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बस यही होता आ रहा है।

बस यही होता आ रहा है।
निरंतर चलता जा रहा है।।
समय रहते कोई कदर नहीं करता।
मरणोपरांत ही क्यों जय जयकार होता है।।
आज जीवित है तो अभद्र व्यवहार।
हर वक़्त मिलती है यही लताड़।।
तुम निकम्मे हो
किसी काम के नहीं हो यार।
अरे भाई
कोई कितना सहेगा अत्याचार।।
मनुष्य है
कोई मशीन नहीं है।
कब तक कोई घुटन सहेगा लाचार।।
आज नहीं तो कल वो बेचारा।
सूली पर जान दे देगा लटक कर।।
फिर निकलेगी भीड़ मोमबत्ती लेकर।
उन्हें देने को श्रद्धांजलि।।
और भूला देंगे दो दिन में उन्हें।
अपने काम में व्यस्त होकर।।
पर सोचो
जिस घर का इकलौता चिराग
अपनों को
अंधरे में
धकेल कर चला गया हो।
क्या होगा उस माँ बाप का
जिनका बुढ़ापे की लाठी ही
गुम गई हो।।
क्या होगा उस पत्नी का।
जो अपने हमराही को
कहीं भीड़ में खो दी हो।।
क्या होगा उस बच्चे का
जो अछूता रह जाएगा
बाप के प्यार से।।

बस बस बस
बहुत हुआ अब।
अब कोई नहीं करेगा आत्मदाह।।
बहुत सह लिया अब तुमने।
आवाज़ उठाने का वक़्त आ गया है।।
दबे कुचले भावनाओं को मिटाकर।
शेर सा दहाड़ने का समय आ गया है।।
बहुत डर लिया इंसानों से।
अब दुनिया को मुठ्ठी में करने का वक़्त आ गया है।।

आ गया है।

आ गया है।

आ गया है।



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