8 Aug 2018

Main khamosh baitha tha apne tasavvur mein

Shayari



मैं खामोश बैठा था अपने तस्व्वुर में।

कुछ नया विषय मिल जाए मुझे
लिखने को।।
तभी खुले बीच पर जाकर लेटा
उन रेतों पर।
जहाँ सागर की लहरें उठ रहीं थी
कुछ कहने को।।
मानो कह रहीं हों
ज़रा पास आ जाओ आज।
बहुत अकेला महसूस कर रहीं हूँ
मेरे कोई नहीं है पास।।
मैंने पाया कि
लहरें होने लगी हैं विक्राल।
मानो वो बस हमें
अपने हृदय की गहराई में
समाने को है तैयार।।
सागर का भयावह रूप देख
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
निकल भागा कल्पना की मृगतृष्णा से
जो मुझे निगलने को तैयार हुई।।



main khaamosh baithaa thaa apne tasvvur men।

kuchh nayaa vishay mil jaaa mujhe

likhne ko।।

tabhi khule bich par jaakar letaa

un reton par।

jahaan saagar ki lahren uth rahin thi

kuchh kahne ko।।

maano kah rahin hon

jraa paas aa jaao aaj।

bahut akelaa mahsus kar rahin hun

mere koi nahin hai paas।।

mainne paayaa ki

lahren hone lagi hain vikraal।

maano vo bas hamen

apne hriaday ki gahraai men

samaane ko hai taiyaar।।

saagar kaa bhayaavah rup dekh

mere rongte khde ho gaye।

nikal bhaagaa kalpnaa ki mriagatriashnaa se

jo mujhe nigalne ko taiyaar hui।।


Written by sushil kumar

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