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आज़ाद धरा के

आज़ाद धरा के

Kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है।

Azadi
आज़ाद धरा के
आज़ाद अम्बर का
मैं वो आज़ाद पंक्षी हूँ।
जिसकी कोई सीमा नहीं
जिसे कोई बंधन नहीं।
जिसे कोई रोक टोक नहीं।
सारा अम्बर
सारी धरा
जिसका है अपना घर।
Azadi

जब मन किया
पँख फैला
उड़ चले अपने फलक की ओर।
भ्रमण किया खूब इधर उधर
चहचहा कर किया
सारे वातावरण को मधुरमय।
फिर जब भूख लगी तो
उतर आएँ
अपनी धरा पर
चुगने को अन्न।
ये होती है
आज़ादी।
जो मन किया
वो किया।
Azadi

पर मनुष्यों ने तो आज़ादी की
परिभाषा ही बदल डाली है।
सारे धरती को विभाजित कर
अपनी आज़ादी की सीमा बांध डाली है।
रंग रूप,जाति धर्म के आधार पर
ईश्वर तक को नहीं बख्शा है।
ये कैसी आज़ादी पाने को
मानव ने
अपने भाइयों का खून तक बहा डाला है।
Azadi

सोचो !!
जरा सोचो तुम।
क्या तुमने आज़ादी पा ली है।
रंग रूप,जाति धर्म के नाम पर
ये क्या कोहराम तुमने
दिमाग में मचाली है।
अपनी संकीर्ण सोच को
आज दिल से
तजने का समय आ चुका है।
हम सारे मानव एक हैं
और सारी विविधताओं को नष्ट कर
आज़ादी पाने का समय आ चुका है।

Written by sushil kumar

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