Email subscription

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

मैं खामोश बैठा था अपने तस्व्वुर में

मैं खामोश बैठा था अपने तस्व्वुर में।
कुछ नया विषय मिल जाए मुझे
लिखने को।।
तभी खुले बीच पर जाकर लेटा
उन रेतों पर।
जहाँ सागर की लहरें उठ रहीं थी
कुछ कहने को।।
मानो कह रहीं हों
ज़रा पास आ जाओ आज।
बहुत अकेला महसूस कर रहीं हूँ
मेरे कोई नहीं है पास।।
मैंने पाया कि
लहरें होने लगी हैं विक्राल।
मानो वो बस हमें
अपने हृदय की गहराई में
समाने को है तैयार।।
सागर का भयावह रूप देख
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
निकल भागा कल्पना की मृगतृष्णा से
जो मुझे निगलने को तैयार हुई।।

No comments:

मैं हिन्दू नहीं।

मैं हिन्दू नहीं। kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। मैं हिन्दू नहीं ना मैं मुसलमान हूँ। मैं सिख नहीं ना मैं क...