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आ जाओ माँ

आज जब भी तकलीफ़ होती है।
दुनिया की बातें कचोटती है।।
घर बाहर
हर जगह से
जब
केवल तनाव ही महसूस होती है।।

बहुत याद आती हो माँ
जब तुम ढाल बनकर बीच
में आती थी।
मेरे अंदर के आत्मविश्वास को
पुनः तुम
श्री कृष्णा बनकर जगाती थी।।
और मैं अर्जुन उठ खड़ा होता था।
दुनिया से लोहा लेने को।।

आ जाओ माँ
आ जाओ फिर से
बहुत याद तुम्हारी आती है।।
आज फिर से अर्जुन दुविधा में है
फँस कर अपने ही चक्रव्यूह में।।

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