Email subscription

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

मैं राष्ट्रवाद का क्रान्ति हूँ।

।।राष्ट्रवाद की क्रान्ति।।

kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।


ना जाने कितने वर्ष बीत गए
सोया हुआ था घोर निद्रा में।
किसी ने मुझे आवाज तक ना दी।
दबा हुआ था सभी के हृदय में।
लोभ,मोह,ईर्ष्या और कामवासनाओं के वशीभूत हो
लोग भ्रमित हो
कहीं भटक चुके थे।
Rashtravad

आज फिर से किसी लौहपुरुष ने
राष्ट्रवाद की क्रान्ति का आह्वान किया है।
पूरे देश में
हर जन जन के मन से
अज्ञान के अंधियारे को दूर किया है।

हर एक के हृदय में
राष्ट्रवाद की तरंगें
आज पुनः से
उठ खड़ी हुई हैं।
राष्ट्रवाद से बड़ा कोई धर्म नहीं है
राष्ट्र है
तभी हम सभी है।

आज रोम रोम
और रग रग से हमारे
एक ही बस हुँकार उठी है।
जय हिंद
जय भारत का
चारों दिशाओ से
आज फिर से
ललकार गुंजी है।

मानो आज हर जन जन में
फिर से किसी क्रान्तिकारी ने
जन्म लिया हो।
बच्चे जवान बूढ़े
जन जन  में राष्ट्रवाद की चिंगारी
भभक रही है।

इसी बात पर आओ
हम सब मिल
एक साथ दिल से उद्घोष करते हैं।
हम हैं
जब तक इस धरती पर कहीं भी
अपने भारत माँ के सर ना झुकने देंगे।
वन्दे मातरम !वन्दे मातरम!
मरते दम तक
कहते रहेंगे।
Rashtravad

जय हिंद।।
जय भारत।।





Written by sushil kumar


No comments:

वतना मेरे वतना वे।

वतना मेरे वतना वे kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। वतना मेरे वतना वे तेरा इश्क़ मेरे सर चढ़ चढ़कर बोल रहा है। एक जन्...