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माँ क्यों नहीं तुम आकर,मुझे अपने आँचल में सुलाती हो/

जीवन के पथ पर चलते चलते,मैं बहुत थक चुका हूँ माँ।
सारी जिम्मेदारियों की बोझ उठाते उठाते,मेरे कँधे भी झुक चुके हैं माँ।
जबसे बचपन छोड़,मैने जवानी में कदम रखा है माँ।
जिम्मेदारियों के बोझ तले,साँस भी ले नहीं पाता हूँ माँ।





एक राष्ट्रवादी की आखिरी ख्वाहिश।

एक राष्ट्रवादी की आखिरी ख्वाहिश। kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। माँ आज मैं बहुत खुश हूँ। जिस मिट्टी से मैने जन...