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उठने लगे हैं सवाल

उठने लगे हैं सवाल
आज हमारी वजूद पे।
कहीं हम गुम तो नहीं हो गए हैं।
भरे इस महफ़िल में।।
हर जगह चकाचौंध है
पैसे और हैसियत वालों की।
जिसे देखो बस गुमान में है
अपने औकात के रसूख में।।
मैं ठहरा कवि।
प्रेम और भाईचारे के
भावनाओं से ओतप्रोत।।
मुझे भी बुला लिया।
किसी रसूख वाले ने प्रेम से।।
मैं पहुँचा उनके महफ़िल में।
बड़े ही अदब से।।
सूट डाल पहुँचा था।
ब्रांडेड रेमंड से।।
मेरे संग पहुँचे थे
कुछ और कवि भाईजान।
जान लगा डाली थी
जिन्होंने
रसूखदारों के लिए
कविता बनाने में।।
हमने ज़मीर खो दी है आज।
रसूखदारों के खजाने से।।
क्या हम वाकई जिंदा हैं।
अंतःकरण के दब जाने से।।


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