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कंबख्त किसे खबर है??

कंबख्त किसे खबर है??

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कंबख्त किसे खबर है??
इस दुनिया में
सभी तो बेखबर हैं।

दूध वाला भैया
मिठा मिठा बोलकर
दूध में पानी मिला
दूध बेच निकल जाता है।
और हम उसके वाणी के मिठास में
असली दूध का मिठास भी भूल चुके हैं।
पर फिर भी
कंबख्त किसे खबर है??
इस दुनिया में
सभी तो बेखबर हैं।

राशन की दुकान में जाओ तो
दुकानदार हमसे रिश्ता बना
चावल और शक्कर में
कंकर मिला
हमें प्यार से बेच देता है।
पर फिर भी
कंबख्त किसे खबर है??
इस दुनिया में
सभी तो बेखबर हैं।

बस में सफर करते वक्त
कन्डक्टर को भाड़ा देने के बाद
कंडक्टर साहब मुस्कुरा कर
बोल देते हैं
भाईसाहब चैंज नहीं है।
और हम उनके मुस्कान के
साजिश में फँस जाते हैं।
पर फिर भी
कंबख्त किसे खबर है??
इस दुनिया में
सभी तो बेखबर हैं।

ओफिस में साहब का
भारी भरकम फाईल
पिउन के हाथों से भेजवाना।
और फिर फोन पर
बड़े प्यार दुलार से
फाईल के विषय में बताना।
और उसे खत्म करने का
डेडलाइन देना।
हमारा डेडलाइन से पहले
फाईल कंपलीट कर भेजवाना।
और साहब से शाबाशी पाना।
साहब का प्रोमोशन होकर
वहाँ से निकल जाना।
पर फिर भी
कंबख्त किसे खबर है??
इस दुनिया में
सभी तो बेखबर हैं।

अगर शादी हुई है
तो बीवी की प्यार भरी फरमाइश
पूरी करने हेतु
नौकरी में जी जान लगा देना।
पर फिर भी पूरा ना कर पाने पर
उसे समझाना और उसका मान जाना।
पर अगर शादी नहीं हुई है
तो भगवान ही आपका मालिक है।
प्यार प्यार में
गर्लफ्रैंड आपकी किडनी तक बेचवा देगी।
पर फिर भी
कंबख्त किसे खबर है??
इस दुनिया में
सभी तो बेखबर हैं।

written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

यार तेरी यारी चाहिए।

यार तेरी यारी चाहिए।

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यार तेरी यारी चाहिए।
बिन तेरे
कोई जिंदगानी हो
ऐसी कोई कहानी नहीं चाहिए।

साथ तेरे
मैं बड़ा हुआ।
साईकिल लेकर
मेरे घर के सामने
तू खड़ा हुआ।
मुझे बैठा अपने सवारी पर
स्कूल की ओर
हमारा प्रस्थान हुआ।

क्लास में मेरे संग
तेरा मूर्गा बनना।
भले सारा अध्याय
तूने कल ही
याद है किया।

जो किसी से
कभी जो पंगा हुआ
बिच में ढाल बन
हमेशा तेरा खड़ा रहना।

वो स्कूल के पीछे
आम का पेड़ रहा।
और हमदोनों का
चौकीदार से छिपकर
पेड़ पर चढ़
आम तोड़ना।
चौकीदार को
हमारा दिख जाना।
और हमारा जान बचाकर
वहाँ से भाग निकलना।
और तुम्हारी वो मिठी गाली से
मुझे संबोधित करना।
और फलों को
बराबर हिस्से में बाँटना।
और फिर उन फलों को
बड़े चाव से खाना।
ऐसा आभास होना
मानो उन आम के फलों की मिठास
दुगुनी चौगुनी बढ़ गई हो।

कितना अच्छा लगता था
वो तेरे संग समय बिताना।

कितना अच्छा लगता था
वो तेरे संग समय बिताना।

यार तेरी यारी चाहिए।
बिन तेरे
कोई जिंदगानी हो
ऐसी कोई कहानी नहीं चाहिए।

वो हमारे जीवन में
एक लड़की का आना।
और उस लड़की पर
हम दोनो का दिल धढ़कना।
और हम दोनो का
उस लड़की के लिए
एक दूसरे से लड़ना।
फिर किसी दिन
तेरा वो रास्ते से हट जाना
और मेरा उस लड़की को भूला देना।

क्योंकि
यार तेरी यारी चाहिए।
बिन तेरे
कोई जिंदगानी हो
ऐसी कोई कहानी नहीं चाहिए।

written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

हम सुंदर थे, हम सुंदर हैं, और सदा हम सुंदर ही रहेंगे।

हम सुंदर थे,  हम सुंदर हैं,  और सदा हम सुंदर ही रहेंगे।।

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दुनिया के नजरों में
भले हम कुरूप दिखते होंगे।
पर अपने दर्पण के नैनों से
कैसे कन्नी काट जाएँ हम।
वो तो चिल्ला चिल्ला कर
हमारी सुंदरता की बखान कर रही है।
मानो दुनिया का सबसे खुबसूरत
इंसान हम हीं हैं।
क्यों ना उसे ही मान ले हम।

दुनिया तो हमसे जलती है।
हमारी खुबसूरती देख वह
भूनती है।
फिर कैसे वह हमारे सौंदर्य का
ढिंढोरा पिट पाएगी।

इन दुनिया वालों से तो
अभी मिला हूँ।
दर्पण मेरे यार से तो
बचपन से मिलता आ रहा हूँ।
तो क्यों हम
इन दुनिया वालों की बात सुने।
हम सुंदर थे
हम सुंदर हैं
और सदा हम सुंदर ही रहेंगे।
क्योंकि हम अपने आईने पर
विश्वास करते हैं।

हम सुंदर थे
हम सुंदर हैं
और सदा हम सुंदर ही रहेंगे।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

कितना अच्छा होता।

कितना अच्छा होता

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कितना अच्छा होता
ना खाने की फिक्र होती।
ना पीने की फिक्र होती।
बस तुम्हें अपनी बाँहों में ले
तुम्हारी झील सी गहरी आँखो में
गोता लगाते रहता।
कभी तुम्हारी मखमली जुल्फों को समेटता।
तो कभी प्यार से तुम्हारे सर को चुमता।
बस यूँही हम दोनो एक दूसरे मेंं खो
सदियों बिता देते।
कितना अच्छा होता।।
कितना अच्छा होता।।

कितना अच्छा होता।।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

फासले और दूरियाँ जितनी बढ़ती चली जा रही है।

फासले और दूरियाँ जितनी बढ़ती चली जा रही है।

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फासले और दूरियाँ जितनी बढ़ती चली जा रही है।
हम आपके और भी उतने करीब पा रहे हैं।
वो हमारा साथ रहना
साथ में सारे काम करना
याद आ रही है तेरी घनी।
जिया नहीं जा रहा है
बिन तेरे यहाँ।

पेट का सवाल जो नहीं होता
तो तुमसे जुदा
कभी यों ना होता।
सच कहता हूँ
तेरे बिना
मेरा कहीं भी दिल नहीं लगता।

यार दोस्त बहुत हैं मेरे।
कहते हैं।
चल साथ घूमकर आएँ।
समुद्र तट पर दूर कहीं
सैर सपाटे कर
अपने मनोदशा में
कुछ बदलाव कर आएँ।
पर हमारे जद्दोजहद से
तेरा ख्याल नहीं हटता है।
तू वहाँ गुमसुम कहीं
कोने में बैठी
मुझे याद कर रही होगी।
और जुदाई के गम के
आँसू छिपा रही होगी।
और मैं यहाँ कैसे
तेरे बिन
अपने लिए
खुशियों के पलों
को सहेजूँँ।

मैं तेरा साथ निभाऊँँगा
एक कसम जो खाई थी
तेरे साथ सात फेरे लेते वक्त हमने।
तूझे अकेला नहीं छोड़ जाऊँगा
साँस की भले आखिरी कश
खींची हो हमने।
तू भले कहीं भी रहे
तेरी सोच में आ
तूझे हँसाऊँगा।
इतने मिठे पलों के गुच्छों को
मैं तेरे लिए छोड़ जाऊँगा।

अब जो फिर मिलेंगे हम
जल्दी ही
प्यार का नया आयाम
हासिल कर जाएँगे।
एक दूजे को
प्यार के लम्हों के
गुब्बारे तोहफे में
दिए जाएँगे।

जब भी याद आए
हम दोनो को
एक दूजे की
गुब्बारे फोड़ मुस्काएँगे।

जो भी हो
हम दोनो जल्द ही
एक जगह हो जाएँगे।
और सदा के लिए
एक दूजे के
प्यार में
हम दोनो
एक हसीन जहां बनाएँगे।

फासले और दूरियाँ जितनी बढ़ती चली जा रही है।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

रावण तुम्हारे अंदर है ,पहले उसे मार भगाओ।

रावण तुम्हारे अंदर है ,पहले उसे मार भगाओ||

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मैं चाहता कुछ हूँ
होता कुछ और है।
मैं जाता कहीं हूँ
पहुँचता कहीं और हूँ।
मेरे प्रेरणास्रोत हैं
भगवान श्रीराम।
पर क्यों मैं चल पड़ता हूँ
रावण के पदचिह्न पर।
स्त्री स्त्री में
क्यों मैं भेद करता हूँ
घर पर माँ बहनें हैं।
बाहर में सभी से
रंभा सा क्यों बरतता हूँँ।

बहुत दुख होता है
अपनी इस चरित्र पर।
चले हैं रावण दहन करने
अपने अंदर में
एक रावण रख।
अपने अंदर के अंधियारे को
पहले दूर हटाओ।
रावण तुम्हारे अंदर है
पहले उसे मार भगाओ।

written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

नजर से नजर क्या मिली,मन कैद हो गया उसके प्यार में।

नजर से नजर क्या मिली,मन कैद हो गया उसके प्यार में।

नजर से नजर क्या मिली,मन कैद हो गया उसके प्यार में।


चाहे जितना खुद को व्यस्त कर लूँ
चाहे जितने काम सर पर लेलूँ।
पर मेरे अन्तरमन से 
उनकी छवि मिटती ही नहीं है।

जब से उनके नजरों से
मेरी नजर जो मिली है।
ऐसा आभास हुआ है जैसे
मेरे मन ने स्वयं को 
उन्हें सौंप दिया हो।

मेरा शरीर भले ही
दिख रहा हो कहीं
पर मन
मन तो उनके प्यार में कैद हो
सदा के लिए उनके 
पास ही रूक गया है।

ये कैसा पागलपन है।
ये कैसा सुरूर है।
ना खाने में दिल लग रहा है
ना ही सोने में।
हर जगह बस 
उनकी सुंदर मूरत 
चारो तरफ दिखे जा रही हैं।

हे ईश्वर
मेरी  हालत देख 
कुछ तो रहम कीजिए।
या तो मुझे मिला देंं उनसे
या स्मृति से हटा दें
हमेशा हमेशा के लिए।

नजर से नजर क्या मिली,मन कैद हो गया उसके प्यार में।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top


प्यार से प्यार तक।

प्यार से प्यार तक।

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हर शीतल सुबह को
गरमाहट देने वाले
सूर्य की  प्रकाश में हो तुम।

हर थके हुए दिन को
ताजगी प्रदान करने वाले
चाँदनी रात में बहती हुई
वो ठंडी हवा में हो तुम।

वो घने काले लंबी रात को
चीरती हुई
सूर्य की प्रकाश में हो तुम।

वो चिड़ियों की मधुर
चहचहाहट मेंं हो तुम।
वो कोयल की मीठी
कूक में हो तुम।

वो लंबी ठंडी कँपकपाती रात की
प्यार की गरमाहट मेंं हो तुम।
अपनी झुलसाती धरती को देख
आसमान का अपने बादल
रूपी बालों की भींगी चोटी खोल
उसे जोर से हिलाना और
बारिश की बूँदो से
अपनी धरा को ठंडक पहुँचाने वाली
वो मीठी एहसास में हो तुम।

इस धरती पर
कहीं भी
जहाँ प्यार का आगाज हुआ
वहाँ की अँकुरित हुए
प्यार में हो तुम।

मेरे दिलोदिमाग में
हो तुम।
मैं कहीं भी रहूँ
कहीं भी जाऊँ
मेरी परछाई बन
सदा मेरे साथ में
हो तुम।

आई लव यू।
दिल से।।

प्यार से प्यार तक।
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प्यार कभी भी पूछ कर नहीं होता।।

प्यार कभी भी पूछ कर नहीं होता।।

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प्यार कभी भी पूछ कर नहीं होता
वो तो हो जाता है।
कभी साथ चलते चलते
जब कोई पीछे छूट जाए
और उसकी याद में
दिल आपका बेचैन सा हो जाए।
तो समझ लो कि
आपको प्यार हो चुका है।

प्यार कभी भी पूछ कर नहीं होता
वो तो बस हो जाता है।
वो हमारे ख्यालों का वश
हमसे छूट जाना।
और वो कटी पतंग की तरह
उड़ते उड़ते
उनके ही छत पर मंडराना।
ये प्यार नहीं तो क्या है।

वो रस्ते के किनारे खड़े
अकेले आम के पेड़
के अकेलेपन को दूर करना।
और हम दोनो का साथ में बैठ
किसी का इंतजार करना।
क्या ये कुछ और है??
या प्यार ही है।

वो क्लास में शिक्षक को छोड़
किसी और के शक्ल को निहारना।
और कुछ देर के लिए
सारी दुनिया भूलकर
बस उनके ख्यालों में डूबे जाना।
और शिक्षक का चौंक फेंक कर
होश में लाना।
क्या है ये?
अगर प्यार नहीं है तो।

वो किसी के भींगे आँख देख
दिल का फूट फूट कर रोना।
और ईश्वर से
उसके सारे कष्ट
खुद के लिए
भेंट में माँगना।
ये प्यार नहीं तो
क्या है??

प्यार ही है।
प्यार ही है।
प्यार ही है।

प्यार कभी भी पूछ कर नहीं होता।।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

सोचा नहीं था कभी मैने।

सोचा नहीं था कभी मैने।

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सोचा नहीं था कभी मैने।
इतनी दूर चला आऊँगा।
गुनगुनाते हुए कुछ नगमों को।
दिलों में घर बसाऊँगा।

जो गाया
दिल से गाया।
मानवता को पुनः जगाने को।

प्रेम और दया से बढ़कर
और कुछ भी नहीं है
इस संसार में
जन जन में
बाँटने को।
जाति धर्म के रंग हटाकर
बन बैरागी लगा
मानवता फैलाने को।

मानव! शरीर का घमंड ना रख
तेरा उसमें कुछ नहीं है।
आज जीते जी
जो उछल रहा है।
कल भस्म बन
तैरेगा गंगा में ।।

सोचा नहीं था कभी मैने।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top


मैं! मैं नहीं।

मैं! मैं नहीं।

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मैं क्या सोचूँ?
मैं क्या गाऊँ?
मुझमें नहीं है कोई शक्ति।
मैं तो हूँ
बस एक कठपुतली
जो हिलती नहीं है
बिन ईश्वर की मर्जी।

जो भी लिखवा रहा है मुझसे।
लिखता चला जा रहा हूँ मैं।
उसकी आदेश से
मानवता को सींचता जा रहा हूँ मैं।

ये शरीर,ये वानि
ये मन में उठती हुई तरंगें।
ये शब्द
ये वाक्य
कुछ भी नहीं है मेरे।
जो भी है
सब उसके हैं।
सब में
उसकी है शक्ति।

मैं तो केवल एक आत्मा हूँ।
जिसका स्थान
परमात्मा के चरणों में है।

ये शरीर मेरा नहीं
ये देश मेरा नहीं
फिर किस बात का अहम
पालूँ मैं।
आज इस परदेश में रहकर
लोगों से द्वेष क्यों
रखूँ मैं।

दो दिन की जिंदगी में
क्यों ना ईश्वर के
मार्ग पर चलूँ मैं।
ईश्वर की अनमोल भेंट को
व्यर्थ में क्यों गँवाऊँ मैं।
मानव हूँ
मानवता को
क्यों ना
जग में फैलाऊँ मैं।
मैं! मैं नहीं।








मैं! मैं नहीं।
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कर्म किए जा।।

आज हर दिल में
एक सवाल घूम रहा है।
क्या वो आने वाली
चुनौती के लिए
तैयार हो चुका है।

तैयारी लाख
कर ली हो आज हमने।
रात दिन लगा दी हो
मुकाम को हासिल करने।
पर क्या मेहनत अपनी
रंग लाएगी।
मुकम्मल समय आने पर
क्या उचित पदर्शन
हम कर पाएँगे?

यहीं पर
हम इंसान मात खाते हैं।
ज्यादा सोच सोच कर
काम बिगाड़ते हैं।
तैयारी पूरी ना होने पर
हम हार जाते हैं।
कर्म छोड़
भविष्य के फल की
चिंता कर
पछताते हैं।
कर्म किए जा।।
कर्म किए जा।।

कर्म किए जा।।
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प्यार करलो! प्यार का मौसम आया है।।

प्यार करलो! प्यार का मौसम आया है।

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प्यार ने ली अंगड़ाई है
मौसम ने ली जम्हाई है।
हरी ओढ़नी ओढ़ धरती
अंबर को देख
शर्माई है।
नदियाँ महासागर में मिल
तृप्ताई है।
कोयल ने प्यार के नगमें
गाई है।
पुष्पों ने भँवरो को
बहकाई है।
तितलियों ने हवा में
कलाबाजी दिखाईं हैं।
जहाँ देखो बस वहाँ
प्यार का खुमार
छाया है।
हर कण कण में
खुशियों की ओस समाई है।
हर जर्रे जर्रे ने
एक ही आवाज उठाई है।
प्यार करलो
प्यार का मौसम आया है।

प्यार करलो!प्यार का मौसम आया है।।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

मेरे हाथ में कोई हथियार नहीं।

मेरे हाथ में कोई हथियार नहीं।

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मेरे हाथ में कोई हथियार नहीं
मेरे साथ में कोई खड़ा नहीं।
मेरा जिस्म भी फौलाद नहीं
मेरे आवाज में भी हुँकार नहीं।

फिर भी निकल पड़ा हूँ मैं
चट्टान से दो दो हाथ करने को।
उसके अहम को चकनाचूर कर
उसे धूल में पटकने को।

माना कि वो मुझसे शक्तिशाली है
मेरे हड्डियों को वो तोड़ देगा।
पटक पटक कर जमीन पर मुझे
मेरे प्राण को भी वो हर लेगा।
पर चींटी ठान ले जो अगर
तो हाथी की भी जान ले सकती है।

माना एक पल को
मैं परास्त हो जाऊँगा
एक बार नहीं
सौ बार मूँह की खाऊँगा।
पर हौसले को परास्त
कोई कैसे कर सकेगा।
वो तो सोने देगा नहीं मुझे।
हिम्मत जुटा कर
फिर से
करूँगा वार।
लगातार।
जीत का स्वाद
जब तक चख ना लूँगा।

युद्ध जीती जाती नहीं
तलवार से।
फतह की जाती है
हौसले की वार से।

मेरे हाथ में कोई हथियार नहीं।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

कुछ तो खास है।

कुछ तो खास है।

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कुछ तो खास है।
जरूर कोई बात है।
जो मेरे मेहबूब ने
पत्र लिख कर भेजा है।

उस चिट्ठी की स्पर्श में
अजब सा अहसास था।
एक पल के लिए लगा जैसे
किसी को तो मेरा ख्याल था।
कोई तो है अपना
इस दुनिया में
जिसे मेरी परवाह थी।
वरना इन गैरों के बिच में
मैं खुद केअस्तित्व को
खो चुका था।

उस सुखद अहसास के तरंगों ने
सारे गम और सारे तनाव के भावों को
कहीं दूर ले जाकर फेंका।
और मन कमल की भाँति
खुशियों के किरन में
खिलखिला कर खिल उठा।

पत्र की एक एक शब्द में
अपनेपन का भाव था।
मानो हर शब्द चिल्ला चिल्ला कर
उनके प्यार की अथाह बता रहीं हों।
और हमें अपने पास
इश्क करने को
बुला रहीं हों।

कुछ तो खास है।
कुछ तो खास है।


कुछ तो खास है।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top





मैं जो गुम जाऊँ कभी

मैं जो गुम जाऊँ कभी

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मैं जो गुम जाऊँ कभी
चलते चलते जीवन के
मझधार में।
और जो कभी
छूट जाए साथ हमारा
बिच भरे मेले बाजार में।

और जो कभी
तुम्हें याद आए मेरी बहुत
जीवन की धार में।
तुम लौट आना
जरा पीछे
मैं खड़ा मिलूँगा
उन पंक्तियों के भाव में।

मैं सदा हूँ
सदा रहूँगा
तुम्हारे हृदय के आवास में।
जो तुम कभी उदास रहे तो
मैं गुदगुदी बन
तुम्हें हँसाऊँगा।
जो तुम पथ से
अपथ हुए तो
सहयात्री बन
सही मार्ग दिखाऊँगा।
मैं यहीं
तेरे सदा साथ रहूँगा
एक दोस्त बन
यारी निभाऊँगा।

मैं जो गुम जाऊँ कभी
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बेइंतहा प्यार करते हैं आपसे।।

बेइंतहा प्यार करते हैं आपसे।।

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तुम्हारे बिना हर लम्हें में
उदासी सी छाई है।
जब से ओझल हुए हो नजरों से
मेरे दिल ने चैन कहाँ पाई है।
हर वक्त तेरी खैरियत की
रब से दुहाई माँगी है।

कुछ पल बितने के बाद
तेरी स्मृति ने
दिल को ठंडक पहुँचाई है।
तेरी मिठी यादों के झरनों में भींग
हमने समय बिताई है।
कभी हँसा तो कभी मुस्काया
जो तूने गुदगुदी लगाई है।
तेरे टेढ़े मेढ़े सवालों में
तेरी मासूमियत की झलक पाई है।

मेरे निकट आते ही
तेरी बेफिक्री से
मेरी तरफ बहती चली आना।
और मुझे अपने सीने से लगाकर
सदा के लिए
मुझे अपने दिल में रखने की इच्छा रखना।
ठीक वैसे ही
जैसे कोई नदी की धारा
महासागर में मिल
हमेशा हमेशा के लिए एक हो जाते हैं।

कितना अद्भुत लगता है वह पल
जब हम निकट यों रहते हैं।
समय थम सा जाता है
और वातावरण मधुरमय सी लगती है।

और बिछुड़ने के पल निकट आते ही
हमारा दिल बेचैन सा हो जाता है।
साँसें तेज हो जाती हैं।
नैन भी छलक से जाते हैं।

कैसे अलग रह पाएँगे
हम एक दूजे के बिना।
हमारी साँस थम ना जाए कहीं
जो समय ने हमारा
साथ ना दिया।

बेइंतहा प्यार करते हैं आपसे।।



बेइंतहा प्यार करते हैं आपसे।।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

क्या सही है? क्या गलत है?

क्या सही है? क्या गलत है? 

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क्या सही है?
क्या गलत है?
किसी को कुछ नहीं खबर है।
मदहोशी की समा है।
मनमानी बेपनाह है।
बस जिसे देखो
स्वार्थ की चादर ओढ़े।
अपना काम बना रहा है।
एक मानव दूसरे मानव के हक का
भोग किए जा रहा है।
मानव के संस्कार के दिये की लौ
आज बुझती चली जा रही है।
जो आज उस पर लगाम ना लग पाया।
तो कल का शायद आखिरी शाम है।

इसलिए सुधर जा मानव।
मानवता के पथ पर लौट आ।


क्या सही है? क्या गलत है?
 written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

मैं चला था कभी अकेला

मैं चला था कभी अकेला

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मैं चला था कभी अकेला
एक क्रांति लाने के लिए।
दर दर को भटका था मैं
समर्थन पाने के लिए।
कुछ ने हामी भरी
तो कुछ ने
धक्का मार निकाला था
घर से।

जो साथ चले थे हमारे
वो इंकलाब को घर घर पहुँचाने।
बहुत धन्यवाद है उन महानुभावों का
जिन्होंने हर विपरीत घड़ी में
हमारा साथ निभाएँ।

अज्ञानता के चिराग को
जो हम ना बुझा पाएँगे।
संपूर्ण साक्षरता के बिना
हम भारतवासी
विकसित कैसे कहलाएँगे।
आज हमारे देश में
वो इंकलाब साकार हुआ है।
हर घर साक्षर योजना का सफर
आज कामयाब हुआ है।

जय हिन्द।।
जय भारत।।





मैं चला था कभी अकेला
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

आज फिर से दीपों के महोत्सव ने हमारे जीवन में दस्तक दिया है।

आज फिर से दीपों के महोत्सव ने

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आज फिर से दीपों के महोत्सव ने
हमारे जीवन में दस्तक दिया है।
और फिर वही अतुल्य उत्साह और खुशी ने
हमारे दिल में एक नई उमंग और नई चाह को
पैदा किया है।
क्या बताएँ?
लग रहा था मानो
कि कब रात हो
और हम दीयों से
सारे जग को जगमगाएँ।

एक वर्ष की बिछड़न के गम का दर्द
मानो आज दिल में भर आई है।
इतनी देर क्यों लगा दिए
ओ पिया
मैने तो तेरी याद भी मिटाई थी
जद्दोजेहद से।

एक एक पल कठिन हो रहा था बिताना
शाम कब हो
कि हम अपने घर को
दिए से जगमगाएँ।
पर क्या बताएँ
मानो सूरज भी आज
ढलने को तैयार नहीं हो रहा हो।
समय तो मानो आज जैसे
चलना ही भूल चुका है।

समय बीता
आई फिर से
हमारे मधुर मिलन की बेला।
ईश्वर की वंदना कर
हाथों में
दियों की थाली ले
चलें हम रोशन करने
अपने प्यारे घोसले को।

कितना मनोहर
कितना प्यारा
लग रहा था वह सुरम्य दृश्य।
दूर दूर तक टिमटिमा रहे थे सभी के घर
मानो तारों ने बदला हो
आज अपना देश।

बाहर के अँधियारे को
हमने तो भगा दिया।
पर क्या
अपने अंदर विरजमान अंधियारे पर भी
हमने सही प्रहार किया।
आइए आज हम मिल
एक प्रण करे
अपने अंदर बैठे तम को
मिटा देंगे हम सभी।


आज फिर से दीपों के महोत्सव ने  हमारे जीवन में दस्तक दिया है।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top




आज कोई बता दे ये मुझे।

आज कोई बता दे ये मुझे।

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आज कोई बता दे ये मुझे।
किस बात का अहम
दिल में बसा कर रखे हैं हम सभी।

जिसे देखो बस
वो घमंड में चूर है
किसी को किसी से
बात करने की नहीं तमीज है।

भला कोई बाप के ऊमर के इंसान को
उसके नाम से बुलाता है।
और कभी कभी तो उन्हें भद्दी गाली देकर
वो अपना संस्कार भी बताता है।

भले ही तुमने अच्छी पढ़ाई करके
अच्छी तालीम हासिल की हो।
पर मानवता के इम्तिहान में
तुम आज फैल हो चुके हो।

क्या अच्छी तालीम ही
इंसान को ऊँचाइयों तक पहुँचाता है?
बिना अच्छे संस्कार के
कोई कितनी भी अच्छी तालीम हासिल करले
वो हमेशा गर्त में ही जाता है।

अपने से बड़ों की इज्ज़त
छोटों से प्यार
अरे भाई!
क्या नहीं होने चाहिए
अपने ये संस्कार।


आज कोई बता दे ये मुझे।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

मुझे अच्छा लगता है।

मुझे अच्छा लगता है।

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तुम्हारे कदम के साथ कदम मिलाकर चलना
मुझे अच्छा लगता है।
तुम्हारे स्वर में स्वर मिलाकर गुनगुनाना
मुझे अच्छा लगता है।
तुम्हारी राह में पलके बिछाए तुम्हारा इंतजार करना
मुझे अच्छा लगता है।
तुम्हारी छोटी छोटी बातों पर जिद्द करना
मुझे अच्छा लगता है।
तुम्हारी हर छोटी बड़ी ख्वाहिशों को पूर्ण करना
मुझे अच्छा लगता है।
तुम्हारा हम पर हक जताना
मुझे अच्छा लगता है।
तुम्हारा हमारे माँ बाबू जी पर अपना हक जताना
मुझे अच्छा लगता है।
तुम्हारा मेरे भाई बहन को सही दिशा दिखाना
मुझे अच्छा लगता है।
तुम्हारा मेरे जीवन में आना
मानो ईश्वर को पाना है।
तुम्हारा मेरे जीवनपट को
विभिन्न रंगों के खुशियों से रंगना
मुझे अच्छा लगता है।
आई लव यू!
दिल से
बहु..उ...त ज्यादा।।😍

मुझे अच्छा लगता है।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top


आज कल एक नई इच्छा मन भँवरे ने जताई है।

आज कल एक नई इच्छा

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आज कल एक नई इच्छा
मन भँवरे ने जताई है।
और पहली दफा ऐसा हुआ है
आत्मा की भी स्वीकृती उसमें पाई  है।।

घर से बहुत दूर बैठा था
अनजान शहर में
अनजान लोगों के बिच।
जान पहचान तो थी
बहुत लोगों से
पर कहाँ  मिला था
कोई अपना मित।

दीवाली का मौसम था
सर पर।
पट-पटाक,धम धड़ाम की आवाजों
से गूंज रहा था सारा आसमान।
तभी मोबाइल की घंटी बजी
उठाया तो पाया
माँ का फोन आया था उस शाम।

दीवाली की शुभकामनाएं देने को
किया था माँ ने फोन।
और बार बार बस
एक ही चीज रट रही थी।
माँ बाबूजी से मिलने का
नहीं करता है मन।

मैं महसूस कर रहा था अपनी लाचारी
क्या रिश्तों पर पड़ गई हमारी नौकरी भारी।
खोखले रिश्तों को निभाने के लिए
पवित्र रिश्तों की बलि
और कब तक चढ़ाएँगे।
इस बार हर कीमत पर हम
अपने परिवार संग छठ मनाएँगे।

आज कल एक नई इच्छा मन भँवरे ने जताई है।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

मैं भले तुम्हें अपने जुबान से इकरार नहींं कर पाता।

मैं भले तुम्हें अपने जुबान से इकरार नहींं कर पाता।

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मैं भले तुम्हें अपने जुबान से
इकरार नहींं कर पाता।
पर हमारी नजरें
धोखा दे जातींं हैं अक्सर।
ना चाहते हुए भी ये शरारती आँखें
पल पल
बस तेरे अक्स के खोज में
बावरी सी
दौड़ी चली जाती है इधर उधर।
कुछ तो जादू किया है तुमने
या तो पिछले जन्म का
है कोई चक्कर।
हो सकता है
हमारी पिछली अधूरी कहानी को
इस जन्म में पूर्ण करने को
दी हो
रब ने अवसर।


मैं भले तुम्हें अपने जुबान से इकरार नहींं कर पाता।
written by Sushil Kumar at kavitadilse.top

तेरी किस्मत तेरे हाथ में है।

तेरी किस्मत तेरे हाथ में है। kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। मैं चला जा रहा था अकेले,झुंझलाते हुए खुद से। कभी खु...