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मैं कुछ बोलना चाह रहा हूँ।




मैं कुछ बोलना चाह रहा हूँ।

Kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।


मैं कुछ बोलना चाह रहा हूँ।
पर क्या तुम सुनना पसंद करोगे???
अगर नहीं।
तो कोई बात नहीं।
पर अगर सुनना चाहते हो तो
क्यों नहीं तुम स्वयं को
एक पल के लिए
खुद से अलग कर लेते हो।

जो मैं बोल रहा हूँ
हो सकता है
तुम्हें भाय नहीं।
पर जो भाय तो
क्यों नहीं उस पथ पर
अग्रसर हो चले हम तुम।

समय कम है
पर बोलना बहुत अधिक है।
आओ मेरे तरफ
तुम अपने
अहम को त्याग करके
मेरे पास।
आज भले तुम इस शरीर में
मनुष्य जीवन का सुख प्राप्त कर रहे हो।
अपनो की खुशी देख
तुम खुश हो रहे हो।
प्रियजनों के दुख देख
तुम दुखी हो रहे हो।

पर एक बात मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ
दिल पर हाथ रख कर कहना।
सच कहना!
जिन परिजनों के संग
तुम्हारी डोर बंधी हुई है।
तुम्हारे मरने के बाद
क्या तुम उन्हें याद आओगे।
माना वो रोएँगे
एक दिन नही
दस दिनों तक रोएँगे।
पर उसके बाद वो भी तुम्हें भूल
अपनी दुनिया सँवारने में जुट जाएँगे।

ऐसी स्थिति में
तुम्हें क्या करना चाहिए।
जब पता है
तुम्हारी पहचान उनसे
तुम्हारे शरीर के बदौलत ही है।
और शरीर के नष्ट होते ही
सारे लोग तुम्हें भूल जाएँगे।
फिर क्यों नहीं उस सम्बन्ध को मजबूत करे हम
जो जन्मों जन्मों से हमारा साथ निभाए जा रहे हैं।

माना ये शरीर नष्ट हो जाएगा
पर ये आत्मा शाश्वत है।
जो शरीर बदलता ही रहेगा।
आज मनुष्य है
तो कल घोड़ा है
और फिर पता नहीं क्या क्या?
और ऐसे ही
चौरासी लाख योनियों में भटकता रहेगा।

पर आत्मा का परमात्मा से मिलन
केवल और केवल मनुष्य योनि में सम्भव है।
तो क्यों नहीं अपने इस शरीर को
भगवन की खोज में लगा डालें।
उस मालिक की खोज में लगा डाले
जो इस चौरासी लाख योनियों से हमे
सदा सदा के लिए छुटकारा दिला
अपने चरणों में जगह दे दे।

 Written by sushil kumar


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