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डर के आगे जीत है।

डर के आगे जीत है।

Kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



मैं डरा सहमा सा यहाँ बैठा हूँ
कि कहीं कोई अनहोनी ना घट जाए
जिससे मैं खौफजदा हूँ।

कब किस दिशा से
कोई तूफान ना आ जाए।
कहीं धरती ना फ़टे
और हमें निगल जाए।

बहुत सह लिया हूँ
और बहुत सह रहा हूँ।
पर चाह कर भी
उसे अपने वश ना कर पा रहा हूँ।

जितना दम मैं लगा रहा हूँ
वो उतना ही उछल रहा है।
रह रह कर वो मुझपर
चोट किए जा रहा है।

कितना सहूँगा
ये मुझे नही पता है।
पर अब बहुत हो गया है
सब को समय पर छोड़ा है।

समय से बड़ा ताकतवर
आज तक कोई ना हुआ है।
फिर डर की क्या औकात
जो वो समय से
कभी भिड़ा है।

समय से दोस्ती कर
मैने अपने कर्म पर ध्यान दिया है।
बहुत दिनों के बाद
आज मैने चैन की नींद सोया है।


Written by sushil kumar

किसी अपने के साथ अगर जो हो,तो सारा तनाव,सारा दुख कोई भी झेल जाएगा।

किसी अपने के साथ अगर जो हो,तो सारा तनाव,सारा दुख कोई भी झेल जाएगा।

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ऐसा क्यों अभास हो रहा है
कि मैं खुद को खोता सा जा रहा हूँ।
जिम्मेदारियों के बोझ तले मेरा भविष्य
मानो सिकुड़ता सा जा रहा है।
बहुत दबाव झेला हूँ मैं
और आज भी झेलता सा जा रहा हूँ।
दुख के पहाड़ को हृदय में छुपाए
चेहरे पर तनाव ना आने दे रहा हूँ।
किसको सुनाऊँ मैं अपनी व्यथा
और किसके दुख को मैं बढ़ाऊँ।
सभी पहले से ही परेशान दिख रहे हैं
और किसे अपना बोझ दे,चैन की सांस पाऊँ।
मेरा बोझ मुझे ही ढोना होगा
किसी और के पास मैं क्या जाऊँ।
कल भी झेला था
आज भी झेल लूँगा
जो किसी अपने का प्यार और ढाढस पाऊँ।

Written by sushil kumar


मानवता एक अनमोल रत्न है।इसे खोना यानी ईश्वर को खोना है।

मानवता एक अनमोल रत्न है।इसे खोना यानी ईश्वर को खोना है।

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मेरी औकात से मुझे कोई वाकिफ करवा सकता नहीं।
मेरे जीने की हाल से मेरी हैसियत का पता कोई लगा सकता नही।
भले आज मेरे पास खाने को अच्छे खाने नहीं
और पहनने को महंगे कपड़े नहीं है।
पर कोई भी मेरे जज्बे और सोच पर
ताला लगा सकता नहीं।
मैने आज शुरू की है चलना अपने ज़मीन से
तो किसी को मेरी तवज्जो नहीं।
कल जब मैं छू लूँगा आसमान की बुलंदियों को
तो अनजानों को भी मेरी अच्छे सेहत को लेकर होगी फिक्र मेरी।
ऐसा नहीं कि आज मैं अपने फ़टे चिते हालात देख बहुत खुश नहीं हूँ।
पर चोट तब लगती है जब किसी जरूरतमंद को नहीं मिलती है कोई अहमियत कहीं।
इंसान ने यहाँ इंसान को तौला है उसकी हैसियत देखकर।
क्या मौला तुम्हें कभी बख्शेगा जन्नत
तुम्हारी ये हरकत देखकर।
इंसानियत की चोला से बड़ा आज कोई चोला नहीं
सभी की भलाई हो जिससे, वैसे ही कदम बढ़ाने को है हमें।

Written by sushil kumar

सत्य की खोज में।

सत्य की खोज में।

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मेरी हैसियत नहीं
कि सभी के दिलों तक
अपनी बातों को पहुँचा पाऊँ।
जो किसी भी एक व्यक्ति के
हृदय की गहराई को जो छू पाऊँ।
तो मैं इस संसार में आने का
अपने मकसद को पूर्ण पाऊँ।

आना जाना इस मिथ्या संसार में
सभी का लगा रहता है।
कुछ बहुत कम मेहनत कर
बहुत कुछ पा लेते हैं।
तो कुछ के ऐड़ी घिस जाते है
फिर भी मंजिल तक पहुँच नहीं पाते हैं।

ऐसा अगर है
फिर तो कोई मेहनत ही करना छोड़ देगा।
पर अगर असली सत्य की खोज में जाओगे
फिर बात कुछ और ही निकलेगी।
पिछले जन्म में अच्छे कर्म और
कड़ी मेहनत जिसने की है।
जो मंजिल के पहुँचते पहुँचते
देह अपना वो त्याग गया था।
इस जन्म में थोड़ी मेहनत में ही
अपना मंजिल वो हासिल कर लेगा।

इसलिए किसी ज्ञानी ने
बहुत सत्य ही कहा है।
बन्दे फल की चिंता छोड़
बस तू अपना कर्म किए जा।

Written by sushil kumar

कटु सत्य।

कटु सत्य।

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मैं जन्म लिया जब
अपनी माँ के कोख से।
कोई नाम लिखवाकर ना आया था संग में।
कह दिया जो प्यार से मेरी माँ ने
वही नाम पड़ गया मेरा जीवन भर।
असल में देखा जाए तो 
हम सब हैं मानव।
नाम से कुछ फर्क नहीं पड़ता है।
अपनी आयु साथ लेकर आए हैं हम सभी।
बस अपना किरदार निभाना बाकी है।
कोई हमारा मित्र बनेगा
कोई शत्रु बनेगा यहाँ हमारा।
सभी अपने किरदार में रहेंगे
मालिक ही हमारा भाग्यविधाता है।
उसके आदर्शों पर जो हम चलेंगे।
ज्यादा सुकून से कट जाएगी जिंदगी।
वरना रोना धोना लगा ही रहेगा।
चाहे जितने जन्म लेलो मानव की।

Written by sushil kumar

कार्यप्रणाली से हैरान परेशान हूँ।

कार्यप्रणाली से हैरान परेशान हूँ।

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मेरी भी पत्नी है
मैं भी उससे प्यार करता हूँ।
पर शायद मेरी पैरवी उतनी जबरदस्त नहीं होगी
इसलिए मुझे मेरी जीवनसंगिनी से इतनी दूर फेंक दिया गया है।
या शायद मेरी वजह उतनी दमदार नहीं होगी
वरना अनुकंपा पे भी मेरी बात सुनी नहीं जा रही है।

हर कोई अपनी संस्था से प्यार बहुत करता है
पर कोई सन्तुष्ट रहता है
कोई असन्तुष्ट दिखता है।
आज जिस बेहाली से मैं गुज़र रहा हूँ
शायद बर्दास्त करने की सारी सीमाओं को लाँघ चुका हूँ।

पता नहीं मन में एक पल के लिए भी शांति नहीं रहती है।
और भाग भाग कर मेरी अर्धांगिनी के पास चला जाता है।
पता नहीं मेरी अर्धांगिनी कैसे जीवन वहाँ व्यतीत करती होगी।
कितना दर्द उसे सहना पड़ रहा होगा।
कितनी तकलीफ में होगी।
वगैरह वगैरह।

अब और सहा नहीं जा रहा है मेरे पल।
बस कर
बस भी कर
मत ले परीक्षा मेरी और।

Written by sushil kumar

मैं हारा नहीं,हराया गया था।

मैं हारा नहीं,हराया गया था।

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मैं हारा नहीं
हराया गया था।
मैं जिंदा ही कब्र में
दफनाया गया था।
नही थी अब मुझे
जीने की इच्छा।
मृत सय्या से उठने की
अब नही थी मेरी ईप्सा।
बेगानो से नहीं
हमे अपनो से थी शिकवा।
जो बिच महफ़िल में
हमें पराया बनाए हुए थे।
मैं हारा नहीं
हराया गया था।
Written by sushil kumar

मैं अकेला रह गया हूँ।

मैं अकेला रह गया हूँ।

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मैं अकेला रह गया हूँ
बिल्कुल अकेला।
ना ही किसी को मेरी फिक्र है
ना ही किसी को मेरी खबर।
बस हर कोई अपनी ही दुनिया में
मशगूल हो गया है।
किसी को भी इतनी फुरसत नहीं
कि कोई मेरी खैरियत तक ले सके।
यहाँ तक कि मेरे अपने भी
मुझे अपनी दायरे से हटा दिए हैं।

कभी कभी तो खुद को मिटा देने का
मन करता है।
आखिर साँस लें भी तो
किसके लिए।
मेरी दुनिया जो है
मुझसे ही शुरू और
मुझपर ही
खत्म भी तो हो जाती है।
जिंदगी अगर जिए भी तो
किसके लिए।

बहुत अकेला हो गया हूँ
कोई बचालो
मुझे आकर।

Written by sushil kumar

डर के आगे जीत है।

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