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निस्वार्थ मन

निस्वार्थ मन।

Kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।



मेरे चरित्र के शब्दकोष में
कुछ शब्दों से कभी भेंट ना हो पाई है।
आज तक समझ नहीं पाया
कुकर्म करने की
इंसान को नौबत क्यों आई है।
ईश्वर के दिए गए अनमोल जीवन में
मैने सदा उनकी मेहर और कृपा पाई।
जितना भी दिया भगवन ने
मैने सदा उसमे ही संतुष्टी पाई।

बेशर्त और  निस्वार्थ प्रेम मेरे नस नस में
आज लहू बन बहा है।
अपने क्या परायो की भी सेवा कर
कभी उम्मीद कुछ दिल में ना जगाई है।

हर लम्हा ईश्वर से बस एक ही फरियाद
हमने की है।
दुख क्लेश का नामोनिशान मिटे जग से
खुशिओं की बारिश में भींग सब हर्षित हो।

आमीन।

Written by sushil kumar

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