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किताबें और उनका अकेलापन।।

हर शाम मैं ताकती रहती हूँ।
बन्द शीशों से झाँकती रहती हूँ।।
कब आओगे तुम पास हमारे?
बस यही सोच में डूबी रहती हूँ।।
फिर कौन मुझे अपनाएगा?
अपने बाहों में लेकर सो जाएगा।।
अपने स्पर्श से मेरे हर पन्नों को पलटेगा।
मेरे जीवन के अध्याय को पढ़ जाएगा।।
हर कोई आज अपने में व्यस्त दिख रहा है।
हमें छोड़
मोबाइल में व्हाट्सएप पढ़ रहा है।।
बिताए गएँ हमारे साथ मीठे पलों को भूल।
अब सभी कोई ऑनलाइन स्लाइड्स पढ़ रहा है।।
हर रिश्ते का अपना महत्व है।
सभी को निभाना हमारा कर्तव्य है।।
क्या पता?
अब और मैं कितना दिन जी पाऊँ?
अकेलेपन के दीमक ने मेरे हर पन्ने को
जो खाना शुरू दिया है।।




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