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आँखे बंद थी।

आँखे बंद थी।

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Army



आँखे बंद थी
पर चेहरे पर सुकून साफ झलक रहा था।
मेरा भाई जैसा दोस्त
लिपट तिरंगे में
बेखौफ अपने माँ के आँचल में
सो रहा था।
मानो जैसे मुझे वो
चिढ़ा रहा हो
खुद पर बहुत
इतरा रहा हो।
देख जीत ली भाई
बाज़ी फिर से मैंने ना
ऐसा कह कर मुझे
नीचा दिखा रहा हो।

याद है मुझे उसकी
पिछली मुलाकात।
जब घर पर आया था मिलने को
मेरा जिगरी यार।
बहुत ही खुश था वह
फ़ौज में भर्ती पाकर।
खूब सुनाई वीर सैनिकों की गथाएं
जो उसने सुन रखी थी
वहाँ पर।
कहते कहते सभी की कहानियां
आक्रोषित हो उठा था वह।
दुश्मनों से अपना लोहा मनवाने को
उसने जिद्द जो अपनी
ठान रखी थी।
Army

आखिरकार उस हठी ने
अपना हठ पूरा कर ही गया।
और कूद गया दुश्मनों के बीच में
दाँत खट्टा करने को उनके।
सुना है
उसने अपनो की जान बचाने को
अभिमन्यु बन कूद पड़ा था
बीच मैदान में।
गोलियों से जिस्म छलनी होती रही
पर कहाँ थमा था वह।
शेर सा दहाड़ता हुआ
सारे दुश्मनों पर
वह भारी पड़ रहा था
अकेला ही।
आखिरी साँस तक उसने
अपना हथियार नहीं गिराया था।
दुश्मनों को अकेला ही
वह खदेड़ कर भगाया था।
खूब लड़ा मर्दाना वह तो
भारत माँ का लल्ला था।
Army

आज हर हिंदुस्तानी
उस नादान परिंदे के जिद्द के आगे नतमस्तक है।
और सभी उसकी बहादुरी और कुर्बानी पर
दिल से सलाम कर रहे हैं।

जय हिंद।
जय भारत।













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