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मन की टीस।।

मन में एक टीस लिए,
                   ना जाने कब से जी रहा।
दुखों के पहाड़ तले
                    ना जाने कब से दबा रहा।
खुशियों की तलाश हमारी
                   पता नहीं कब से जारी है।
जिम्मेदारियों की बोझ तले
                   मंजिल धूमिल होती चली जा रही है।
कसक तो कल भी थी
                   और आज भी है खुशियों को समेटने का।
दुख बस इस बात की है,
         खुशी नाम मात्र,और दुख बहुत ज्यादा है इस जीवन में।

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