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जिम्मेदारियाँ हमेशा ख्वाहिशों पर भारी पड़ जाती हैं।।

बचपन में ही
जिम्मेदारियों से मेरे कँधे झुक गए थे।
मम्मी पापा के कंधे तो हमारी जिम्मेदारी लेकर झुक गया।।
सारी ख्वाहिशों को ताख पर रख कर
मेरी भविष्य को साकार करने में जुट गए।।
आज जो कुछ भी बन पाया हूँ
उन ख्वाहिशों के कुर्बानी के कारण ही पाया हूँ।।
ख्वाहिशें तो मेरी भी थी।
मेरे पापा मुझे कार में स्कूल छोड़ने आए।।
पर उसके लिए
घर पर कार तो होनी चाहिए।।
पापा का मिडिल क्लास जॉब
स्कूल फीस मुश्किल से जुट पाता था।
पर वे अपना सपना भूलकर
हमारा भविष्य बनाने में लग गए।।
क्या इतना काफी नहीं था?
मेरा भी उनके बारे में सोचना।।
अब मेरी जिम्मेदारी थी कि
ज्यादा उन पर बोझ ना बनूँ।
अपनी जिम्मेदारी समझकर
उनके ख्वाहिशों को पूर्ण करूँ।।





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