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दोस्त,दोस्ती और दोस्ताना।।

बिना झिझक,बिना संकोच के
तुम हमेशा चले आते हो मेरे पास।
जैसे गोरैया चली आती है रोज
हमारे आँगन में
चुगने दाना को।
और पूरा घर
उसके चीउँ चीउँ के मधुर आवाज से
गूँज उठता है।।
मानो की वो कोई गीत गुनगुना रही हो।
और सुना रही हो
हमारी दोस्ती का तराना।।
ठीक वैसे ही तुम भी
चले आते हो हमारे पास।
बिना घंटी बजाए
दरवाजा खोल
घर के अंदर
लेकर अपना समय।।
फिर हम और तुम मिल
बना लेते हैं।
एक दूसरे के समय को मिला
मस्ती भरी बातों का गुलदस्ता।।
बातों का सिलसिला चल पड़ता है।।
कभी तुम मुझे खींच
भूत में ले जाकर गुदगुदाते हो।
कभी मैं तुम्हें अपने साथ भविष्य में
सैर करवा कर हँसवाता हुँ।।
इन बातों के सिलसिले में
पता ही नहीं चला।
समय कब आ गया
हम दोनों के बिछुड़ने का।।
हम दोनों अलग हुए
एक दूसरे से।
कुछ मीठी यादों के साथ
फिर से कल मिलने के लिए।।




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