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वो अकेला ही चला था

वो अकेला ही चला था

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वो अकेला ही चला था
बदलने सारे हिंदुस्तान को।
एक नई सोच,एक नया विश्वास
सारे भारतीयों के
हृदय में बोकर।
वो निकल पड़ा था एक मिशन पर
सारे प्रणाली से भ्रष्टाचार मिटाने को।

सारी मानवता चल पड़ी थी
उसके पीछे
उसके नेक कदम पर
उसके कदम से कदम मिलाकर।
विकास की मंज़िल पाने को
अपने अधूरे सपनों को पूर्ण कर सँवारने को।

आज जब काले धन पर रोक लग चुका है
अपने प्रणाली में भी कुछ सुधार आ चुका है।
तो खाने वालों के पेट मे
एक चुभन सा लग रहा है।
और बौखलाहट में
वे कुछ भी बड़बड़ाने से लगे हैं।
और हमारे चौकीदार को चोर
वे बनाने में लगे हैं।

अगर चोर ही होते
फिर इनसे डरता कोई क्यों?
यहाँ अपने देश के भ्रष्ट लोगों को छोड़ो
अपने विरोधी देशों की नींद तक
इन्होंने उड़ा कर रखी है।
उनकी चैन और सुकून को भी चुरा कर रखी है।
पता नहीं ?
फिर भी क्यों कुछ मनचले हैं हमारे
जो चौकीदार को ही चोर बनाने में लगे हैं।

शायद इसलिए आज सारे विपक्षी दल
अपने मतभेदों को भूल।
एक साथ खड़े हो गए हैं
चौकीदार को हटाने के खातिर।
पर हम ये हरगिज़ होने नहीं देंगे
चौकीदार की कुर्सी
उससे छीनने नहीं देंगे।
क्योंकि चौकीदार अपना फ़र्ज़
अब अच्छे से निभा रहा है।
दोषियों को अब बख्शा नहीं जा रहा है।
चौकीदार अपना है बहुत ही सजग
और ईमानदारी से वह अपना काम निभाता चला रहा है।
Shayari

Written by Sushil kumar@kavitadilse.top

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