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कार्यप्रणाली से हैरान परेशान हूँ।

कार्यप्रणाली से हैरान परेशान हूँ।

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मेरी भी पत्नी है
मैं भी उससे प्यार करता हूँ।
पर शायद मेरी पैरवी उतनी जबरदस्त नहीं होगी
इसलिए मुझे मेरी जीवनसंगिनी से इतनी दूर फेंक दिया गया है।
या शायद मेरी वजह उतनी दमदार नहीं होगी
वरना अनुकंपा पे भी मेरी बात सुनी नहीं जा रही है।

हर कोई अपनी संस्था से प्यार बहुत करता है
पर कोई सन्तुष्ट रहता है
कोई असन्तुष्ट दिखता है।
आज जिस बेहाली से मैं गुज़र रहा हूँ
शायद बर्दास्त करने की सारी सीमाओं को लाँघ चुका हूँ।

पता नहीं मन में एक पल के लिए भी शांति नहीं रहती है।
और भाग भाग कर मेरी अर्धांगिनी के पास चला जाता है।
पता नहीं मेरी अर्धांगिनी कैसे जीवन वहाँ व्यतीत करती होगी।
कितना दर्द उसे सहना पड़ रहा होगा।
कितनी तकलीफ में होगी।
वगैरह वगैरह।

अब और सहा नहीं जा रहा है मेरे पल।
बस कर
बस भी कर
मत ले परीक्षा मेरी और।

Written by sushil kumar

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