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गुरु वाचाल।।

मैं अवगुण दूसरों की बताता रहा।
दूसरों को सदाचार सिखाता रहा।।
मानो मैं सर्व गुण निपुण हो।
और दुनिया सारी दुर्गुणों से भरी ।।
आत्मसुख बड़ा मिलता है।
दूसरों को सही राह दिखाकर।।
गुरु बनना आसान है।
पर उतना ही मुश्किल है
सही राह पर चल पाना।।
आज मैं भी भटक गया था।
तभी मुझे भी मिल गएँ एक गुरु वाचाल।।
और दिया भाषण बड़ा सा।
और कराया मेरे अवगुण से मुझे अवगत।।
फिर मैंने जब झाँका स्वयं में।
पाया खुद को अवगुणों का भंडार।।
फिर क्या
पहले खुद को सुधारने का मैने किया प्रण।
वरना गुरू बन नहीं दूँगा किसी को प्रवचन।।

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