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आज फिर से कल की खोज में निकला हूँ।।

आज फिर से कल की खोज में निकला हूँ।।


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आज फिर से कल की खोज में निकला हूँ।
निकला हूँ कल का
उगता हुआ नया सूरज देखने को।।
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नीले नीले पट पर स्वर्णिम रंगों से
सूरज के मुखौटे को रँगने को।
नया जोश
नई तरंगें
सभी इक दिशा में लगा जोर।
करने को चले फतह
इक नया आसमान।
एक नया दौर।

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हर दिल में अंकुरित 
एक नया जोश है।
मंजिल को पाने की
सब में एक होड़ है।
थकने का समय नहीं
विश्राम है अभी दूर कहीं।
पसीने में लतपत
बढ़ा रहें हैं कदम सभी।
कतरा कतरा लहू से अपना
सींच रहा हूँ कर्म स्थान।
बना रहा हूँ पथ नया
सफलता को चूमने का नया आयाम।

Written by Sushil Kumar @ kavitadilse.top

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