रविवार, 18 जुलाई 2021

बिछड़न अपनो से

बिछड़न अपनो से

बिछड़न अपनो से


मैं जा तो रहा हूँ।

पर जाने की इच्छा नहीं।

मन बहुत ही भावुक है।

फिर से लौट जाने को वहीं।


ये पेट भी 

क्या चीज बनाई है

ईश्वर ने।

अगर पेट ना होता

तो पैसे कमाने को

अपनी जन्मभूमि से

कभी इतनी दूर जाता ही नहीं।

अपने करीबियों से 

बिछड़न के एहसास ने

कभी मुझे 

रुलाया होता ही नहीं।


बहुत सारे खुशियों के अनमोल पलों को 

अपने दिल में सँजोये

मैं जा तो रहा हूँ।

पर रह रहकर 

उन मधुरयादों के जगमगाते तारों में 

मैं खुद को भुला देना चाहता हूँ कहीं।


मैं लौट कर अपने

जन्मभूमि को।

वापस जरूर आऊँगा 

एक दिन कभी।

फिर कभी भी

अपने करीबियों से

दूर जाने को नहीं।



बिछड़न अपनो से

द्वारा सुशील कबीरा

गुरुवार, 8 जुलाई 2021

ये केवल मात्र एकीकरण नहीं ।

 ये केवल मात्र एकीकरण नहीं 

ये केवल मात्र एकीकरण नहीं


 ये केवल मात्र एकीकरण नहीं 

दो विचारों का मेल था।

 ये केवल मात्र एकीकरण नहीं 

दो भावनाओ का गठजोड़ था।


पूर्व का दक्षिण से

अलाहाबाद का इंडियन से

एक पवित्र 

महासंयोग था।


हम दो दिल कब एक हुए।

हम तुम से

कब हम एक हुएँ।

कुछ भी पता ही नहीं चला।


बस कुछ ऐसा हुआ जैसे

हुबली की धार मानो 

अड्यार नदी में मिल

एक हो गया हो।

और अलाहाबाद बैंक

आज इंडियन बैंक हो गया।



 ये केवल मात्र एकीकरण नहीं 

Written by sushil kabira


शनिवार, 3 जुलाई 2021

mere hisse ki jamin tu rakh le mere bhaai।

 mere hisse ki jamin tu rakh le 

mere bhaai।

मेरे हिस्से की जमीन तू रख ले

मेरे भाई।

 

mere hisse ki jamin tu rakh le mere bhaai।

मेरे हिस्से की जमीन तू रख ले

मेरे भाई।

पर माँ बाबू जी को 

मुझे सौंप दे।

बहुत कुछ झेला है उन्होंने 

हमारे भविष्य के खातिर।

अब मुझे उनकी 

सेवा कर लेने की

मौका दे दे।



भैया ! आप जो अपने लब्जों से 

बयान मुझे कर रहे हो।

वही जज्बात मेरे दिल में 

भँवर बन 

मुझे निगला सा जा रहा है।

टकराव तो होगी 

ये मुझे पहले से 

मेरे मन को मालूम था।

जब मेरे और आपके संस्कार

आपस में भिड़ जाएँगे।


माँ बाप के हम दोनों 

कलेजे के टुकड़े हैं।

वो भी हमारे दिल के 

सबसे चहिते हैं।

तो क्यों ना 

हम ये सबकुछ

उनपर ही छोड़ दें।

जिनके साथ मन करे

वो उनके साथ ही रह लें।


पर यहाँ भी माँ बाबूजी 

अपनी ही चाल चल गएँ।

शतरंज के खेल में

वो हमसे 

कहीं आगे निकल गएँ।

गाँव में आधी जीवन बिता लेने वाले को 

शहर कहाँ रास आएगी।

मन करे अगर कभी मिलने को

तो चले आना 

अपने इस 

बचपन के गाँव में।

यह बात कहकर 

वो हमसे आगे निकल गएँ।

हम एक दूसरे के 

आँसू पोंछते रह गएँ।


बड़ी बेबसी थी

उस क्षण हमारे दिल में।

शरीर चला जा रहा था 

नगर की ओर।

पर आत्मा हमारी 

अभी भी

अपने माँ बाबूजी के पास ही

छूटी पड़ी थी।



 mere hisse ki jamin tu rakh le


mere bhaai।


 


mere hisse ki jamin tu rakh le


mere bhaai।


par maan baabu ji ko 


mujhe saump de।


bahut kuchh jhelaa hai unhonne 


hamaare bhavishy ke khaatir।


ab mujhe unki 


sevaa kar lene ki


maukaa de de।




bhaiyaa ! aap jo apne labjon se 


bayaan mujhe kar rahe ho।


vahi jajbaat mere dil men 


bhnavar ban 


mujhe niglaa saa jaa rahaa hai।


takraav to hogi 


ye mujhe pahle se 


mere man ko maalum thaa।


jab mere aur aapke sanskaar


aapas men bhid jaaange।



maan baap ke ham donon 


kaleje ke tukde hain।


vo bhi hamaare dil ke 


sabse chahite hain।


to kyon naa 


ham ye sabakuchh


unapar hi chhod den।


jinke saath man kare


vo unke saath hi rah len।



par yahaan bhi maan baabuji 


apni hi chaal chal gan।


shataranj ke khel men


vo hamse 


kahin aage nikal gan।


gaanv men aadhi jivan bitaa lene vaale ko 


shahar kahaan raas aaagi।


man kare agar kabhi milne ko


to chale aanaa 


apne es 


bachapan ke gaanv men।


yah baat kahakar 


vo hamse aage nikal gan।


ham ek dusre ke 


aansu ponchhte rah gan।



bdi bebsi thi


us kshan hamaare dil men।


sharir chalaa jaa rahaa thaa 


nagar ki or।


par aatmaa hamaari 


abhi bhi


apne maan baabuji ke paas hi


chhuti pdi thi।






mere hisse ki jamin tu rakh le

mere bhaai।

Written by sushil kabira















रविवार, 20 जून 2021

baabuji ! main garib jarur hun। par chor nahin।

बाबूजी ! 

मैं गरीब जरूर हूँ।

पर चोर नहीं।

बाबूजी !   मैं गरीब जरूर हूँ।  पर चोर नहीं।




बाबूजी ! 

मैं गरीब जरूर हूँ।

पर चोर नहीं।

अभी मेरे उम्र के बच्चे स्कूल जाते हैं।

खेलते हैं।

कूदते हैं।

पर मैं खिलौने बेचकर 

कुछ पैसे कमाकर 

अपनी माँ के दवा के लिए पैसे जमा करती हूँ।

क्योंकि मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ।

पापा का पता नहीं।

माँ बोलती है

मेरे जन्म लेते ही वो कहीं चले गएँ।

अब मैं अपनी माँ को भी कहीं 

खो ना दूँ

इसलिए इतनी मेहनत करती हूँ।

बाबूजी ! 

मैं गरीब जरूर हूँ।

पर चोर नहीं।

बाबूजी ! 

मैं गरीब जरूर हूँ।

पर चोर नहीं।

माँ घर घर बर्तन धोकर

मेरा पालन पोषण किया करती थी।

अभी कुछ ही दिन हुए

स्कूल जाने को।

माँ की तबियत बिगड़ी थी।

माँ ने सिखाया था

खुद्दारी।

माँ ने सिखाया था

ईमानदारी।

अगर कुछ ना सिखाया था तो वह

बेईमानी और गद्दारी।

बाबूजी!

मैं गरीब जरूर हूँ।

पर चोर नहीं हूँ।

बाबूजी!

मैं गरीब जरूर हूँ।

पर चोर नहीं।

अपने मुझे ऐसे पीछे धकेला।

मैं गिर पड़ी थी।

सड़क पर।

मेरे खिलौने भी भिखर गए थे।

मुझे चोट लगी थी

मेरे सिर पर।

वो तो आपका बटुआ 

गिरते देखी मैं।

भागी आई 

थी पीछे 

आपको देने को।

पर आपने तो 

मुझे ऐसा धकेला।

मानो आई थी

आपके बटुआ चुराने को।

बाबूजी! 

मैं गरीब जरूर हूँ।

पर चोर नहीं।







baabuji ! 


main garib jarur hun।


par chor nahin







baabuji ! 


main garib jarur hun।


par chor nahin।


abhi mere umr ke bachche skul jaate hain।


khelte hain।


kudte hain।


par main khilaune bechakar 


kuchh paise kamaakar 


apni maan ke davaa ke lia paise jamaa karti hun।


kyonki main unse bahut pyaar karti hun।


paapaa kaa pataa nahin।


maan bolti hai


mere janm lete hi vo kahin chale gan।


ab main apni maan ko bhi kahin 


kho naa dun


esalia etni mehanat karti hun।


baabuji ! 


main garib jarur hun।


par chor nahin।


baabuji ! 


main garib jarur hun।


par chor nahin।




maan ghar ghar bartan dhokar


meraa paalan poshan kiyaa karti thi।


abhi kuchh hi din hua


skul jaane ko।


maan ki tabiyat bigdi thi।


maan ne sikhaayaa thaa


khuddaari।


maan ne sikhaayaa thaa


imaandaari।


agar kuchh naa sikhaayaa thaa to vah


beimaani aur gaddaari।



baabuji!


main garib jarur hun।


par chor nahin hun।


baabuji!



main garib jarur hun।


par chor nahin।



apne mujhe aise pichhe dhakelaa।


main gir pdi thi।


sdak par।


mere khilaune bhi bhikhar gaye the।


mujhe chot lagi thi


mere sir par।


vo to aapkaa batuaa 


girte dekhi main।


bhaagi aai 


thi pichhe 


aapko dene ko।


par aapne to 


mujhe aisaa dhakelaa।


maano aai thi


aapke batuaa churaane ko।


baabuji! 


main garib jarur hun।


par chor nahin।




Written by Sushil Kabira






शनिवार, 12 जून 2021

main nahin ban saktaa hun tumsaa।

main nahin ban saktaa hun tumsaa।

मैं नहीं बन सकता हूँ तुमसा।

main nahin ban saktaa hun tumsaa।


अपनी खुशियों में

चार चाँद लगाने को।

किसी के आशियाने को 

अग्निकुंड में स्वाहा कर दूँ।

ये नही हो सकता है मुझसे।

मैं नहीं बन सकता हूँ तुमसा।

मैं नहीं बन सकता हूँ।


लोगों के खून और पसीने को

पानी समझकर

उनकी मेहनताना में भी 

अपना कुछ बचाकर।

फालतू के पार्टियों में 

पैसे उड़ाकर

मैं कैसे चैन से 

सो सकता हूँ??


मैं नहीं बन सकता हूँ तुमसा।

मैं नहीं बन सकता हूँ।


किसी लाचार गरीब की 

मजाक बनाकर।

उसकी बेबसी की 

तमाशा बनाकर।

मैं नही जी सकता हूँ मैं।

मैं नहीं बन सकता हूँ तुमसा।

मैं नहीं बन सकता हूँ।


हैसियत के तराजू में तौल

अपने संबंध बनाकर।

खोखले आडम्बरों में 

खुद को भुलाकर।

मैं नहीं हो सकता हूँ 

कोई संवेदनहीन पाषाण।

मैं नहीं बन सकता हूँ तुमसा।

मैं नहीं बन सकता हूँ।





main nahin ban saktaa hun tumsaa।



apni khushiyon men


chaar chaand lagaane ko।


kisi ke aashiyaane ko 


agnikund men svaahaa kar dun।


ye nahi ho saktaa hai mujhse।


main nahin ban saktaa hun tumsaa।


main nahin ban saktaa hun।



logon ke khun aur pasine ko


paani samajhakar


unki mehantaanaa men bhi 


apnaa kuchh bachaakar।


phaaltu ke paartiyon men 


paise udaakar


main kaise chain se 


so saktaa hun??



main nahin ban saktaa hun tumsaa।


main nahin ban saktaa hun।



kisi laachaar garib ki 


majaak banaakar।


uski bebsi ki 


tamaashaa banaakar।


main nahi ji saktaa hun main।


main nahin ban saktaa hun tumsaa।


main nahin ban saktaa hun।



haisiyat ke taraaju men taul


apne sambandh banaakar।


khokhle aadambron men 


khud ko bhulaakar।


main nahin ho saktaa hun 


koi sanvedanhin paashaan।


main nahin ban saktaa hun tumsaa।


main nahin ban saktaa hun।







बुधवार, 14 अप्रैल 2021

vaah ri kalayug ye kyaa din dikhaa rahaa hai

vaah ri kalayug 

ye kyaa din dikhaa rahaa hai

vaah ri kalayug ye kyaa din dikhaa rahaa hai


वाह री कलयुग 

ये क्या दिन दिखा रहा है।

खून बहा रहा है पांडव

कौरव इनाम पा रहा है।

मानव खा रहा है जानवर

विषाणु मानव को निगला जा रहा है।

वाह री कलयुग 

ये क्या दिन दिखा रहा है।(2)


वाह-वाह री कलयुग 

ये क्या दिन दिखा रहा है।

पिता पुत्र की हत्या कर

अपनी पुतहु संग विवाह रचा रहा है।

तो कहीं कोई बेटा 

अपने पिता संग 

दारू पार्टी किए जा रहा है।

वाह-वाह री कलयुग 

ये क्या दिन दिखा रहा है।(2)


शेर चीते अब जंगल में कम

अब कुत्तों संग सोए नज़र आ रहे हैं।

अब जंगल भी कहाँ हैं

सारे जगहों पर केवल 

इमारतें ही नज़र आ रहे हैं।

वाह-वाह री कलयुग 

ये क्या दिन दिखा रहा है।(2)


लोग यहाँ अपनो से ज्यादा

परायों पर विश्वास किए जा रहे हैं।

घर पर बाप बैठा है 

पर बगल वाले अंकल से

सलाह लिए जा रहे हैं।

वाह-वाह री कलयुग 

ये क्या दिन दिखा रहा है।(2)


 vaah ri kalayug 


ye kyaa din dikhaa rahaa hai।


khun bahaa rahaa hai paandav


kaurav enaam paa rahaa hai।


maanav khaa rahaa hai jaanavar


vishaanu maanav ko niglaa jaa rahaa hai।


vaah ri kalayug 


ye kyaa din dikhaa rahaa hai।(2)



vaah-vaah ri kalayug 


ye kyaa din dikhaa rahaa hai।


pitaa putr ki hatyaa kar


apni putahu sang vivaah rachaa rahaa hai।


to kahin koi betaa 


apne pitaa sang 


daaru paarti kia jaa rahaa hai।


vaah-vaah ri kalayug 


ye kyaa din dikhaa rahaa hai।(2)



sher chite ab jangal men kam


ab kutton sang soa njar aa rahe hain।


ab jangal bhi kahaan hain


saare jaghon par keval 


emaarten hi njar aa rahe hain।


vaah-vaah ri kalayug 


ye kyaa din dikhaa rahaa hai।(2)



log yahaan apno se jyaadaa


paraayon par vishvaas kia jaa rahe hain।


ghar par baap baithaa hai 


par bagal vaale ankal se


salaah lia jaa rahe hain।


vaah-vaah ri kalayug 


ye kyaa din dikhaa rahaa hai।(2)





vaah ri kalayug 

ye kyaa din dikhaa rahaa hai

Written by

Sushil kabira




रविवार, 14 मार्च 2021

Jiwan ki sachchai par shayari

 Jiwan ki sachchai par shayari

जीवन की सच्चाई पर शायरी।

Jiwan ki sachchai par shayari


1.


मैं मुझसे हो ना पाया जुदा


करता हूँ जो मोहब्बत खुद से


बेइंतहा।



2*


करने चला था दुनिया पे फतह


मगर हार गया वो आखिरी जंग मैं


मुझसे 



3*


मिटाने चला था 


बुराई को जमाने से।


सदमा लगा मुझे


जब पता चला


मुझसा कोई बुरा नहीं


इस जमाने में।



4*


रंग अनेक हैं खुशियों के


हमारे जीवन में।


बस उन पलों को 


जीने का सबक 


सही ढंग से हमने पढ़ा हो।






Jiwan ki sachchai par shayari



main mujhse ho naa paayaa judaa


kartaa hun jo mohabbat khud se


beenthaa।



2*


karne chalaa thaa duniyaa pe phatah


magar haar gayaa vo aakhiri jang main


mujhse 



3*


mitaane chalaa thaa 


buraai ko jamaane se।


sadmaa lagaa mujhe


jab pataa chalaa


mujhsaa koi buraa nahin


es jamaane men।



4*


rang anek hain khushiyon ke


hamaare jivan men।


bas un palon ko 


jine kaa sabak 


sahi dhang se hamne pdhaa ho।




Jiwan ki sachchai par shayari

Written by sushil kabira










बिछड़न अपनो से

बिछड़न अपनो से मैं जा तो रहा हूँ। पर जाने की इच्छा नहीं। मन बहुत ही भावुक है। फिर से लौट जाने को वहीं। ये पेट भी  क्या चीज बनाई है ईश्वर ने। ...