह गया हूँ।

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मैं अकेला रह गया हूँ
बिल्कुल अकेला।
ना ही किसी को मेरी फिक्र है
ना ही किसी को मेरी खबर।
बस हर कोई अपनी ही दुनिया में
मशगूल हो गया है।
किसी को भी इतनी फुरसत नहीं
कि कोई मेरी खैरियत तक ले सके।
यहाँ तक कि मेरे अपने भी
मुझे अपनी दायरे से हटा दिए हैं।

कभी कभी तो खुद को मिटा देने का
मन करता है।
आखिर साँस लें भी तो
किसके लिए।
मेरी दुनिया जो है
मुझसे ही शुरू और
मुझपर ही
खत्म भी तो हो जाती है।
जिंदगी अगर जिए भी तो
किसके लिए।

बहुत अकेला हो गया हूँ
कोई बचालो
मुझे आकर।

Written by sushil kumar

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