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जिन्दगी की नब्ज पकड़कर चलना मुझे आ गया।

जिन्दगी की नब्ज पकड़कर चलना मुझे आ गया।
मुसीबत भरे लम्हों को झेलना मुझे आ गया।
जीवन के हर परीक्षा को हल करना मुझे आ गया।
दुख के हर लम्हों में,खुशियों को समेटना आ गया।
जिन्दगी बहुत छोटी सी है
उस अनमोल पल को जीना गया।

मैं अपनी जिम्मेवारी को कैसे निभा पाऊँगा।

 मैं अपनी जिम्मेवारी को कैसे निभा पाऊँगा।


अपनी ही नौकरी के बोझ तले,


कब तक साँस ले पाऊँगा।


घर पर जब पहुँचता हूँ,


तो दिल में ख्याल बस यही आता है,


कि अपने परिजनों के लिए बहुत कुछ करना है।


माँ के लिए गले का हार लेना है।
बहन की शादी के लिए अच्छा लड़का देखना है।
पापा के लिए नयी गाड़ी लेनी है।

पर जब दफ्तर में पहुँचता हूँ,


तो पाता हूँ,कि हर कोई बस मेरे कंधे पर बंधूक रख कर गोली चलाना चाहते है।
ऐसे में कब तक खुद को बचा पाऊँगा?ये बहुत बड़ा सवाल है।
मैं अपनी जिम्मेवारी को कैसे निभा पाऊँगा।




मन बावरे संभल जा।

मन  बावरे संभल जा।
                   क्यों भटक रहा है इधर उधर।
ईश्वर की भक्ति को छोड़,
                    क्यों फँस रहा है बंधन में।



पप्पु पास हो गया।


क्या कर रहे हो पप्पु,थम के जरा साँस तो ले लो।


क्या कर रहे हो पप्पु,


                          थम के जरा साँस तो ले लो।



भागम भाग क्यों मचा रखी है,


                          क्या धुंढ रहे हो पप्पु।




कभी इधर,तो कभी उधर,


                           क्यों बंदर जैसा फाँद रहे हो।



एक जगह स्थिर होकर,


                            क्यों नहीं तू सोच रहा है पप्पु।




इतनी मेहनत,इतना जतन ,


                             तू किस लिए,किये जा रहा है पप्पु।



मालूम है ना,कल फिर से फैल हो जाएगा तू।



                             फिर इतना दिमाग क्यों भिड़ा रहा है ।




पप्पु पास हो जाएगा,


                              क्या ये कभी सच हो पाएगा।



सारा जग हैरान है कि पप्पु



                              पास कब हो पाएगा?😢





मेरा दिल है दिवाना☺

मेरा दिल है दिवाना,जो हर खुबसूरत चेहरे को देख धड़कता है।



कभी चहकता है,तो कभी बहकता है।



कभी शायरी के बहाने,तो कभी कविता के बहाने,जुबान भी हमारा फिसलता है।



दिल भी हमारा बड़ा नादान है,जो हर कली को देख हमेशा महकता है।


तारे भी चाँद की खुबसूरती देखकर टिमटिमाते हैं।


कभी बस में किसी हसीना से मुलाकात हो जाया  करता है।



तो कभी चलते चलते राह में किसी हसीना से मुलाकात हो जाया करता है।



और फिर क्या दिल दिल धक धक,



धक धक दिल दिल,तब से अब तक,अब से कब तक।



मैं और मेरा तनाव का साथ


मैं और मेरा तनाव का साथ

मानो दो जिस्म एक जान हैं आज



जितना भी खुशनुमा माहौल हो कहीं

पर तनाव की यारी है बहुत पक्की

हमेशा हमारी साथ जो निभाती है।



अपने छोड़ जाते हैं  साथ

बुरे समम में हमारे।



एक तनाव ही तो है,हमारा सच्चा दोस्त

जो नहीं छोड़ता है हमें, किसी भी पल में।


इन दिनों भी कितना तनाव हम झेल रहे हैं आज कल में।


बाहर वालों का तो धर्म ही है तनाव देने का

पर अपने भी बख्श नहीं रहे हैं

हर एक क्षण में।







अपनी पहचान।

                            श.प्
कर्म ही पहचान है हमारी।
             कर्म ही स्तम्ब है हमारी जिंदगी की।
कर्म से ही बनता है हमारा शरीर,
            और  कर्म से  ही निर्धारीत होता है हमारा संस्कार।

         

दो दिन की जिंदगी


  दो दिन की जिंदगी को

                व्यर्थ में क्यों गँवाते हो।

जीवन के हर पन्ने पर,

                गंदगी क्यों फैलाते हो।

खाली हाथ आये थे तब,

           अब मुट्ठी क्यों नहीं खोल पाते हो।

लोभ मोह और क्रोध इर्ष्या वश

      बैंक बेलेंस और प्रोपरटी छोड़ नहीं पाते हो।

अपनों के भावनाओं को बिना समझे
                               क्यों ठेस  पहुँचाते हो।

जिस माँ बाप ने सदा तुमसे प्यार से बोला।

                     आज तुम उनसे क्यों खखुआते हो।

बिना कारन उनका दिल दुखाकर,

                         नैनों से अक्ष्रु क्यों गिरवाते हो।

 सभी के अरमानों को कुचलते हुए,

                          क्यों आगे चले जाते हो।

जरा सा रुक कर,दो पल की साँस लेकर,

               क्यों नहीं अपनो से प्यार से बतियाते हो।

सबको साथ लेकर चलने की,
     
                   क्यों नहीं जिम्मेवारी उठाते हैं।




वह डरावनी रात !

वह रात घंघोर अंधेरा था,
              सड़क पर मैं अकेला था।
धीरे धीरे कदम  रख रहा था,
              क्योंकि हर जगह बस सन्नाटा  था।
हर चीज डरावना था,
               दिल भी तेजी से धकधका रहा था।
चलते समय मानो एसा लगता,
                जैसे कोई पीछा कर रहा था।
भूत पिशाच का डर रह रह कर,
                  मन में भय घर कर रहा था।
कभी आगे तो कभी पीछे
                   टोर्च जलाकर देख रहा था।
फिर रूक रूक कर,हर दूसरे पल में,
                      बिल्ली जोर जोर से रो रही थी।
वह आवाज सुन सुन कर मेरा,
                       धड़कन रुका जा रहा था।
कदम भी मेरा तेजी से,
                      घर की ओर चला जा रहा था।
जैसे तैसे घर जब पहुँचा,
                       आँखों में नींद नहीं आ रहा था।
जरा सा पलक झपकते ही,
                        भयानक सपना आ रहा था।
मेरे जीवन की वह भयानक रात को
                         आज भी भूल नहीं पा रहा हूँ।
             
               

               



अहसास

                             श.प्र.
जिंदगी के हर अहसास को जीना सीख लो।
जीवन के हर पग पर चलना सीख लो।
हर मिठास और करवाहट को जीह्वा पर जगह दो।
खुशी और गम के लम्हों को जीना सीख लो।
जीवन के हर धारा में,परमात्मा की मौज है।
ईश्वर की हर मौज में,रहना सीख लो।


हर दिल की आवाज हूँ मैं।

हर दिल की आवाज हूँ मैं।
             उगते हुए सुरज की आगाज़ हूँ मैं।
नव युवकों के  सोच और विचार में हूँ मैं।
             देश के आम आदमी की हूँकार में हूँ मैं।
हर दबी हुई आवाज की दहाड़ में हूँ मैं।
               हर निराशाओं की आश में हूँ मैं।
 हर दुखी व्यक्ति की खुशी में हूँ मैं ।
             हर अंधियारी मन की रोशनदान हूँ मैं।
हर खिलाड़ीयों की प्रयास में हूँ मैं।
                 हारी हुई बाजी के जीतने की विश्वास में हूँ मैं।
हाँ सही पकड़ा आपने
                                आत्मविश्वास हूँ मैं।

             


             
              

अहंकार ही हमारा दुश्मन है।

जब जन्मे थे इस धरती पर बंदे,
                                    क्या लाये थे संग में ।

जब जाओगे जग छोड़कर,
                             क्या लेकर जाओगे संग में।

खाली हाथ ही आए थे बंदे,
                              और खाली हाथ ही जाओगे।

फिर मेरा और तेरा  करते हुए
                                 जग में क्यों  बौढ़ाए हो।

सभी लोग यहाँ पागल हैं,
                                 अपने बेंक बेलेंस बढ़ाने में।

प्रोपरटी की लाईन लगा दी है,
                               अपने ब्लेक मनी छिपाने में।

बड़े बड़े राजा और अरबपती,
                                 सभी छोड़ गये अपनी सम्पत्ति।

धर्मराज ने भी नहीं बख्शा उन्हें,
                                 ले देकर उनसे बख्शिश।

फिर मेरा क्या,और तेरा क्या
                                 सब कर्मों का फेरा है बंदे।

कर्म जैसा किए  हो पूर्व जन्म में
                                  वैसे ही संस्कार आप पाओगे।

तेरा कुछ है क्या यहाँ बंदे,
                          जो तू अहम को पाले हो।


ये धन दौलत और शरीर की काया,
                                      सब में मेरी माया है।

फिर इतनी अकड़ तू किस लिए,
                              अपने भाईयों पर इतना दिखाता है।

भूला रहता है,अपनी सच्चाई से,
                              बस अपने अहम बस सबको दबाता है।

अहंकार रुपी मैल धुलने के बाद ही,
                                 तुम योग्य बन पाओगे।

परमात्मा में समाने की शक्ति,
                                 तभी प्राप्त कर पाओगे।
               






ऐ मानस सम्भल जा जरा।

ऐ मानस सम्भल जा ज़रा,थोड़ा समय भक्ति में दे दे।
क्यों भटक रहा है इधर उधर,धुंडता फिर रहा है क्षणभंगुर सुख।
कभी धुंड रहा था बचपन में एक प्यारा सा खिलौना।
आज धुंडता फिर रहा है हर जगह,तू पैसा और प्यारी सी लैला।

ऐ मानस सम्भल जा ज़रा,थोड़ा समय भक्ति में दे दे।

एक बात बताना ऐ मानस,क्या किसी अपने को कभी नहीं खोए हो।
सच में बताओ,ऐ मानस,क्यों तुम उस दिन खूब नहीं रोए हो।
अगर रोए हो,तो सोचे भी होगे,सभी कहाँ चले जाते हैं हमें छोड़कर।
फिर कुछ दिन बीत जाने के बाद,उन्हें भूल,काम में लग जाते हैं हमलोग।
सच में बताओ,ऐ मानस,लोग मरने के बाद कहाँ चले जाते हैं।

ऐ मानस सम्भल जा ज़रा,थोड़ा समय भक्ति में दे दे।

हर कोई बस अपने समय को,व्यर्थ में यहाँ गँवाते हैं।
भूल जाते हैं स्वयं को यहां,और दुनिया में खुद को फँसाते हैं।
आत्मा की सच्चाई से,जीते जी वाकिफ नहीं हो पाते हैं।
बस क्षणभंगुर चीजों के लिए,मरते दम तक इच्छा जताते हैं।
एक चीज़ बताओ ऐ मानस,क्या मरने के बाद भी,
ये चीजें काम में आती हैं।

ऐ मानस सम्भल जा ज़रा,थोड़ा समय भक्ति में दे दे।

आज अगर अपने अनमोल समय में,भक्ति के लिए समय नहीं निकालोगे।
तब तुम कभी नहीं समझ पाओगे,कि ये शरीर तुम्हारा है नश्वर।
आज यह मनुष्य योनि में है,कल किसी ओर योनि में  चला जाएगा।
जाग जा ऐ इंसान,वरना कल को नर्क में पछताओगे।

ऐ मानस सम्भल जा ज़रा,थोड़ा समय भक्ति में दे दे।



आज फिर से,मैने जी लिया अपने बचपन को।

आज नये साल के अवसर पर,हम बहुत खुश थे और उत्साहित।
हर दिल में था खुशी,और कुछ नया करने की थी दिल में गुंजाइश।
आज पापा मम्मी हमारे साथ में जो थे,यह अवसर आया था पाँच वर्षों में।
क्यों ना कुछ ऐसा किया जाए,जो हो नया बिल्कुल उनके लिए।
आज हमने फिर जुहु बीच घूमने की योजना बनाई थी।
पापा मम्मी हमारे आज तक,समुद्र तट देख नहीं पाए थे।
फिर क्या था,बुक किए केब हम और निकल पड़े  जुहु की ओर।
वहाँ पहुँच कर पता चला कि,क्या हम मिस यहाँ कर रहे थे।
पापा मम्मी की खुशी और उत्साह,जो समुद्र तट को देखकर आया था।
ऐसा लगा अपने बचपन को,दुबारा जीने का अवसर पाया था।


आओ मिल कर लिख चले,एक नया अध्याय हम।

नया साल,नयी दिन,
आओ मिल कर लिख चले,एक नया अध्याय हम।
और फिर से आज नयी सुवह का आगमन पुनः हुआ है।
अच्छाई की रोशनी से,सूरज ने फिर से अंधकार की बुराई पर विजय ध्वज लहराया है।
सकारात्मक सोच की शक्ति के सामने,आज फिर से नकारात्मकता हारी है।
प्यार की ताकत के सामने आज फिर से नफरत का सर झुका है।
हम भी आज कसम खा लें कि,क्यों ना हम भी आज से मानवता को दिल से अपनाएँगे।
और नये साल में,नये ऊर्जा के साथ,दुनिया से अराजकता को हम मिलकर हटाएँगे।

वतना मेरे वतना वे।

वतना मेरे वतना वे kavitadilse.top द्वारा आप सभी पाठकों को समर्पित है। वतना मेरे वतना वे तेरा इश्क़ मेरे सर चढ़ चढ़कर बोल रहा है। एक जन्...