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मैं टूट जाता हूँ भीतर से

मैं टूट जाता हूँ भीतर से

kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठको को समर्पित है।



मैं टूट जाता हूँ भीतर से
जब अपने अतीत में
झाँकने को चला जाता हूँ कभी।
क्या सोचा रखा था मैने
और क्या हो रहा है
आज मेरे संग में।

जिस माँ ने ये संस्कार दिया था
मुझे बचपन से।
किसी का दिल ना दुखे
ऐसे कर्म करो
अपने जीवन में।

आज कोई उनके कर्म पर सवाल उठाए जा रहा है
भरे महफ़िल में।
मैं कैसे विश्वास कर लूँ
क्योंकि मुझे पता है
मेरे माँ का हृदय सच्चा है।

हर कथनी के होते हैं सदा दो अर्थ
जो सकारात्मक होते हैं
वो सदा आगे बढ़ते रहते हैं
बिना अतीत के रोक टोक के।

Written by sushil kumar

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