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डर के आगे जीत है।

डर के आगे जीत है।

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मैं डरा सहमा सा यहाँ बैठा हूँ
कि कहीं कोई अनहोनी ना घट जाए
जिससे मैं खौफजदा हूँ।

कब किस दिशा से
कोई तूफान ना आ जाए।
कहीं धरती ना फ़टे
और हमें निगल जाए।

बहुत सह लिया हूँ
और बहुत सह रहा हूँ।
पर चाह कर भी
उसे अपने वश ना कर पा रहा हूँ।

जितना दम मैं लगा रहा हूँ
वो उतना ही उछल रहा है।
रह रह कर वो मुझपर
चोट किए जा रहा है।

कितना सहूँगा
ये मुझे नही पता है।
पर अब बहुत हो गया है
सब को समय पर छोड़ा है।

समय से बड़ा ताकतवर
आज तक कोई ना हुआ है।
फिर डर की क्या औकात
जो वो समय से
कभी भिड़ा है।

समय से दोस्ती कर
मैने अपने कर्म पर ध्यान दिया है।
बहुत दिनों के बाद
आज मैने चैन की नींद सोया है।


Written by sushil kumar

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