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लोकतंत्र का त्योहार।

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मन में सैलाब उमड़ पड़ता है
जब किसी देशद्रोही की जयजयकार सुनता हूँ
दिल में क्रोध की ज्वाला धधक उठती है
जब आज अपनी जमीर बेच
लोग देशद्रोहियों के बचाव करते नज़र आते हैं।
आँखे भाव भिवोर हो
अपनी अश्रु रोक नहीं पाते हैं
जब अपने देश में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर
केवल एक ही धर्म के लोगों को न्याय मिल पाता है।
कहने को हम इक्कीसवी सदी में कदम रख चुके हैं
पर सोच
सोच तो हमारी अभी भी वही कचड़े वाली ही रह गई है।
आज भले ही लोगों में क्रोध है या विश्वास है अपनी सरकार के लिए।
पर जब मतदान का दिन आता है
सारी राष्ट्रवाद धरी की धरी रह जाती है।
और लोकतंत्र के त्योहार को
लोग सो कर या सिनेमा देख कर बिताते हैं।
और देश की बागडोर को गलत हाथ मे थमा देते हैं।
ऐसे ढकोसले राष्ट्रवादियों से मुझे सख्त घृणा आती है
जो केवल लोक प्रसिद्धि पाने को राष्ट्रवाद के बुलबुले बन प्रकाश में आते हैं।
अगर सच्चे राष्ट्रवादी हो तो उठो
और लोकतंत्र के त्योहार में
अपने मतदान का प्रयोग कर
देश के बागडोर को
एक सच्चे राष्ट्रवादी नेता के हाथ में सौंपो।
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जय हिंद।।
जय भारत।।

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