14 Dec 2019

मन की टीस।। mann ki tis.

Shayari



मन में एक टीस लिए,

                   ना जाने कब से जी रहा हूँ।
दुखों के पहाड़ तले
                    ना जाने कब से दब रहा हूँ।
खुशियों की तलाश में
                   ना जाने कब से भटक रहा हूँ।
सदियां बीत गई हैं
                  पर उम्मीद की लौ को बुझने नहीं दिया हूँ।
कसक तो कल भी थी
                   और आज भी है खुशियों को समेटने की।
दुख बस इस बात की है,
         खुशी बस नाम मात्र की,और दुख बहुत ज्यादा है बटोरने को।


man men ek tis lia,

                   naa jaane kab se ji rahaa hun।

dukhon ke pahaad tale

                    naa jaane kab se dab rahaa hun।

khushiyon ki talaash men

                   naa jaane kab se bhatak rahaa hun।

sadiyaan bit gayi hain

                  par ummid ki lau ko bujhne nahin diyaa hun।

kasak to kal bhi thi

                   aur aaj bhi hai khushiyon ko sametne ki।

dukh bas es baat ki hai,

         khushi bas naam maatr ki,aur dukh bahut jyaadaa hai batorne ko।


Written by sushil kumar

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