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प्यार के बुखार पर कल्कि प्रहार।

प्यार के बुखार पर कल्कि प्रहार।

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जब रश्मि भास्कर की जलज पर पड़ती है
वह खिल उठता है।
ठीक वैसे ही जब तुम मेरे नजरों के सामने आते हो
मेरा दिल भी खिल उठता है।
और प्यार के भौसागर की गहराई में डूबता चला जाता है।
जहाँ सारे ख्यालों और सपनों में
बस तुम्हारा ही बसेरा होता है।
भूख और प्यास भी अपने रास्ते पर चलते चलते
कहीं गुम हो जाते हैं।
मानो कि उन्हें भी किसी ने सम्मोहित कर
सुला दिया हो।
जहाँ भी देखूँ बस तुम ही तुम नजर आती हो।

प्यार का बुखार सर चढ़कर बोल रहा था।
मेरी हालत माँ बाबू जी को बहुत परेशान कर रहा था।
तभी पापा ने पूछा
क्या तकलीफ है तुम्हें बेटा।
मेरे मूँह से निकल आया
शायरी दर्दे दिल की।
हर मर्ज की दवा है दुनिया मे
पर मर्जे इश्क की दवा
ना कभी मिला था इस दुनिया में
ना कभी मिल पाएगा।
आप तो बस पापा
मुझे मेरे हालत पर छोड़ दीजिए।
मुझे इश्क की खुमारी में जीने दीजिये।

फिर क्या
कलयुगी प्यार का भूत उतारने के लिए
कल्कि का अवतार ले
उस दिन जो पापा ने मुझे धोया था
आज तक हर स्त्री में मुझे
माता और बहने दिखाई दे रहीं हैं।





written by Sushil Kumar at kavitadilse.top
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