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सुबह की नींद।।

सुबह की नींद।।

kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।


रात को भले जल्दी सो जाऊँ
पर सुबह की नींद गजब की प्रिय होती है।
चाह कर भी आँखे नही खोल पाता हूँ।
आलस मानो मुझे अपनी बाहों में जकड़
उठने का मौका ही नही देना चाहती है।
और मैं नींद के आगोश में
सारी दुनियादारी भूल
मीठे मीठे सपनो का आनन्द ले रहा हूँ।


Written by sushil kumar

मैं कुछ बोलना चाह रहा हूँ।




मैं कुछ बोलना चाह रहा हूँ।

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मैं कुछ बोलना चाह रहा हूँ।
पर क्या तुम सुनना पसंद करोगे???
अगर नहीं।
तो कोई बात नहीं।
पर अगर सुनना चाहते हो तो
क्यों नहीं तुम स्वयं को
एक पल के लिए
खुद से अलग कर लेते हो।

जो मैं बोल रहा हूँ
हो सकता है
तुम्हें भाय नहीं।
पर जो भाय तो
क्यों नहीं उस पथ पर
अग्रसर हो चले हम तुम।

समय कम है
पर बोलना बहुत अधिक है।
आओ मेरे तरफ
तुम अपने
अहम को त्याग करके
मेरे पास।
आज भले तुम इस शरीर में
मनुष्य जीवन का सुख प्राप्त कर रहे हो।
अपनो की खुशी देख
तुम खुश हो रहे हो।
प्रियजनों के दुख देख
तुम दुखी हो रहे हो।

पर एक बात मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ
दिल पर हाथ रख कर कहना।
सच कहना!
जिन परिजनों के संग
तुम्हारी डोर बंधी हुई है।
तुम्हारे मरने के बाद
क्या तुम उन्हें याद आओगे।
माना वो रोएँगे
एक दिन नही
दस दिनों तक रोएँगे।
पर उसके बाद वो भी तुम्हें भूल
अपनी दुनिया सँवारने में जुट जाएँगे।

ऐसी स्थिति में
तुम्हें क्या करना चाहिए।
जब पता है
तुम्हारी पहचान उनसे
तुम्हारे शरीर के बदौलत ही है।
और शरीर के नष्ट होते ही
सारे लोग तुम्हें भूल जाएँगे।
फिर क्यों नहीं उस सम्बन्ध को मजबूत करे हम
जो जन्मों जन्मों से हमारा साथ निभाए जा रहे हैं।

माना ये शरीर नष्ट हो जाएगा
पर ये आत्मा शाश्वत है।
जो शरीर बदलता ही रहेगा।
आज मनुष्य है
तो कल घोड़ा है
और फिर पता नहीं क्या क्या?
और ऐसे ही
चौरासी लाख योनियों में भटकता रहेगा।

पर आत्मा का परमात्मा से मिलन
केवल और केवल मनुष्य योनि में सम्भव है।
तो क्यों नहीं अपने इस शरीर को
भगवन की खोज में लगा डालें।
उस मालिक की खोज में लगा डाले
जो इस चौरासी लाख योनियों से हमे
सदा सदा के लिए छुटकारा दिला
अपने चरणों में जगह दे दे।

 Written by sushil kumar


हम अभी हैं।

हम अभी हैं।

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वो हमारा प्रिय है
उसे और न परेशान करे।
खुश रहे हम सदा
उसकी भी खुशहाली का सदा ध्यान रखें।
दिन भर की थकान ले
घर पर जब वो वापस आए।
प्यार से उससे बर्ताव करे
उसके काम काज के तनाव का निदान करे।

हम अभी हैं
अगले क्षण हो ना हो।
जीवन की डोर कहीं हमसे छूट ना जाए।
और अगले क्षण हमारे प्रियजन
अंधेरे में जीने को बेबस ना हो पाएँ।

क्योंकि
हर कोई जी रहा है
तनाव को पी रहा है।
जूझ रही है जिंदगी हमारी
लड़ रही है हर साँस लेने को।
खुशी की तलाश में
भटक रहे हैं इधर उधर।
पर हर जगह तनाव ही तनाव
चैन की साँस कोई ले तो ले कहाँ??

इसलिए
हमारी जिम्मेवारी
और भी बढ़ जाती है यहाँ।
कहीं हमसे हमारे प्रियजन कोई
तनाव में  हमसे दूर ना हो जाए।
सो खुश रहता हूँ मैं सदा
और प्रियजनों को भी खुश रखने की चेष्टा
करता हूँ यहाँ।

Written by sushil kumar

हार जीत तो लगी रहती है।

हार जीत तो लगी रहती है।

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लोगों ने मुझे लताड़ा
बात बात पर फटकारा।
पर मैं चुप रहा।

कभी किसी ने गाली दी
तो कभी किसी ने हाथ उठाया।
पर मैं चुप रहा।

सहने की आदत
बचपन से जो लगी थी।
शराब पीकर बाप
मुझे रोज पीटता था।
माँ अक्सर मुझे समझाया करती थी
जो तू सह लिया
तो समझ तू ये जीवन का जंग जीत लिया।

जीवन है दुख और क्लेशो की छाया
अगर बड़ा कुछ पाना है तो
कर्म पर ध्यान दो मेरे भ्राता।

हार जीत तो लगी रहती है।

Written by sushil kumar

धोनी :-एक आखिरी उम्मीद।।

धोनी :-एक आखिरी उम्मीद।।

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मैं ही एक आखिरी उम्मीद था
मैं ही उन सबका पीर था।
मैने भी कसम खाई थी उसदिन
नहीं झुकने दूँगा सर अपने वतन का।
कोशिश तो मैने पुरजोर किया था
दुश्मनो के खेमे को झकझोर दिया था।
जीत अपने झोली में गिरने ही वाली थी
पर तब जो घटा वो सब हमारे हाथ में नहीं था।
अनहोनी को होनी करने फिर चल पड़ा था मैं धोनी
पर ऐसा लगा किसी ने मुँह से मेरे निवाला छीन लिया था।
मैं हैरान था,परेशान था।
था मैं खुद पर गुस्सा।
शीशे की भाँति टूट चुका था
बिखरा पड़ा था मेरा हिस्सा।
एक एक पग बढ़ाना भारी पड़ रहा था
आँखों से अश्रुओं को थामना मुश्किल पड़ रहा था।
ऐसा आभास मुझे हो रहा था
क्यों नहीं निगल जाती है
मुझे ये वसुंधरा।

Written by sushil kumar

मैं टूट जाता हूँ भीतर से

मैं टूट जाता हूँ भीतर से

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मैं टूट जाता हूँ भीतर से
जब अपने अतीत में
झाँकने को चला जाता हूँ कभी।
क्या सोचा रखा था मैने
और क्या हो रहा है
आज मेरे संग में।

जिस माँ ने ये संस्कार दिया था
मुझे बचपन से।
किसी का दिल ना दुखे
ऐसे कर्म करो
अपने जीवन में।

आज कोई उनके कर्म पर सवाल उठाए जा रहा है
भरे महफ़िल में।
मैं कैसे विश्वास कर लूँ
क्योंकि मुझे पता है
मेरे माँ का हृदय सच्चा है।

हर कथनी के होते हैं सदा दो अर्थ
जो सकारात्मक होते हैं
वो सदा आगे बढ़ते रहते हैं
बिना अतीत के रोक टोक के।

Written by sushil kumar

मैं इतना अभागा क्यों हूँ

मैं इतना अभागा क्यों हूँ

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मैं इतना अभागा क्यों हूँ
मेरे ईश्वर।
जिन्हें चाहा
उन्होंने ही किए हैं
मेरे दो हिस्से।

एक छोटा सा परिवार था
बस एक छोटी सी तो आशा रखी थी
मेरे दिल में।
मिलकर रहेंगे
एक दूसरे के गम को सहेंगे।

पर पता नहीं
तुझे मेरे खुशियों से जलन क्यों हो गई।
जिंदा रहते
तूने मुझे नर्क में क्यों धकेल दिया
मेरे परमेश्वर।

Written by sushil kumar

डर के आगे जीत है।

डर के आगे जीत है।

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मैं डरा सहमा सा यहाँ बैठा हूँ
कि कहीं कोई अनहोनी ना घट जाए
जिससे मैं खौफजदा हूँ।

कब किस दिशा से
कोई तूफान ना आ जाए।
कहीं धरती ना फ़टे
और हमें निगल जाए।

बहुत सह लिया हूँ
और बहुत सह रहा हूँ।
पर चाह कर भी
उसे अपने वश ना कर पा रहा हूँ।

जितना दम मैं लगा रहा हूँ
वो उतना ही उछल रहा है।
रह रह कर वो मुझपर
चोट किए जा रहा है।

कितना सहूँगा
ये मुझे नही पता है।
पर अब बहुत हो गया है
सब को समय पर छोड़ा है।

समय से बड़ा ताकतवर
आज तक कोई ना हुआ है।
फिर डर की क्या औकात
जो वो समय से
कभी भिड़ा है।

समय से दोस्ती कर
मैने अपने कर्म पर ध्यान दिया है।
बहुत दिनों के बाद
आज मैने चैन की नींद सोया है।


Written by sushil kumar

किसी अपने के साथ अगर जो हो,तो सारा तनाव,सारा दुख कोई भी झेल जाएगा।

किसी अपने के साथ अगर जो हो,तो सारा तनाव,सारा दुख कोई भी झेल जाएगा।

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ऐसा क्यों अभास हो रहा है
कि मैं खुद को खोता सा जा रहा हूँ।
जिम्मेदारियों के बोझ तले मेरा भविष्य
मानो सिकुड़ता सा जा रहा है।
बहुत दबाव झेला हूँ मैं
और आज भी झेलता सा जा रहा हूँ।
दुख के पहाड़ को हृदय में छुपाए
चेहरे पर तनाव ना आने दे रहा हूँ।
किसको सुनाऊँ मैं अपनी व्यथा
और किसके दुख को मैं बढ़ाऊँ।
सभी पहले से ही परेशान दिख रहे हैं
और किसे अपना बोझ दे,चैन की सांस पाऊँ।
मेरा बोझ मुझे ही ढोना होगा
किसी और के पास मैं क्या जाऊँ।
कल भी झेला था
आज भी झेल लूँगा
जो किसी अपने का प्यार और ढाढस पाऊँ।

Written by sushil kumar


मानवता एक अनमोल रत्न है।इसे खोना यानी ईश्वर को खोना है।

मानवता एक अनमोल रत्न है।इसे खोना यानी ईश्वर को खोना है।

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मेरी औकात से मुझे कोई वाकिफ करवा सकता नहीं।
मेरे जीने की हाल से मेरी हैसियत का पता कोई लगा सकता नही।
भले आज मेरे पास खाने को अच्छे खाने नहीं
और पहनने को महंगे कपड़े नहीं है।
पर कोई भी मेरे जज्बे और सोच पर
ताला लगा सकता नहीं।
मैने आज शुरू की है चलना अपने ज़मीन से
तो किसी को मेरी तवज्जो नहीं।
कल जब मैं छू लूँगा आसमान की बुलंदियों को
तो अनजानों को भी मेरी अच्छे सेहत को लेकर होगी फिक्र मेरी।
ऐसा नहीं कि आज मैं अपने फ़टे चिते हालात देख बहुत खुश नहीं हूँ।
पर चोट तब लगती है जब किसी जरूरतमंद को नहीं मिलती है कोई अहमियत कहीं।
इंसान ने यहाँ इंसान को तौला है उसकी हैसियत देखकर।
क्या मौला तुम्हें कभी बख्शेगा जन्नत
तुम्हारी ये हरकत देखकर।
इंसानियत की चोला से बड़ा आज कोई चोला नहीं
सभी की भलाई हो जिससे, वैसे ही कदम बढ़ाने को है हमें।

Written by sushil kumar

सत्य की खोज में।

सत्य की खोज में।

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मेरी हैसियत नहीं
कि सभी के दिलों तक
अपनी बातों को पहुँचा पाऊँ।
जो किसी भी एक व्यक्ति के
हृदय की गहराई को जो छू पाऊँ।
तो मैं इस संसार में आने का
अपने मकसद को पूर्ण पाऊँ।

आना जाना इस मिथ्या संसार में
सभी का लगा रहता है।
कुछ बहुत कम मेहनत कर
बहुत कुछ पा लेते हैं।
तो कुछ के ऐड़ी घिस जाते है
फिर भी मंजिल तक पहुँच नहीं पाते हैं।

ऐसा अगर है
फिर तो कोई मेहनत ही करना छोड़ देगा।
पर अगर असली सत्य की खोज में जाओगे
फिर बात कुछ और ही निकलेगी।
पिछले जन्म में अच्छे कर्म और
कड़ी मेहनत जिसने की है।
जो मंजिल के पहुँचते पहुँचते
देह अपना वो त्याग गया था।
इस जन्म में थोड़ी मेहनत में ही
अपना मंजिल वो हासिल कर लेगा।

इसलिए किसी ज्ञानी ने
बहुत सत्य ही कहा है।
बन्दे फल की चिंता छोड़
बस तू अपना कर्म किए जा।

Written by sushil kumar

कटु सत्य।

कटु सत्य।

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मैं जन्म लिया जब
अपनी माँ के कोख से।
कोई नाम लिखवाकर ना आया था संग में।
कह दिया जो प्यार से मेरी माँ ने
वही नाम पड़ गया मेरा जीवन भर।
असल में देखा जाए तो 
हम सब हैं मानव।
नाम से कुछ फर्क नहीं पड़ता है।
अपनी आयु साथ लेकर आए हैं हम सभी।
बस अपना किरदार निभाना बाकी है।
कोई हमारा मित्र बनेगा
कोई शत्रु बनेगा यहाँ हमारा।
सभी अपने किरदार में रहेंगे
मालिक ही हमारा भाग्यविधाता है।
उसके आदर्शों पर जो हम चलेंगे।
ज्यादा सुकून से कट जाएगी जिंदगी।
वरना रोना धोना लगा ही रहेगा।
चाहे जितने जन्म लेलो मानव की।

Written by sushil kumar

कार्यप्रणाली से हैरान परेशान हूँ।

कार्यप्रणाली से हैरान परेशान हूँ।

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मेरी भी पत्नी है
मैं भी उससे प्यार करता हूँ।
पर शायद मेरी पैरवी उतनी जबरदस्त नहीं होगी
इसलिए मुझे मेरी जीवनसंगिनी से इतनी दूर फेंक दिया गया है।
या शायद मेरी वजह उतनी दमदार नहीं होगी
वरना अनुकंपा पे भी मेरी बात सुनी नहीं जा रही है।

हर कोई अपनी संस्था से प्यार बहुत करता है
पर कोई सन्तुष्ट रहता है
कोई असन्तुष्ट दिखता है।
आज जिस बेहाली से मैं गुज़र रहा हूँ
शायद बर्दास्त करने की सारी सीमाओं को लाँघ चुका हूँ।

पता नहीं मन में एक पल के लिए भी शांति नहीं रहती है।
और भाग भाग कर मेरी अर्धांगिनी के पास चला जाता है।
पता नहीं मेरी अर्धांगिनी कैसे जीवन वहाँ व्यतीत करती होगी।
कितना दर्द उसे सहना पड़ रहा होगा।
कितनी तकलीफ में होगी।
वगैरह वगैरह।

अब और सहा नहीं जा रहा है मेरे पल।
बस कर
बस भी कर
मत ले परीक्षा मेरी और।

Written by sushil kumar

मैं हारा नहीं,हराया गया था।

मैं हारा नहीं,हराया गया था।

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मैं हारा नहीं
हराया गया था।
मैं जिंदा ही कब्र में
दफनाया गया था।
नही थी अब मुझे
जीने की इच्छा।
मृत सय्या से उठने की
अब नही थी मेरी ईप्सा।
बेगानो से नहीं
हमे अपनो से थी शिकवा।
जो बिच महफ़िल में
हमें पराया बनाए हुए थे।
मैं हारा नहीं
हराया गया था।
Written by sushil kumar

मैं अकेला रह गया हूँ।

मैं अकेला रह गया हूँ।

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मैं अकेला रह गया हूँ
बिल्कुल अकेला।
ना ही किसी को मेरी फिक्र है
ना ही किसी को मेरी खबर।
बस हर कोई अपनी ही दुनिया में
मशगूल हो गया है।
किसी को भी इतनी फुरसत नहीं
कि कोई मेरी खैरियत तक ले सके।
यहाँ तक कि मेरे अपने भी
मुझे अपनी दायरे से हटा दिए हैं।

कभी कभी तो खुद को मिटा देने का
मन करता है।
आखिर साँस लें भी तो
किसके लिए।
मेरी दुनिया जो है
मुझसे ही शुरू और
मुझपर ही
खत्म भी तो हो जाती है।
जिंदगी अगर जिए भी तो
किसके लिए।

बहुत अकेला हो गया हूँ
कोई बचालो
मुझे आकर।

Written by sushil kumar

वतना मेरे वतना वे।

वतना मेरे वतना वे kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। वतना मेरे वतना वे तेरा इश्क़ मेरे सर चढ़ चढ़कर बोल रहा है। एक जन्...